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मंगल प्रवचन : आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज (कुंडलपुर) [08/06/2016]

सत्तन की कविताओं से आचार्यश्री हुए भाव-विभोर

कुंडलपुर। महामस्तकाभिषेक महोत्सव के इन 5 दिनों में आप अपने आपको पहचानें, एक-दूसरे को पहचानें। हम परमार्थ तत्व के अनुरूप हैं, यह बोध हो जाए। यह बोध आदर्श बने और हम दिव्य शक्ति को प्राप्त करें।

उक्त उद्गार विश्व संत आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने कुंडलपुर में आयोजित महोत्सव में व्यक्त किए। आचार्यश्री ने आगे स्वरचित मूक माटी महाकाव्य की 2 पंक्तियां सुनाईं। पात्र के बिना पानी रुक नहीं सकता, पात्र के बिना प्राणी रुक नहीं सकता।

मुक माटी की ये पंक्ति है- अंतर में कौन सा धर्म है, मूक माटी बोलती है। किसी के पास कान हो तो वह सुन सकता है। भीतरी कान तक सम्प्रेषित करता है। हमें भी उस पात्र की खोज है। कोई भी कवि, लेखक, वक्ता होता उसके भीतर जो भाव है, कोई न कोई नाम लिखकर अभिव्यक्त करता है।

कोई भी अभिव्यक्ति के शब्द जब कमजोर पड़ते, तब ऐसे भावों को व्यक्त करता। कोई भी कमी नहीं। मंच पर कविता पाठ करते-करते ताली बजवाते हैं। ताली बजवाना रहस्य होता है। कवि पंक्ति भूल जाता है तभी ताली बजवाता है।

ध्वनि को प्रकाश मिले, उसमें सरलता एकमात्र ही ध्वनि का विकास है। हम जितनी सरलता से व्यक्त करेंगे, ताली बजाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। श्रोताओं की इतनी प्यास बढ़े कि ‘आपकी अभिव्यक्ति एक बार और हो’ की आवाज आए।

भावाभिव्यक्ति पूर्व की अपेक्षा से शब्द न भी मिले, भाव के माध्यम से कविता की पूर्ति कर सकते हैं। शब्द पंगु है। अर्थ की अभिव्यक्ति करने में पंगु हुआ करते हैं। उसके लिए उदाहरण ढूंढें। दृष्टांत की ओर ध्यान दें। हम उसके लिए अनुभव की बात कहना चाहें। अनुभव के बिना शब्द में जान नहीं। शब्द एक जड़ वस्तु है। अभिव्यक्ति में बहुत विराटता आती। हाइको कृति दिपाई की भांति अर्थ को ऊंचा उठा देती। मंच पर जो भी बोलता, जनता के मन को देखकर कविता करना चाही।

जयकुमार जलज ने बताया कि इस अवसर पर राष्ट्रीय कवि सत्यनारायण ‘सत्तन’ ने अपनी छुटपुट कविताओं के माध्यम से खचाखच भरे पंडाल को ‘वाह-वाह’ कहने पर मजबूर कर दिया।

उनकी रचनाओं की सराहना आचार्यश्री ने तो की ही, उपस्थित जन-समुदाय को भी बेहद पसंद आई। डॉ. एसएन सुब्बाराव ने बहुत ही आध्यात्मिक भजन की प्रस्तुति से आचार्यश्री सहित जन समूह को भाव-विभोर कर दिया।

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