दीक्षार्थियों ने मुनिदीक्षा के लिए परमपुज्य आचार्यश्री समयसागरजी महाराज से विनति कीमेरी भावना | Meri Bhavanaकेंद्रीय मंत्री शाह ने आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र वाले 100 रुपये के सिक्के का किया विमोचनआचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की याद में भोपाल में बनेगा स्मारकदुनिया को विद्यासागरजी की शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिएः भागवतसंत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी को प्रधानमंत्री की श्रद्धांजलिआचार्यश्री को भावांजलिआचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ने समाधि लीअष्टान्हिका पर्व का महत्वसाधु जीवन दर्शन

जैन धर्म की मौलिक विशेषताएँ

जैन धर्म शाश्वत है। (हरिवंश पुराण १/२७-२८) तीर्थंकर ऋषभदेव तथा महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं, अपितु प्रचारक थे।

सिंधु सभ्यता में जैन धर्म के अस्तित्व के प्रमाण हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता की योगी की कायोत्सर्ग मुद्रा अब भी जैनों में प्रचलित है।

जैन धर्म प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल में भरत क्षेत्र में २४ तीर्थंकरों के अस्तित्व को मानता है। (हरिवंश पुराण १/४-२४, पदमचरित ५/१९१-१९५)

जैन पंचपरमेष्ठियों की पूजा करते हैं।

जैन धर्म के अनुसार मनुष्य सर्वत्र हो सकता है। प्रमाण मीमांसा (पृ. २७-३)

जैन धर्म के अनुसार ईश्वर सृष्टिकर्ता नहीं है।

जैनों के मूल ग्रंथों की भाषा प्राकृत है।

जैन वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं।

जैन पूजा में सभी प्रकार की हिंसा वर्जित है।

जैनों के मूल ग्रंथ आचारांग-सूत्र-कृतांग आदि हैं। तत्वार्थसूत्र १/२०, सर्वार्धसिद्धि १/२०)

जैन धर्म वर्ण-व्यवस्था को जन्मना नहीं मानता है।

शूद्र भी धर्मपालन का अधिकारी है। (सागर धर्मामृत २/२२)

मोक्ष हेतु पुत्र आवश्यक नहीं है। (ज्ञानार्ठाव २/८/११)

जैन साधु नवधाभक्ति पूर्वक आहार लेते हैं।

जैन धर्म में मांसाहार पर पूर्णतः प्रतिबंध है। (पुरुषार्थ सिद्धयुपाय ६७-६८)

जैन धर्म में मद्यपान पर पूर्णतः प्रतिबंध है।

आटा, घी, शक्कर आदि की पशुमूर्ति बनाकर उसे खाना जैन धर्म में पूर्णतः वर्जित है। (जसहर चरित्र – २७)

जैनों में श्राद्ध प्रथा नहीं है। (स्याद्वाद मंजरी पृ-९७, भाव संग्रह-५०)

प्रवचन वीडियो