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प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज; (डोंगरगढ़) {3 जनवरी 2018}

जैन धर्म भाव प्रधान है- आचार्यश्री

चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने प्रातःकालीन प्रवचन में कहा कि जैन धर्म में भाव का महत्‍वपूर्ण स्थान है। आचार्य श्री ने उदाहरण के माध्यम से बताया कि जब वे आहार के लिए निकलते हैं तो उन्हें हाथों से इशारा कर बुलाया तो नहीं जा सकता, लेकिन जिन लोगों की आवाज और शरीर बड़ा होता है वे जोर-जोर से नमोस्तु कर पढ्गाहन करते हैं, जबकि जिसकी आवाज बांसुरी की तरह होती है वे अपने सिर को हिलाकर एवं हाथों में रखे कलश को जोर-जोर से हिलाकर पढ्गाहन करते हैं, इससे उनके भावों का पता चलता है कि वे कितने उत्सुक होकर नवधा भक्तिपूर्वक पढ्गाहन कर रहे हैं।

Vidyasagar ji Maharaj

आचार्यश्री ने एक और उदाहरण देकर बताया कि जब आप लोग पूजा करते हो तो एक व्यक्ति को ही आगे आकर द्रव्य चढ़ाना होता है तो उस व्यक्ति के पीछे वाले उनके हाथ को छूकर एक के पीछे एक हाथ लगाकर चैन बना लेते हैं, जिससे सभी को उसका फल प्राप्त होता है और थाली में जितने चावल हैं, लगभग सबके हिस्से में दो- दो चावल तो आ ही जाते हैं। इस प्रकार जो द्रव्य चढ़ाता है उसको पुण्य तो मिलता ही है और जो हाथ लगाते हैं उनको भी दोगुना पुण्य मिलता है और जो हाथ नहीं लगाता है और सिर्फ ताली बजाता है तो उसको भी चार गुना पुण्य मिलता है। इसे ही कृत कारित अनुमोदन कहा जाता है, जिसे हम अपने मन, वचन और काया से भावपूर्ण करते हैं।यह जानकारी चंद्रगिरि डोंगरगढ़ से निशांत जैन (निशु) ने दी है।

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