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धीरसागरजी महामुनिराज का सल्लेखनापूर्वक समाधिमरण

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वीरप्रभु से यही विनय, अनुनय से कर जोड़
पल-पल, पग-पग बढ़ चलूं, मोक्षमहल की ओर
धीर और गुरु पावन हो, और हो गुण गंभीर
तप-चर्या में ज्येष्ठ हो, सो कहलाते वीर
पदचिन्हों पर आपके, चलता चल अविराम
मैं भी गुरुवर धीर बनूं, पाऊं पद निर्वाण

समाधिमरण
प.पू. आचार्यश्री शांतिसागरजी की आदर्श श्रमण परंपरा के श्रेष्ठ संत व आचार्य विद्यासागरजी के परम प्रभावक शिष्य धीर-वीर मुनिवर श्री धीरसागरजी महामुनिराज का सल्लेखनापूर्वक समाधिमरण आज प्रात: 11 बजे चतुर्विध संघ के मध्य गुना में हुआ।

पूज्य मुनिश्री का स्वास्थ्य कुछ दिनों से खराब चल रहा था और आज अचानक समाधिमरण हो गया। इस घटना से संपूर्ण दिगंबर जैन समाज में शोक की लहर फैल गई। निश्चित ही यह जैन जगत की अपूरणीय क्षति है। समाज ने एक युवा मुनि को अपने बीच से खो दिया।

आप आचार्यश्री विद्यासागरजी के उच्च शिक्षित परम शिष्य थे। आप स्वाध्यायशील व शांत प्रकृति के तपस्वी मुनिराज थे। सदैव आत्मध्यान में लीन रहना व चर्या का निर्दोष पालन करना आपकी पहचान थी। मुनिश्री गृहस्थ अवस्था में विभिन्न व्यावसायिक, शासकीय विभागों में प्रमुख पदों पर रहे व लगभग 20 वर्ष तक मार्केटिंग, वित्त, वाणिज्य व आयात-निर्यात विभागों में कार्य किया।

आपने आचार्यश्री के प्रथम दर्शन करने मात्र से 80 लाख का सालाना पैकेज छोड़कर जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा के पूर्व आप उज्जैन के सोया प्लांट में account officer थे। आपकी मुनि दीक्षा जबलपुर में 2004 में हुई थी, तब से लेकर आज तक (लगभग 12 वर्ष) तक आपने मौन साधना की।

लगभग 10 वर्ष आचार्यश्री के संघ में रहकर आत्मकल्याण करते रहे व पश्चात गुरु आज्ञा से मुनिश्री समयसागरजी के उपसंघ में सम्मिलित हो गए। उपसंघ में आपका प्रथम चातुर्मास जन्म नगरी इंदौर में हुआ था व दूसरा चातुर्मास बागीदौरा (राजस्थान) में हुआ व विहार करके गुना नगर में पधारे थे।

कुछ दिनों से आपका स्वास्थ्य खराब चल रहा था, पर अपने व्रतों का आप निर्दोष पालन कर रहे थे। इसी बीच गत 4 दिनों से स्वास्थ्य अत्यधिक खराब हो गया। ठंड के कारण आपके शरीर में जकड़न हो गई थी व आज पूर्ण चेतना में भगवानजी का अभिषेक देखते हुए व ‘णमोकार मंत्र’ का स्मरण करते हुए समाधिमरण हो गया। अवश्य ही आप उच्च गति को प्राप्त हुए होंगे।

मुनिवर का जीवन परिचय

मुनिवर श्री 108 धीरसागरजी मुनिराज
जन्म : 1 सितंबर 1962, शनिवार, भादौ सुदी 5 (उत्तम क्षमा धर्म)
जन्म नाम : बाल ब्र. श्री राजकुमारजी
जन्म स्थान : इंदौर (मप्र)
पिता का नाम : श्री गुलाबचंदजी जैन
माता का नाम : श्रीमती रूपाबाईजी
भाई-बहन : 1. श्री विजयजी, 2. श्रीमती आशा, 3. श्रीमती विनोद, 4. आपका क्रम, 5. श्रीमती सुनीता।
मातृभाषा : हिन्दी

शिक्षा : M.B.A.(मार्केटिंग एवं सिस्टम, डबल स्पेशलाइजेशन), M.Com., M.A.(संस्कृत), LLB, योग प्रमाण पत्र कोर्स (A ग्रेड) व विभिन्न उच्च कोर्स।

ब्रह्मचर्य व्रत : 17 दिसंबर 1989, प.पू. आचार्यश्री विद्यासागरजी से सिद्धक्षेत्र कुंडलपुरजी।
मुनि दीक्षा : 21 अगस्त 2004, भगवान नेमिनाथ जन्म-तप कल्याणक।
मुनि दीक्षा स्थान : दयोदय तीर्थ, तिलवारा घाट, जबलपुर।
दीक्षा गुरु : पूज्यपाद निर्ग्रंथाचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज।
संघस्थ : मुनिवर श्री समयसागरजी।
समाधिमरण : पौष शुक्ल 12, संवत 2043 प्रात: 11.15 बजे।

ऐसे महान तपस्वी भावी सिद्ध के चरणों में कोटिश: नमन…!

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