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अष्टान्हिका पर्व का महत्व

– जय चंद्रनाथ
नंदीश्वर द्वीप – जम्बूद्वीप से आठवाँ द्वीप नंदीश्वर द्वीप है। यह नंदीश्वर द्वीप समुद्र से वेष्टित है। इस द्वीप का मण्डलाकार से विस्तार एक सौ तिरेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन है। ️अंजन गिरि पर्वत – इस द्वीप में पूर्व दिशा में ठीक बीचों-बीच अंजनगिरि नाम का एक पर्वत है। यह ८४००० योजन विस्तृत और इतना ही ऊँचा समवृत-गोल है तथा इन्द्रनील मणि से निर्मित है।

वापियाँ – इस पर्वत के चारों ओर चारो दिशाओं में चार बावड़ी हैं। ये बावड़ी एक लाख योजन विस्तृत चौकोन हैं। इनकी गहराई एक हजार योजन है। इनमें स्वच्छ जल भरा हुआ है। ये जलचर जीवों से रहित हैं। इनमें एक हजार उत्सेध योजन प्रमाण विस्तृत कमल खिल रहे हैं।

इन वापियों के नाम दिशा क्रम से नन्दा,नन्दावती, नन्दोत्तरा और नन्दिघोषा हैं। वन – इन वापियों के चारों तरफ चार वन-उद्यान हैं जो कि एक लाख योजन लम्बे और पचास हजार योजन चौड़े हैं। ये पूर्व आदि दिशाओं में क्रम से अशोक,सप्तच्छद,चंपक और आम्रवन हैं। इनमें से प्रत्येक वन में वन के नाम से सहित चैत्यवृक्ष हैं। दधिमुख पर्वत – प्रत्येक वापिका के बहु मध्य भाग में दही के समान वर्ण वाले दधिमुख नाम के उत्तम पर्वत हैं। ये पर्वत दश हजार योजन ऊँचे तथा इतने ही योजन विस्तृत गोल हैं। रतिकर पर्वत – वापियों के दोनों बाह्य कोनों पर रतिकर नाम के पर्वत हैं। जो कि सुवर्णमय हैं, एक हजार योजन विस्तृत एवं इतने ही योजन ऊँचे हैं।

बावन जिन मंदिर – इस प्रकार पूर्व दिशा सम्बन्धी एक अंजनगिरि। चार दधिमुख। आठ रतिकर ऐसे तेरह पर्वत हैं। इन पर्वतों के शिखर पर उत्तम रत्नमय एक-एक जिनेन्द्र मन्दिर स्थित हैं। जैसे यह पूर्व दिशा के तेरह पर्वतों का वर्णन किया है वैसे ही दक्षिण,पश्चिम तथा उत्तर में भी तेरह-तेरह पर्वत हैं। उन पर भी एक-एक जिनमंदिर हैं। इस तरह कुल मिलाकर १३+१३+१३ +१३=५२ जिनमंदिर हैं। इस प्रकार नंदीश्वर द्वीप में ४ अंजनगिरि पर्वत १६ दधिमुख पर्वत और ३२ रतिकर पर्वतों के ऊपर ५२ जिनमंदिर हैं। प्रत्येक जिनमंदिर उत्सेध योजन से १०० योजन लम्बे,५० योजन चौड़े और ७५ योजन ऊँचे हैं। प्रत्येक जिनमंदिर में१०८-१०८ गर्भगृह हैं और प्रत्येक गर्भगृह में ५०० धनुष ऊँची पद्मासन जिन प्रतिमायें विराजमान हैं। इन मंदिरों में नाना प्रकार के मंगलघट, धूपघट,सुवर्णमालायें,मणिमालायें, अष्ट मंगलद्रव्य आदि शोभायमान हैं। इन मन्दिरों में देवगण अष्ट द्रव्यों से जिनेन्द्र प्रतिमाओं की स्तुतिपूर्वक पूजा करते हैं। ज्योतिषी,व्यंतर,भवनवासी और कल्पवासी देवों की देवियाँ इन जिन भवनों में भक्तिपूर्वक नाचती और गाती हैं। बहुत से देवगण भेरी,मर्दल और घण्टा आदि अनेक प्रकार के दिव्य बाजों को बजाते रहते हैं।

अन्य दिशाओं में वापियों के नाम – जैसे पूर्व दिशा में चार वापियों के क्रम से नंदा आदि नाम हैं। वैसे ही दक्षिण दिशा में अंजनगिरि के चारों ओर जो चार वापियाँ हैं उनके पूर्वादि क्रम से अरजा,विरजा,अशोका और वीतशोका ये नाम हैं। पश्चिम दिशा के अंजनगिरि की चारों दिशाओं में क्रम से विजया,वैजयन्ती, जयन्ती और अपराजिता ये नाम हैं तथा उत्तर दिशा के अंजनगिरि की चारों दिशागत वापियों के रम्या,रमणीया,सुप्रभा और सर्वतोभद्रा नाम हैं। चौंसठ वन~इन सोलह वापिकाओं के प्रत्येक के चार-चार वन होने से १६×४=६४ वन हैं। प्रत्येक वन में सुवर्ण तथा रत्नमय एक-एक प्रासाद है। उन पर ध्वजायें फहरा रही हैं। इन प्रासादों की ऊँचाई बासठ योजन और विस्तार इकतीस योजन है तथा लम्बाई भी इकतीस योजन ही है। इन प्रासादों में उत्तम-उत्तम वेदिकायें और गोपुर द्वार हैं। इनमें वन खण्डों के नामों से युक्त व्यंतर देव अपने बहुत से परिवार के साथ रहते हैं। अष्टाह्निका पर्व पूजा – इस नंदीश्वर द्वीप में प्रत्येक वर्ष आषाढ़,कार्तिक और फाल्गुन मास में शुक्लपक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक चारों प्रकार के देवगण आते हैं और भक्ति से अखण्ड पूजा करते हैं। चारों निकाय के देव नंदीश्वर द्वीप के दिव्य जिनमंदिरों में आकर नाना प्रकार की स्तुतियों से दिशाओं को मुखरित करते हुए प्रदक्षिणायें करते हैं।

विशेष जानकारी – १}नंदीश्वर द्वीप में सूर्य-चन्द्रमा अपने-अपने स्थान पर स्थिर हैं अत: वहाँ रात-दिन का विभाग नहीं है। अतः देवगण अष्टाह्निका के ८ दिन २४ घंटे पूजन करते हैं तो भी रात्रि पूजन नहीं होती क्योंकि नंदीश्वर  द्वीप में रात्रि होती ही नहीं है। २]देवगण पूजन में जो भी फल, फूल,नैवेद्य आदि लेकर आते हैं वह सब कल्पवृक्षों से प्राप्त प्रासुक जीव रहित पूजन सामग्री होती है। ३}तिलोयपण्णत्ती अधिकार ५ गाथा संख्या १०४ के अनुसार नंदीश्वर द्वीप में केवल देवेन्द्र महान विभूति के साथ प्रतिमाओं का स्वर्ण कलशों में भरे हुए सुगन्धित निर्मल जल से अभिषेक करते हैं।

४}नंदीश्वर द्वीप मानुषोत्तर पर्वत से परे है अत: यहाँ मनुष्य नहीं जा सकते हैं केवल देवगण ही वहाँ जाकर पूजा करते हैं। वहाँ विद्याधर मनुष्य और चारण ऋद्धिधारी मुनिश्वर भी नहीं जा सकते हैं। अत: इन पर्वों में यहाँ भावों से ही पूजा कर भव्य मनुष्य पुण्य संचय किया करते हैं।

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