आचार्यश्री समयसागर जी महाराज इस समय डोंगरगढ़ में हैंयोगसागर जी महाराज इस समय चंद्रगिरि तीर्थक्षेत्र डोंगरगढ़ में हैं Youtube - आचार्यश्री विद्यासागरजी के प्रवचन देखिए Youtube पर आचार्यश्री के वॉलपेपर Android पर आर्यिका पूर्णमति माताजी डूंगरपुर  में हैं।दिगंबर जैन टेम्पल/धर्मशाला Android पर Apple Store - शाकाहारी रेस्टोरेंट आईफोन/आईपैड पर Apple Store - जैन टेम्पल आईफोन/आईपैड पर Apple Store - आचार्यश्री विद्यासागरजी के वॉलपेपर फ्री डाउनलोड करें देश और विदेश के शाकाहारी जैन रेस्तराँ एवं होटल की जानकारी के लिए www.bevegetarian.in विजिट करें

निर्मल दृष्टि

संकलन : प्रो. जगरूपसहाय जैन
सम्पादन : प्राचार्य श्री नरेन्द्र प्रकाश जैन

दर्शन विशुद्धि मात्र सम्यग्दर्शन नहीं है। दृष्टि में निर्मलता होना दर्शन विशुद्धि है और दृष्टि में निर्मलता आती है तत्त्व चिंतन से।

कार्य से कारण की महत्ता अधिक है क्योंकि यदि कारण न हो तो कार्य निष्पन्न नहीं होगा। फूल ना हो तो फल की प्राप्ति नहीं होगी।

कुछ लोग ऐसे भगवान की कल्पना करते हैं जो उनकी शुभाशुभ इच्छाओं की पूर्ति करे। ‘खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान’ ऐसा लोग कहते हैं। इसलिए भगवान महावीर को बहुत से लोग भगवान मानने को तैयार नहीं। परंतु सत्य ये है कि भगवान बनने के पहले तो शुभाशुभ कार्य किये जा सकते हैं, भगवान बनने के बाद नहीं।

भगवान महावीर जब पूर्ण जीवन में नन्दराज चक्रवर्ती थे, तब उनको एक विकल्प हुआ कि “मैं सम्पूर्ण प्राणियों का कल्याण करूँ” इसी विकल्प के फलस्वरूप उन्हें तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध हुआ। कल्याण करने के लिये बन्धन स्वीकार करना पडा। ये बन्धन चेष्टा पूर्वक किया जाता है तो इस बन्धन के पश्चात मुक्ति होती है। यदि मां केवल अपनी ही ओर देखे तो बच्चों का पालन संभव नहीं होगा।

‘पर’ के कल्याण में भी ‘स्व’ कल्याण निहित है। ये बात दूसरी है कि फिर दूसरे का कल्याण हो अथवा ना भी हो। किसान की भावना यही रहती है कि “वृष्टि समय पर हुआ करे” और वृष्टि तो जब भी होगी सभी के खेतों पर होगी किंतु किसान फसल काटता है तो अपनी ही काटता है, किसी दूसरे की नहीं। अर्थात कल्याण सबका चाहता है किंतु पूर्ति अपने स्वार्थ की करता है।

दर्शन-विशुद्धि मात्र सम्यग्दर्शन नहीं है। दृष्टि में निर्मलता का होना दर्शन-विशुद्धि है और दृष्टि में निर्मलता आती है तत्त्व चिंतन से।

हमारी दृष्टि बडी दोषपूर्ण है। हम देखते तो अनेक वस्तुएँ हैं किंतु उन्हे हम साफ साफ नहीं देख पाते। हमारी आँखों पर किसी ना किसी रंग का चश्मा चढा लगा हुआ है। प्रकाश का रंग कैसा है, आप बताएँ। क्या यह लाल है? क्या यह हरा या पीला है? नहीं, प्रकाश का कोई वर्ण नहीं। वह तो वर्णनातीत है, किंतु विभिन्न रंग वाले कांच के सम्पर्क से हम उस प्रकाश को लाल, पीला या हरा कहते हैं। इसी प्रकार हमारा या हमारी आत्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है? ‘अवर्णोहं’ मेरा कोई वर्ण नहीं, ‘अर्सोहमं’ मुझमें कोई रस नहीं है, स्पर्शोहमं’ मुझे छुआ नहीं जा सकता। यह मेरा स्वरूप है। किंतु इस स्वयं को आप पहचान नहीं पाते। यही है हमारी दृष्टि का दोष।

हम पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट की धारणा बनाते हैं। कुछ पदार्थों को हम इष्ट मानते हैं और हितकारी समझते हैं। कुछ पदार्थों को अनिष्ट मानते हैं और अहितकारी समझते हैं। वास्तव में, कोई पदार्थ न इष्ट है और ना अनिष्ट। इष्ट-अनिष्ट की कल्पना हमारी दृष्टि का दोष है।

