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घोर तपस्वी साधक और प्रकांड विद्वान जैन मुनि क्षमासागर महाराज की समाधि, हजारों ने दी श्रद्धांजलि

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नई दिल्ली, (शोभना जैन, वीएनआई)। घोर तपस्वी संत, दार्शनिक और दिगंबर जैन परंपरा के साधक मुनिश्री 108 क्षमासागरजी ने सागर, मध्यप्रदेश में समाधि ग्रहण कर ली, kshmasagarसमाधिमरण के बाद निकली पद्मासन पालकी शोभायात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। हजारों की संख्या में मौजूद लोग मुनिश्री के अंतिम विहार के साक्षी बने। वे पिछले कुछ वर्षों से काफी बीमार चल रहे थे और पूरी तरह से अशक्त हो चुके थे लेकिन गंभीर स्वास्थ्य में भी उन्होंने कठोर मुनिचर्या का पालन जारी रखा।

प्रकांड विद्वान रहे मुनिश्री प्रेरक संत आचार्य विद्यासागर के संघ से जुड़े थे, एमटेक की शिक्षा प्राप्त मुनिश्री शिक्षा ग्रहण करने के समय से ही अध्यात्म की तरफ बढ़ चुके थे। शिक्षा पूरी होने के उपरांत उन्होंने नौकरी या व्यवसाय करने की बजाय आचार्य विद्यासागर से प्रेरित हो मुनि दीक्षा ले ली।

आचार्यश्री की ज्ञान साधना और तप उनके लिए सदैव प्रेरक रहे और वे अंत समय तक उसका अनुसरण करते रहे। मुनिश्री 108 क्षमासागरजी महाराज द्वारा आचार्यश्रीजी को समर्पित कविता की कुछ पंक्तियां :

मुक्ति, जो ज्योति-सा, मेरे ह्दय में, रोशनी भरता रहा, वह देवता।
जो सांस बन, इस देह में, आता रहा, वह देवता।
जिसका मिलन, इस आत्मा में, विराग का, कोई अनोखा गीत बनकर गूंजता, प्रतिक्षण रहा, वह देवता।
मैं बंधा जिससे, मुझे जो मुक्ति का, संदेश नव देता रहा, वह देवता।
जो समय की, तूलिका से, मेरे समय पर, निज समय लिखता रहा, वह देवता।
जो मूर्ति में, कोई रूप धरता, पर अरुपी ही रहा, वह देवता।
जो दूर रहकर भी, सदा से साथ मेरे है, यही अहसास देता रहा, वह देवता।
मैं जागता हूं या नहीं, यह देखने, द्वार पर मेरे, दस्तक सदा देता रहा, वह देवता।
जो गति, मेरे नियति था, ठीक मुझ-सा ही, मुझे करता रहा, वह देवता…

मुनिश्री ने आचार्यश्री पर आधारित संस्मरण आत्मनवेषी पुस्तक एवं अमृत शिल्पी भी लिखी। आचार्यश्री का उन पर विशेष आशीर्वाद था। युवापीढ़ी को विशेष तौर पर उन्होंने अपने ओजपूर्ण और प्रेरक जीवन से बहुत प्रभावित किया और जैन समाज की नई पीढ़ी उन्होंने अपने तार्किक प्रवचनों और प्रभावी शैली से उन्हें अध्यात्म और सद् विचारों के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने कठिन तपस्या से अपनी आत्मा का कल्याण किया है, लेकिन उनके चले जाने से जैन धर्म व जैन समाज की अपूरणीय क्षति हुई है। जैन समाज के श्रद्धालु और जैन साधु-संतों के साथ विभिन्न धर्मगुरुओं ने उनके कल्याण को अपूरणीय बताया है। उनकी कविताएं जैन दर्शन और अध्यात्म को सर्वथा सरल तरीके से श्रद्धालुओं तक पहुंचती हैं और उन्हें आत्मचिंतन की ओर ले जाती है, सागर स्थित वर्णी भवन मोराजी में आचार्यश्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य मुनिश्री 108 क्षमासागरजी महाराज ने विधि के तहत समाधि ली। सदा त्याग, तप और अनुशासन प्रिय साधक का अंतिम संबोधन मुनिश्री भव्यसागरजी महाराज द्वारा दिया गया।

मुनिश्री क्षमासागर का जन्म 20 सितंबर, 1957 को सागर के बड़ा बाजार क्षेत्र में हुआ था। संयोग यह भी है समाधिमरण भी उन्होंने बड़ा बाजार क्षेत्र में ही लिया। उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से ही उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। मुनिश्री ने 23 साल की उम्र में मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए आचार्य विद्यासागर महाराजजी से दीक्षा प्राप्त की थी। आचार्य विद्यासागर महाराज के संघ में उच्च शिक्षित, प्रखर वक्ता, ओजस्वी वाणी तथा सरल सौम्य व्यवहार के कारण देशभर में उनके लाखों भक्त बने। उन्होंने पगडंडी सूरज तक, मुनि क्षमासागर की कविताएं जैसे काव्य संग्रह लिखे-

जीवन के सत्य को अंकित करने वाली मुनिश्री क्षमासागरजी द्वारा रचित एक लघु कविता-

गंतव्य यात्रा पर निकला हूं, बार-बार लोग पूछते हैं,
कितना चलोगे..? कहां तक जाना है..?
मैं मुस्कराकर आगे बढ़ जाता हूं,
किससे कहूं कि कहीं तो नहीं जाना।
मुझे इस बार अपने तक आना है।

(साभार : www.vniindia.com)

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