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रक्षाबन्धन

अनेकांत कुमार जैन

रक्षाबन्धन का पर्व भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख उत्सव है। इस पर्व से सम्बन्धित अनेक कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। भारत के लगभग सभी धर्मों में यह पर्व अत्यंत आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है। जैन धर्म में यह त्योहार मात्र सामाजिक ही नहीं वरन आध्यात्मिक भी है। इस त्योहार का सम्बन्ध सिर्फ गृहस्थ से ही नहीं मुनियों से भी है।

जैन पुराणों के अनुसार, उज्जयिनी नगरी में श्री धर्म नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार मंत्री थे जिनका नाम क्रमशः बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद था। एक बार परमयोगी दिगम्बर जैन मुनि अकंपनाचार्य अपने सात सौ मुनि शिष्यों के साथ ससंघ उज्जयिनी पधारे। श्री धर्म ने इन मुनियों के दर्शन की उत्सुकता जाहिर की किंतु चारों मंत्रियों ने मना कर दिया। फिर भी राजा मुनियों के दर्शन को गये। जब राजा पहुँचे तो सभी मुनि अपनी ध्यान साधना में लीन थे। मंत्रियों ने इसे अपमान बतलाकर राजा को भडकाने का प्रयास किया। मार्ग में उनकी मुलाकात श्रुतसागर मुनिराज से हो गयी। श्रुतसागर मुनि अगाध ज्ञान के सागर थे। मंत्री उनसे शास्त्रार्थ करने लगे किंतु राजा के सामने ही मंत्री पराजित हो गये। अपने इस अपमान का बदला लेने के लिये मंत्रियों ने ध्यानस्थ उन्हीं मुनि के उपर जैसे ही तलवार से प्रहार किया उनके हाथ उठे के उठे वहीं स्थिर हो गए। श्री धर्म ने उनके इस अपराध पर उन्हें देश से निकाल दिया।

चारों मंत्री अपमानित होकर हस्तिनापुर के राजा पद्म की शरण में आए। वहाँ बलि ने राजा के एक शत्रु को पकडवा कर राजा से मुँहमांगा वरदान प्राप्त कर लिया तथा समय पर वरदान लेने को कह दिया। कुछ समय बाद उन्हीं मुनि अकंपनाचार्य का सात सौ मुनियों का संघ विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुँचा तथा वहीं चातुर्मास किया। बलि को अपने अपमान का बदला लेने का विचार आया। उसने राजा से वरदान के रूप में सात दिन के लिये राज्य माँग लिया। राजा को सात दिन के लिये राज्य देना पडा। राज्य पाते ही बलि ने जिस स्थान पर सात सौ मुनि तथा उनके आचार्य साधना कर रहे थे, उसके चारों तरफ एक ज्वलनशील बाडा खडा किया और उसमें आग लगवा दी। लोगों से कहा कि वह एक पुरुषमेघ यज्ञ कर रहा है। अन्दर धुँआ भी करवाया। इससे ध्यानस्थ मुनियों के गले कटने लगे, आँखें सूज गयीं  और ताप से अत्यधिक कष्ट हुआ। इतना कष्ट होने पर भी मुनियों ने अपना धैर्य नहीं तोडा उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जबतक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तबतक अन्न जल का त्याग रखेंगे।

जिसदिन बलि आदि द्वारा यह भयंकर उपसर्ग किया जा रहा था वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का दिन था। जब यह घटना घट रही थी, उसी समय मिथिला नगरी में निमिषज्ञानी आचार्य सारचन्द तपस्या कर रहे थे। उन्हें इस घटना का पता चला। अनायास ही उनके मुँह से हा, हा निकला। इससे उनके शिष्य क्षुल्लक पुष्टदंत को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। शिष्य के पूछने पर आचार्य ने निमिषज्ञान से प्राप्त सारी घटना बतला दी। आचार्य ने कहा कि धरणीभूषण पर्वत पर एक विष्णुकुमार मुनिराज कठोर तप कर रहे हैं। उन्हें विक्रिया ऋद्धि उत्पन्न हुई है। वे चाहें तो इन मुनियों के संकट दूर कर सकते हैं। अन्यथा कोई उपाय नहीं है। क्षुल्लक पुष्टदंत आकाश मार्ग से तुरंत विष्णुकुमार मुनिराज के पास पहुँच गये और सारा वृतांत कह दिया।उन्हें स्वयं पता नहीं था कि उन्हें विक्रिया उत्पन्न हुई है। इसलिये हाथ फैला कर उन्होंने इस बात की परीक्षा ली और तत्काल हस्तिनापुर पहुँचे। मुनिराज विष्णुकुमार ने मुनि अवस्था को छोडकर वामन का वेष धारण किया और बलि के यज्ञ में भिक्षा माँगने पहुँच गये और बलि से तीन पैर धरती मांगी। बलि ने दान का संकल्प किया तो विष्णुकुमार ने ऋद्धि से अपने शरीर को बहुत अधिक बढा लिया।

उन्होंने एक पैर सुमेरू पर्वत पर रखा, दूसरा पैर मानुषात्तर पर्वत पर रखा और तीसरा पैर स्थान ना होने के कारण आकाश में डोलने लगा। तब सर्वत्र हाहाकार मच गया। देवताओं तक ने विष्णुकुमार अमुनि से विक्रिया को समेटने की प्रार्थना की। बलि ने भी क्षमा याचना की। उन्होंने अपनी विक्रिया को समेट लिया। बलि को देशनिकाला दिया गया। सात सौ मुनियों का उपसर्ग भी दूर हुआ। उनकी रक्षा हुई।

बलि के अत्याचार से सभी दुःखी थे। लोगों ने यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि जब मुनियों का संकट दूर होगा तब उन्हें आहार करवाकर ही भोजन ग्रहण करेंगे। संकट दूर होने पर सभी लोगों ने दूध, खीर आदि हल्का भोजन तैयार किया क्योंकि मुनियों का उपवास था। मुनि केवल सात सौ थे। अतः वे केवल सात सौ घरों में ही पहुँच सकते थे। अतः शेष घरों में उनकी प्रतिकृति बना कर और उसे आहार दे कर प्रतिज्ञा पूरी की गयी। सभी ने परस्पर रक्षा करने का बन्धन बाँधा। जिसकी स्मृति आजतक रक्षाबन्धन त्योहार के रूप में आज तक चल रही है। इसे श्रावनी तथा सलोना पर्व भी कहते हैं। इस दिन बहन तो भै को रक्षा के लिये राखी बाँधती ही है साथ ही सभी लोग अपने राष्ट्र, धर्म, शास्त्र एवं जीवन रक्षा का भी संकल्प लेते हैं।

साभार: राज एक्सप्रेस इंदौर ३ अगस्त सोमवार

आचार्यश्री

23 नवंबर 1999 को आचार्यश्री का इंदौर से विहार हुआ था। तब से अब तक प्रतीक्षारत इंदौर समाज

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मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार जबलपुर से यहां होना चाहिए :




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