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पूरे के पूरे 28 मूल गुणों के पालक रहे हैं क्षमासागरजी

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निर्मलकुमार पाटोदी
विद्या-निलय, 45, शांति निकेतन
(बॉम्बे हॉस्पिटल के पीछे),
इन्दौर-452010 (म.प्र.)
मोबा.- +91-07869917070 मेल:
nirmal.patodi@gmail.com

जैन अध्यात्म का सार है- सबसे पहले व्यक्ति मुक्ति के लिए मुनि पद धारण करें। मुनि पद से ही मोक्ष लक्ष्मी पाने का एकमात्र रास्ता है। इसी मार्ग को अंगीकार किया था पूज्य मुनिश्री क्षमासागरजी ने। वे दिगंबर जैन साधुओं की पंक्ति में अग्रगण्य हो गए थे। निरीह, निस्पृह और अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी थे। उन्हें दिगंबर जैन समाज के सुविख्यात संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी के अत:वासी हृदय के सदृश गुरु मिला।

आपकी सरलता, निश्छलता, सात्विकता चेहरे से सहज ही छलकती थी। आप अद्वितीय चिंतक, लेखक और प्रवचनकार थे। आवाज में ऐसी मिठास थी कि सुनते हुए शकुन मिलता था, मन एकाग्र हो जाता था। मध्यप्रदेश के सागर जिले में 20 सितंबर 1957 को जिस बालक का जन्म माता आशादेवी व पिता जीवनकुमार सिंघई के यहां हुआ था उस होनहार, प्रतिभा संपन्न बालक को घर-परिवार में ‘मुन्ना’ नाम से पुकारा जाता था। युवा अवस्था में आपने इधर सागर विश्वविद्यालय से एमटेक की उच्च शिक्षा ग्रहण की और भाग्य में किसी अन्य मार्ग की ओर जाना लिखा था। kshmasagar

संयोग मिला अध्यात्म योगी आचार्यश्री 108 श्री विद्यासागरजी महामुनिराजजी के निकट जाने का। महान संत की संयम, साधना और तप-त्याग को देखकर आपके अंतरमन में वैराग्य के भाव प्रबल हो गए। आचार्यश्री को मन ही मन में गुरु स्वीकार कर लिया। आपके वैराग्य की उत्कट भावना गुरु की कसौटी पर खरी उतर गई। पुण्योदय से 10 जनवरी 1980 का दिन ऐसा उदित हुआ कि आप क्षुल्लक दीक्षा से सिद्धक्षेत्र नैनागिरि में सुशोभित हो गए।

वैराग्य की राह आपने अपनाई थी किंतु परिजन व स्नेहीजनों में वियोग छा गया था। जब क्षुल्लकजी के कानों में भनक पड़ी तो एक भव्य आत्मा को पत्र में आपने लिखा था- ‘अपने परिणामों की संभाल आपको स्वयं करना है, हम तो निमित्त मात्र हैं। अपने मन को छोटा न बनाएं। संसार में किसी के गुणों के प्रति हर्ष का भाव आना विरले ही लोगों में होता है। आत्मचिंतन के लिए समय निकालें। आर्तध्यान से बचने का प्रयास करें। आत्मावलोकन करें और संतोष रखें। आप स्वयं स्वाध्यायी हैं, स्वाध्याय का लाभ लें और इस मनुष्य पर्याय को सफल बनाएं।’ (आस्था के अन्वेषक, मुनि क्षमासागर से)

9 माह के अंतराल से सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि में आपको ऐलक दीक्षा ग्रहण करने का अवसर उपलब्ध हो गया। सिद्धक्षेत्र नैनागिरि की पुण्य धरा पर 20 अगस्त 1982 के दिन मुनि पद की दीक्षा मिल गई। अब आपके साथ विशेष रूप से उल्लेखनीय यह रहा कि आपका नामकरण हर बार क्षुल्लक, ऐलक व मुनि पद के साथ क्षमासागर रहा। यह भी ध्यान देने का है कि मुनिश्री समयसागरजी, योगसागरजी तथा नियमसागरजी के बाद आचार्य महाराज से दीक्षित शिष्यों में वरिष्ठता में आपका क्रम चौथा रहा है।

