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गाँधीजी के 94 वर्ष पूर्व में व्यक्त विचार : हिन्दी की आवश्यकता

महात्मा गाँधी : (फरवरी 2, 1921)

Mahatma Gandhiअसहयोग कार्यक्रम को स्वीकार करके जिन विद्यार्थियों ने सरकारी विद्यालयों का बहिष्कार किया है, उनको मैंने दो आदेश दिए हैं। एक तो सालभर चरख़ा कातने और सूत तैयार करने में सन्नद्ध रहना तथा दूसरे हिन्दी भाषा सीखने की चेष्टा करना। मुझे इस बात से अतिशय प्रसन्नता है कि कलकत्ता के छात्रों ने इस प्रश्न को उठा लिया है। बंगाल और मद्रास इसी दो प्रांत में हिन्दी का अधिक प्रचार नहीं है और इसके न होने से समस्त भारतवर्ष से वे भिन्न प्रतीत होते हैं। इस कमी के दो कारण हैं। बंगाल दो किसी अन्य देशी भाषा का सीखना-पढ़ना अपने लिए अपमानजनक समझता है और मद्रासी लोग द्रविड़ जाति के होने से हिन्दी भाषा सहज में सीख नहीं सकते हैं।

यदि प्रतिदिन तीन घण्टा समय लगाया जाए तो प्रत्येक बंगाली 2 मास में और मद्रासी 6 मास में हिन्दी भाषा मज़े में समझ सकता है। पर उतने ही समय में अँग्रेजी भाषा का उतना ज्ञान न तो कोई बंगाली ही प्राप्त कर सकता है और न कोई द्रविड़ मद्रासी ही प्राप्त कर सकता है। और यदि अँग्रेजी सीख भी लिया जाए तो, उसका उपयोग कितने लोगों के साथ किया जाएगा। गिने-गिनाए ही भारतवासी मिलेंगे, पर यदि हिन्दुस्तानी का ज्ञान प्राप्त कर लिया जाए तो समस्त भारतवर्ष के साथ बातचीत करने और भावविनियोग की सुविधा हो जाए।

इसलिए मुझे पूरी आशा है कि अग्रिम कांग्रेस में मद्रास और बंगाल के प्रतिनिधि हिन्दी भाषा समझने के लिए तैयार होकर आएंगे। हमारी सबसे बड़ी प्रतिनिधि सभा (वर्तमान में संसद) अपना प्रभाव अच्छी तरह नहीं डाल सकती जब तक वह उसी भाषा का प्रयोग न करे जिसे अधिकांश जनसंख्या समझ सकती हो। मैं मद्रासियों की कठिनाई को भलीभाँति समझता हूँ और उसका पूरी तरह से अनुभव करता हूँ, पर मेरी समझ में देशप्रेम के सामने कोई भी कठिनाई किसी काम की नहीं है।

साथ ही मैंने इस बात की भी सलाह दी है कि इस वर्ष अर्थात जिस समय हम लोग बराबरी के लिए स्पर्धा कर रहे हैं, विदेशी जुएँ को उतारकर स्वराज्य की चेष्टा कर रहे हैं- अँग्रेजी की पढ़ाई एकदम बंद रहे। यदि हम अगली कांग्रेस तक वास्तव में स्वराज्य लेना चाहते हैं, तो हमें इसकी संभावना पर विश्वास करना चाहिए, उसके लिए जहाँ तक हो सके चेष्टा करनी चाहिए और उस तरह के प्रत्येक काम से परहेज़ करना चाहिए जिससे स्वराज्य के काम में किसी तरह की बाधा पहुँचे या उसकी गति रुक जाए। इस तरह अँग्रेजी भाषा का ज्ञान प्राप्त करना हमारे मार्ग में किसी तरह से सहायक नहीं हो सकता बल्कि कुछ न कुछ बाधा ही उपस्थित कर सकता है।

जिस अँग्रेजी भाषा को हम लोग अपने विकास के लिए बाधा समझते हैं उसी के विषय में कुछ लोगों का मत है बिना इसके हम में स्वतंत्रता का भाव ही नहीं उत्पन्न हो सकता। इसे एक तरह का पागलपन समझना चाहिए। यदि उनका अनुमान सही है और बिना अँग्रेजी भाषा के ज्ञान के हमें स्वराज्य नहीं मिल सकता तो हम दावे से कह सकते हैं कि स्वराज्य एक दूर का सपना है। अँग्रेजी भाषा अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय, राजनीतिक चालबाजियां तथा पश्चिमी सदाचार, संस्कृति और सभ्यता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक है पर इतने के लिए ही हमें उसे अनिवार्य बना देने की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। हम में से कुछ एक लोग ही उसका ज्ञान प्राप्त करके आवश्यकता को मिटा सकते हैं।

वे ही लोग कामों को संपन्न करेंगे और विदेशी साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान से उपयोगी बातें ढूँढ निकालकर अपने देशवासियों के समक्ष रखेंगे और उन सबका उन्हें परिचय देंगे।

अँग्रेजी भाषा का यही प्रयोग उचित कहलाएगा, पर वर्तमान समय में अँग्रेजी भाषा ने हमारे हृदयों पर ज़बर्दस्ती आसन जमा लिया है और प्यारी मातृभाषा को नीचे रख दिया है। इस असमानता और विषमता का प्रधान कारण यह है कि हमारा अँग्रेजों के साथ संबंध अप्राकृतिक तरीके से है। हम लोगों को इस तरह का यत्न करना है जिससे हमारा पूर्ण विकास बिना अँग्रेजी भाषा की सहायता से हो जाए। देश में इस बात का प्रचार करना कि अँग्रेजी भाषा के ज्ञान के बिना स्त्री-पुरुषों को किसी सभा समाज में मिलना-जुलना कठिन है, मानव समाज के साथ हिंसा करना है। यह भाव इतना पतित है कि इसे बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। स्वराज्य पाने का एक शर्त यह भी है कि हमें अँग्रेजी भाषा से छुटकारा पाने के लिए पागल हो जाना चाहिए।

 प्रेषक:-


निर्मलकुमार पाटोदी
विद्या-निलय, 45, शांति निकेतन
(बॉम्बे हॉस्पिटल के पीछे),
इन्दौर-452010 (म.प्र.)
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आचार्यश्री

23 नवंबर 1999 को आचार्यश्री का इंदौर से विहार हुआ था। तब से अब तक प्रतीक्षारत इंदौर समाज

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