इसी प्रकार जैनाचार्यों ने बताया कि आत्मा भिन्न है और शरीर भिन्न। ऊपर का आवरण ये शरीर केवल एक छिलके के समान है, यह उन्होंने अनुभव के द्वारा बताया है किंतु हम अनुभव की बात भी नहीं मानते। हमारी स्थिति बच्चे जैसी है। दीपक जलता है तो बच्चे को समझाया जाता है कि इसे छूना मत। उसे दीपक से बचाने की चेष्टा भी की जाती है किंतु फिर भी वह बच्चा उस दीपक पर हाथ रख ही देता है और एक बार जल जाता है तो फिर वह उस दीपक के पास अपना हाथ नहीं ले जाता। हमारी दृष्टि का परिमार्जन तभी समझा जायेगा, जब हम प्रत्येक वस्तु को उसके असली रूप में देखें/समझें।

यह दर्शन-विशुद्धि भावना लाखों करोडों मनुष्यों में से किसी एक को होती है और अत्यंत मन्द कषाय की अवस्था में होती है। शास्त्रीय भाषा में दर्शन-विशुद्धि चौथे गुणस्थान स आठवें गुणस्थान के प्रथम भाग तक हो सकती है अर्थात सम्यग्दृष्टि सद्गृहस्थ की अवस्था से लेकर उत्कृष्ट मुनि की अवस्था तक यह विशुद्धि होती है। एक बार प्रारम्भ हो जाने पर फिर श्रेणी में भी तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध हो सकता है। दूसरे के कल्याण की भावना का विकल्प जब होगा, तभी तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध होगा। तीर्थंकर प्रकृति एक ऐसा निकाचित बन्ध है जो नियम से मोक्ष ले जायेगा।

कल शास्त्री जी मेरे पास आये थे। साथ में गोम्मटसार की कुछ प्रतियां लाये थे। उसमें एक बात बडे मार्के की देखने को मिली। तीर्थंकर प्रकृति का उदय चौदहवें गुणस्थान में भी रहता है। जब जीव मोक्ष की ओर प्रयाण करता है अब यह तीर्थंकर प्रकृति अपनी विजय-पताका फहराते हुए आगे-आगे चलती है। इसप्रकार यह स्पष्ट है कि कषायों से ही कर्मबन्ध होता है और कषायों से ही कर्मों का निर्मूलन होता है। जैसे पानी से ही कीचड बनता है और पानी में ही घुलकर यह गंगाजल का भाग बन जाता है जिसे लोग सिर पर चढाते हैं और आचमन करते हैं। ‘कांटा ही कांटे को निकालता है’ यह सभी जानते हैं।

दर्शन-विशुद्धि भावना और सम्यग्दर्शन में एक मौलिक अंतर है। दर्शन-विशुद्धि में केवल तत्त्वचिंतन ही होता है, पंचेन्द्रिय के विषयों का चिंतन नहीं चलता, किंतु सम्यग्दर्शन में विषय का चिंतन भी सम्भव है।

दर्शन-विशुद्धि भावना चार स्थितियों में भायी जा सकती है। प्रथम, मरण के समय; द्वितीय भगवान के सम्मुख; तृतीय अप्रमत्त अवस्था में और चौथे कषाय के मन्दोदय में।

तीर्थंकर प्रकृति पुण्य का फल है किंतु इस्के लिये पुण्य कार्य पहले होना चाहिये। प्रवृत्ति ही निवृत्ति की साधिका है। राग से ही वीतरागता की ओर प्रयाण होता है। एक सज्जन ने मुझसे कहा- महाराज, आप एक लंगोटी लगा लें तो अच्छा हो क्योकि आपके रूप को देख कर राग की उत्पत्ति होती है। मैंने कहा भैया, तुम जो चमकीले-भडकीले कपडे पहनते हो, उससे राग बढता है अथवा यथाजात अवस्था से। नग्न दिगम्बर तो परमवीतरागता का साधक है। विशुद्धि में कैसा आवरण? विशुद्धि में तो किसी भी प्रकार का बाहरी आवरण बाधक है। साधक तो वह किसी अवस्था में हो ही नहीं सकता। अंतरंग का दर्शन तो यथाजात रूप द्वारा ही हो सकता है, फिर भी यदि इस रूप को देख कर किसी को राग का प्रादुर्भाव हो, तो मैं क्या कर सकता हूँ? देखने वाला भले ही मेरे रूप को ना देखना चाहे तो अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लें। पानी किसी को कीचड थोडे ही बनाता है। जिसकी इच्छा कीचड बनने की हो उसकी सहायता अवश्य कर देता है। पानी एक ही है। जब वह मिट्टी में गिरता है तो उसे कीचड बना देता है। जब बालू में गिरता है तो उसे सुन्दर कणदार रेत में परिवर्तित कर देता है। वही पानी जब पत्थर पर गिरता है तो उसके रंग रूप को निखार देता है। पानी एक जैसा ही है, किंतु जो जैसा बनना चाहता है उसकी वैसी ही सहायता कर देता है। इसी प्रकार नग्न रूप वीतरागता को पुष्ट करता है किंतु कोई भी उसे राग का पाठ ग्रहण करना चाहे, तो ग्रहण करे, इसमें उस नग्न रूप का क्या दोष? ये तो दृष्टि का खेल है।

प्रवचन वीडियो

कैलेंडर

june, 2024

चौदस 05th Jun, 202405th Jun, 2024

अष्टमी 14th Jun, 202414th Jun, 2024

चौदस 20th Jun, 202420th Jun, 2024

अष्टमी 29th Jun, 202429th Jun, 2024

X