योगीश्वर विद्यासागरजी दीक्षा प्रदान करते समय शिष्यों से हर बार कहते हैं कि उन्हें अपनी दीक्षा-पद से जुड़े मूल गुणों का पालन हमेशा करना ही है। एक भी मूल गुण का पालन कम नहीं होना चाहिए। मुनि क्षमासागरजी ने मूल गुणों के पालन में कोई कमी नहीं होने दी। आपकी चर्या अखंडित रही। चित्त रागादि कलुषताओं से विमुक्त रहा। आत्मकल्याण के साथ ही साथ लोककल्याण भी करते रहे हैं। आपके प्रवचन के समय श्रोता इतने तन्मय और भाव-विभोर हो जाते थे कि अगर सूई भी गिर जाए तो आवाज सुनाई दे जाए। मन में स्फूर्ति और प्रेरणा का संचार हो जाता था। आत्मा में पवित्रता की अनुभूति हो जाती थी। पाप-समूह का प्रक्षालन होने लगता था। आपकी लोकप्रिय कृति ‘कर्म कैसे करें?’ का सार हृदय में अभिन्न रूप से रच-पच जाता था। क्षमासागरजी महामुनिराज का बड़ा योगदान नई युवा पीढ़ी के जीवन को धार्मिक आधार पर संस्कारों के साथ गुणात्मक शिक्षा का रहा है।

उन्होंने अपनी बात को सरलता से उन्हीं की भाषा में समझाया। उनकी लोककल्याण की इस महती भावना को उनसे जुड़े भक्त समुदाय ने ‘मैत्री समूह’ नाम के संगठन के माध्यम से साकार कर दिया। एक समान विचार वाले भक्तों ने सन् 2001 से 2008 तक कक्षा 10वीं से 12वीं तक के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को ‘यंग जैना- अवॉर्ड’ नाम की स्कॉलरशिप प्रदान करके पूर्ण किया। महिलाएं संस्कार देने में समर्थ होती हैं इसलिए उन्हें ही आयोजनों का मुख्य अतिथि बनाया जाता था। संस्कार की जमीन को पुख्ता करने की यह नीति अपनाई गई। प्रतिभाओं को प्रेरित करने के कार्यक्रमों में महाराज श्रीजी का सान्निध्य रहता था।

एक जानकारी के अनुसार मैत्री-समूह के भक्तगणों ने महाराजजी के ‘यंग-जैना अवॉर्ड’ को पुन: प्रारंभ करने का निर्णय लिया है। अवॉर्ड से सम्मानित जीवन की ऊंचाइयों पर पहुंच चुके एक महानुभाव का कहना है कि उसे अपना जीवन संवारने के लिए मैत्री समूह के माध्यम से जो सहायता स्कॉलरशिप मिली थी, उस उपकार या ऋण को मैं अन्य युवाओं के काम आकर खुशी-खुशी एक बड़े योगदान के साथ वापस लौटाना चाहता हूं। क्षमासागरजी की मुनि चर्या से मुनि पद की गरिमा गौरवान्वित हो गई है। विवाद या उठापटक आपके नजदीक कभी भी फटक ही नहीं पाई। आपका चिंतन आपकी लेखनी में ढलकर प्रकाशित हुआ है।

आपकी रचनाओं से समाज को सदैव प्रेरणा मिलती रहेगी। ऐसे ही हमारा ‘संयुक्त-परिवार’ जो आज लगभग छोटा या बिखर चुका है, उसको लेकर भी आपकी कलम ने समाज का ध्यान सरलता से समझ आने लायक शब्दों में प्रकट किया है-

वो पंगत में बैठ के निवालों का तोड़ना,
वो अपनों की संगत में रिश्तों का जोड़ना।

वो दादा की लाठी पकड़ गलियों में घूमना,
वो दादी का बलैया लेना और माथे को चूमना।

सोते वक्त दादी पुराने किस्से-कहानी कहती थीं,
आंख खुलते ही माँ की आरती सुनाई देती थी।

इंसान खुद से दूर अब होता जा रहा है,
वो संयुक्त परिवार का दौर अब खोता जा रहा है।

माली अपने हाथ से हर बीज बोता था,
घर ही अपने आप में पाठशाला होता था।

संस्कार और संस्कृति रग-रग में बसते थे,
उस दौर में हम मुस्कुराते नहीं खुलकर हंसते थे।

मनोरंजन के कई साधन आज हमारे पास हैं,
पर ये निर्जीव है, इनमें नहीं साँस है।

आज गरमी में एसी और जाड़े में हीटर हैं,
और रिश्तों को मापने के लिए स्वार्थ का मीटर है।

वो समृद्ध नहीं थे फिर भी दस-दस को पालते थे,
खुद ठिठुरते रहते और कम्बल बच्चों पर डालते थे।

मंदिर में हाथ जोड़ तो रोज सर झुकाते हैं,
पर माता-पिता के धोक खाने होली-दिवाली जाते हैं।

मैं आज की युवा पीढ़ी को इक बात बताना चाहूँगा,
उनके अंत:मन में एक दीप जलाना चाहूँगा।

