दीक्षार्थियों ने मुनिदीक्षा के लिए परमपुज्य आचार्यश्री समयसागरजी महाराज से विनति कीमेरी भावना | Meri Bhavanaकेंद्रीय मंत्री शाह ने आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र वाले 100 रुपये के सिक्के का किया विमोचनआचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की याद में भोपाल में बनेगा स्मारकदुनिया को विद्यासागरजी की शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिएः भागवतसंत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी को प्रधानमंत्री की श्रद्धांजलिआचार्यश्री को भावांजलिआचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ने समाधि लीअष्टान्हिका पर्व का महत्वसाधु जीवन दर्शन

सम्मेद शिखर जी एवं कैलाश पर्वत पर विराजमान चरणों का ध्यान/सामायिक

सर्वप्रथम कुंथुनाथ भगवान की स्तुति अथवा अर्घ (बिना द्रव्य के) पढते हुए क्रमशः 24 भगवानों की स्तुति पढते हुए चरणों का अवलोकन करते हुए सिद्ध भगवान अथवा अरिहंत भगवान के दर्शन करते हुए सामायिक या ध्यान कर सकते हैं। यदि हो सके तो जिस टोंक से जितने मुनि मोक्ष पधारें उनकी संख्या भी मन में स्मरण कर सकते हैं। यदि और समय हो तो प्रत्येक टोंक पर मन ही मन कार्योत्सर्ग भी कर सकते हैं।

चौबीस तीर्थंकर का ध्यान

सर्वप्रथम आदिनाथ भगवान की स्तुति अथवा अर्घ (बिना द्रव्य के) पढते हुए क्रमशः महावीर भगवान तक मन ही मन में पढें और एक-एक कार्योत्सर्ग करें अथवा महावीर भगवान से आदिनाथ तक भी पढ सकते हैं। या बीच-बीच के क्रम से भी पढ सकते हैं। और भगवान के रंग के हिसाब से भी पढ सकते हैं।

दो गोरे दो साँवले दो हरियल दो लाल।

सोलह सवर्ण समान हैं जिन्हें नमूँ नत भाल॥

सफेद 8 : चन्द्र प्रभु, पुष्पदंत नीलवर्ण: नेमीनाथ, मुनिसुव्रत, हरा : सुपर्श्वनाथ, पार्श्वनाथ,

लालवर्ण : पद्य प्रभु, वासू पूज्य, स्वर्णवर्ण : ऋषभ, अजित, सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, शीतल, श्रेयांस, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुंथु, अरह, मल्लि, नमि, महावीर।

ह्रीं का ध्यान

ह्रीं में 24 तीर्थंकर समाहित हो जाते हैं और हम उनका स्मरण सामायिक/ध्यान में अलग-अलग रंग के हिसाब से कर सकते हैं। जैसे- सफेद चन्द्रप्रभ, पुष्पदंत नीलवर्ण नेमिनाथ मुनिसुव्रत हरा वर्ण सुपर्श्वनाथ, पार्श्वनाथ लालवर्ण पद्य प्रभु, वासुपूज्य स्वर्णवर्ण ऋषभ, अजित, सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, सीतल, श्रेयांस, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुंथु, अरह, मल्लि, नमि, महावीर प्रत्येक भगवान की स्तुति अथवा अर्घ (बिना द्रव्य के) सामायिक में पढ सकते हैं और मोक्ष स्थान टोके और उनका जीवन आदि भी स्मरण कर सकते हैं। और कार्योत्सर्ग भी मन में कर सकते हैं। इस ध्यान से आत्मा और शरीर दोनों को बहुत एनर्जी मिलती है जिससे दोनों स्वस्थ हो जाते हैं।

श्री णमोकार मंत्र का ध्यान

अरिहंत परमेष्ठि का सफेद रंग होता है, सिद्ध परमेष्ठी का रंग लाल होता है, आचार्य परमेष्ठी का रंग पीला होता है। उपाध्याय परमेष्ठी का रंग नीला होता है और साधु परमेष्ठी का काला रंग होता है। इस प्रकार रंग के हिसाब से ध्यान करें और एक-एक परमेष्ठी के मूल गुण का भी चिंतन कर सकते हैं।

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