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मंगल प्रवचन- आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज

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कुंडलपुर। व्यक्ति सम्यगदृष्टि सम्यगज्ञान के माध्यम से सिद्धांत के बलबूते अपने मोक्ष मार्ग के लिए कार्य करता रहता है। परोक्ष में भी प्रत्यक्ष का दर्शन किया जा सकता है। ज्ञानी लोग अपनी धारणा, अनुभूति एवं आस्था के माध्यम से बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं।

परोक्ष में रहते हुए भी चिंतन-मनन से भगवान का ध्यान करते रहते हैं और दूसरों को भी प्रोत्साहित करते रहते हैं। उपदेशों का प्रचार-प्रसार करते जाओ, धर्म की प्रभावना होती जाएगी। गुरुओं ने जो ग्रंथ लिखे, वे आज भी पृष्ठ खोलते ही आत्मा और परमात्मा का स्वरूप हमारे सामने रख देते हैं।

उपरोक्त उदगार आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने प्रात:काल कुंडलपुर में अपने उद्धबोधन में अभिव्यक्त किए। इसके पूर्व आचार्यश्री की पूजन प्रतिमा स्थली से आई बहनों के द्वारा सामूहिक रूप से संपन्न की गई। इसके पश्चात आचार्यश्री को नवधा भक्ति के साथ आहार प्रदान करने का सौभाग्य शाकाहार उपासना परिसंघ एवं कुंडलपुर कमेटी के वरिष्ठ सदस्य महेश बड़कुल को प्राप्त हुआ।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि मोक्ष मार्ग में प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होते हुए भी सुनकर आप अनुभव कर लेते हैं। सांसारिक कार्यों में भी हम पुरानी बातों को याद करके प्रत्यक्षवत अनुभव करते रहते हैं। इसी तरह मोक्ष मार्ग में भी हम उसी क्षेत्र अथवा उसी वस्तु का अनुभव कर सकते हैं, जो आत्मा की ओर ले जाए। परोक्ष में भी प्रत्यक्षवत अनुभव करना ये श्रद्धा व चिंतन-मनन के आधार पर संभव है। यदि कोई व्यक्ति बूढ़ा है और वह बड़े बाबा का चिंतन करता है तो जवान व्यक्ति से भी पहले वह बड़े बाबा के चरणों में पहुंच सकता है। उसे बड़े बाबा के दर्शन आंखें बंद करने के साथ ही हो जाते हैं।

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