ईश्वर ने जिसे जोड़ा है उसे तोड़ना ठीक नहीं,
ये रिश्ते हमारी जागीर हैं, ये कोई भीख नहीं।

अपनों के बीच की दूरी अब सारी मिटा लो,
रिश्तों की दरार अब भर लो, उन्हें फिर से गले लगा लो।

अपने आप से सारी उम्र नज़रें चुराओगे,
अपनों के ना हुए तो किसी के ना हो पाओगे।

सब कुछ भले ही मिल जाए पर अपना अस्तित्व गँवाओगे,
बुजुर्गों की छत्रछाया में ही महफूज रह पाओगे।

होली बेमानी होगी दीपावली झूठी होगी,
अगर पिता दुखी होगा और माँ रूठी होगी।

अंत:करण को छूने वाली मुनिश्री क्षमासागरजी द्वारा रचित उपरोक्त कविता के लिए उनको शत्-शत् प्रणाम…

आपका और आपसे संबंधित साहित्य जो सदा प्रेरणा देता रहेगा, वह यह है- पगडंडी सूरज तक, मुनि क्षमासागर की कविताएं, अपना घर (कविता संग्रह), एकाकी भाव स्तोत्र (अनुवाद), अमूर्त शिल्पी, कर्म कैसे करें? के अतिरिक्त आत्मान्वेषी (संस्मरण) यह कृति गुरु महाराज विद्यासागरजी का अनुपम परिचय है।

जैन दर्शन पारिभाषिक कोष (संकलन), गुरुवाणी तथा जीवन के अनसुलझे प्रश्न (प्रवचन संग्रह)। क्षमासागरजी एक ऐसे महासंत थे, जो सदा ही अपने महामना गुरु विद्यासागरजी की आज्ञा में रहे। उनके मार्गदर्शन में अपने संतत्व का पोषण करते रहे। पूर्णत: समर्पित रहे। गुरु के प्रिय शिष्य रहे। गुरु की साधना, चर्या, तप और तपस्या आपको बाहर-भीतर से द्रवित कर देती थी। आपके जीवन के अंतिम 7 वर्षों में आपने कर्मोदय से हुई दैहिक-मानसिक पीड़ा को अंतिम श्वास तक समतापूर्वक सहन करने की अद्भुत क्षमता प्राप्त कर ली थी।

अंत समय तक संयम मार्ग से डिगे नहीं। उसे छोड़ा नहीं। मोक्ष मार्ग बना रहा। सजग रहे, सचेत रहे। आपका यह कथन सार्थक हो गया है- ‘सिद्ध नाम सत्य है, अरिहंत नाम सत्य है।’ आपकी समाधि मध्यप्रदेश के सागर में स्थित वर्णी आश्रम में प्रात: 5 बजकर 13 मिनट पर आचार्य महाराज विद्यासागरजी के सुशिष्य मुनिश्री भव्यसागरजी के सान्निध्य में तथा 2 ब्रह्मचारी भैयाजी की उपस्थिति में समतापूर्वक हुई। निश्चित ही यह भव्य आत्मा मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हुई होगी।

इस संसार में संत-स्वरूप में मुनिश्री क्षमासागरजी की रचित इस कविता के भाव, जो जीवन से मुक्त होने के समय की घटना पर व्यक्त किए गए हैं, अदभुत रूप से प्रासंगिक हैं-

था मैं नींद में और मुझे इतना सजाया जा रहा था…
बड़े प्यार से मुझे नहलाया जा रहा था…

ना जाने था वो कौन सा अजब खेल मेरे घर में…
बच्चों की तरह मुझे कंधे पर उठाया जा रहा था…

था पास मेरा हर अपना उस वक़्त…
फिर भी मैं हर किसी के मन से भुलाया जा रहा था…

जो कभी देखते भी न थे मोहब्बत की निगाहों से…
उनके दिल से भी प्यार मुझ पर लुटाया जा रहा था…

मालूम नहीं क्यों हैरान था हर कोई मुझे सोते हुए देखकर…
जोर-जोर से रोकर मुझे जगाया जा रहा था…

काँप उठी मेरी रूह वो मंज़र देखकर…
जहाँ मुझे हमेशा के लिए सुलाया जा रहा था…

मोहब्बत की इंतहा थी जिन दिलों में मेरे लिए…
उन्हीं दिलों के हाथों, आज मैं जलाया जा रहा था…

‘शुक्रवार 13 मार्च 2015 का दिन संतत्व के नाम हो गया। 50 हजार से भी अधिक भक्तजनों की उपस्थिति में आपका अंतिम संस्कार भाग्योदय तीर्थ के बड़े भू-भाग में किया गया। मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हुए संत को विनयपूर्वक नमन, नमन, नमन!’

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