योगसागर जी महाराज (ससंघ) के गोटेगांव पहुंचने की संभावना है।मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज बावनगजाजी में विराजमान हैं आचार्यश्री की जानकारी अब Facebook पर Youtube - आचार्यश्री विद्यासागरजी के प्रवचन देखिए Youtube पर आचार्यश्री के वॉलपेपर Android पर शाकाहारी रेस्टोरेंट Android पर दिगंबर जैन टेम्पल/धर्मशाला Android पर देश और विदेश के जैन मंदिरों एवं जिनालय की जानकारी के लिए www.jaintemple.in विजिट करें Apple Store - शाकाहारी रेस्टोरेंट आईफोन/आईपैड पर Apple Store - जैन टेम्पल आईफोन/आईपैड पर

आचार्यश्री का 48वां दीक्षा दिवस समारोह – 21 जुलाई 2015


निर्मलकुमार पाटोदी
विद्या-निलय, 45, शांति निकेतन
(बॉम्बे हॉस्पिटल के पीछे),
इन्दौर-452010 (म.प्र.)
मोबा.- +91-07869917070 मेल:
[email protected]

दुनिया में भारत का अध्यात्मिक जीवन सर्वोपरि है। जहां प्रथम तिर्थंकर आदिनाथ (रिषभदेव), राम, कृष्ण, महावीर, गौतम, कुन्दकुन्दाचार्य, सम्राट अशोक, आदि शंकराचार्य, कम्बन, तिरुवल्लूवर, गुरुनानकदेव और महात्मा गाँधी जैसे अनेक महामना हुए हैं। जिनका व्यवहार प्राणी मात्र के प्रति प्रेम, दया और करुणा का रहा है।

प्रसंग: मुनि दीक्षा दिवस- मंगलवार, 21, जुलाई 2015 | जग उपकारक, विश्व-विभूति विद्यासागर

Aacharya Shri 250

इसी क्रम में ज्योतिर्गमय, निर्ग्रन्थ, आत्मतत्व के साधक विद्यासागर हमारी राष्ट्र-धरा पर विद्यमान हैं। आप के प्रति अटूट श्रद्धा-भक्ति के वशीभूत होकर सभी क्षेत्रों के महानुभाव दर्शनार्थ एवं मार्गदर्शन के लिये पधारे हैं। उनमें माननीय अटलबिहारी वाजपेयी, भैंरोसिंह सेखावत, शंकराचार्य दयानन्द सरस्वती, रुप. सी. सुदर्शन, संगीतकार रवीन्द्र जैन, से. बी. प्रमुख डी. आर. मेहता, वीरेन्द्र हेगड़े, मोहन भागवत, केन्द्रीय मंत्रियों में-माधवराव सिंधिया, विद्याचरण शुक्ल, धनंजय जैन, अर्जुनसिंह, फगनसिंह कुलस्ते, दलवीरसिंह, सरताजसिंह, मेनका गाँधी, सुमित्रा महाजन, कमलनाथ, उमा भारती, काशीराम राणा, प्रदीप जैन, राज्यपालों में-ए.पी. शर्मा, ए.आर किदवई, कुँवर मोहम्मद अलि, बलराम जाखड़, निर्मलचन्द जैन, कृष्णमोहन सेठ,उर्मिला सिंह, दैनिक भास्कर के रमेश अग्रवाल, बाबा रामदेव,

अशोक सिंघल, बाबा रामदेव, शिवराजसिंह चौहान एवं रमनसिंह आदि हैं।

एक ओर आप दार्शनिक, मौलिक चिंतक और समाज उद्धारक हैं, तो दूसरी ओर जीव दया, अहिंसा, करुणा, और प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के प्रबल पक्षधर भी हैं।

* भारतीय सँस्कृति के पोषक विद्यासागर कुछ वर्षों से सरकार द्वारा अपनाई जा रही सब्सिडी देकर जीवित पशुओं का वध कर के विदेशी मुद्रा कमाने के लिए माँस, चमड़ा और इनके अन्य उत्पादों का निर्यात करने की हिंसक-व्यापार की नीति से व्यथित हैं। ऐसा व्यापार भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ ? यह संस्कृति, पर्यावरण एवं संविधान की मूल भावना के भी विपरित है। आपका मानना है पशुधन ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था का आधार है। प्रकृति में वन, पशु, जल, भूमि, पहाड़ तथा जीव-जगत का अनुपात स्वत: सन्तुलित रहता है। वर्तमान में यह सन्तुलन तेज़ी से बिगड़ रहा है। गो-वंश के पालन से राष्ट्र आत्म-निर्भर, स्वस्थ्य और अहिंसक हो जायगा। दया, करुणा, प्रेम का वात्सल्य बढ़ जायगा। राम का सतयुग और कृष्ण के नन्दनवन की कल्पना समाहित हो जायगी। आपका उद्घोष है-“पशु धन बचाओ”, “मांस निर्यात बन्द करो”, “गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करो”। “गाय को मुद्रा पर अंकित करो”।

* हमारा राष्ट्र कभी सोने की चिड़िया रहा है। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, वालभी, सौमपुरा, ओडान्दपुरी आदि ज्ञान-विज्ञान के प्राचीन केन्द्र रहे हैं। इनमें विदेशों से अध्ययन के लिये विद्यार्थी आते थे। अँग्रेजी शासन के आने के बाद कच्चा माल ले जाया गया और उसका उत्पादन कर के हमारे यहां ला कर लूटने, शोषण और ग़ुलाम बनाए रखने की नीति अपनाई गयी। उनका खान-पान, रहन-सहन, पहनावा, अंग्रेजी भाषा और शिक्षा-प्रणाली थोप दी गयी। हमें अपने इतिहास, अध्यात्म, नक्षत्र-ज्ञान, योग, दर्शन, गणित, रसायन, चिकित्सा की धरोहर से वंचित कर दिये गये। विद्यासागर पुन: प्राचीन गौरव के आधार पर राष्ट्र का स्वरुप बदलना चाहते हैं। वर्तमान में माह, पक्ष, तिथि, संवत्, अंक के स्थान पर जनवरी, फरवरी, सन् और तारीखें प्रचलन में हैं।

प्रतिपदा तथा चतुर्दशी से युवा पीढ़ी अनभिज्ञ है। पाश्चात्य की भौतिक दौड़ में हम अपनी जड़ को भूल चुके हैं।

* मध्यप्रदेश के सागर के आस-पास लगभग दो सौ किलो मीटर तक के क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा के अभाव को दूर करने के लिये आपके आशीर्वाद से दो सौ इक्कीस बिस्तर का सर्व सुविधा सम्पन्न “भाग्योदय तीर्थ हॉस्पीटल”, बी फ़ार्मा, पैरामेडिकल एवं नर्सिंग कॉलेज बिना व्यावसायिकता के संचालित हैं।

* शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से दी जाय। जो चाहे वह दुनिया की विभिन्न भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करें। उस ज्ञान से देश को लाभान्वित करें। अँग्रेजी भाषा की पढ़ाई ऐच्छिक हो, अनिवार्य नहीं। दुनिया की सभी भाषाओं के ज्ञान के लिये हमारी भाषाओं की खिड़कियाँ खुली रहे। संविधान सम्मत प्रथम अधिकारिक राजभाषा हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाओं को समुचित सम्मान प्रशासन, शिक्षा एवं न्याय के क्षेत्र में मिले। इसके लिये आपका उदघोष है-“अपना देश-अपनी भाषा”,”इण्डिया हटाओ- भारत लाओ”।

* “जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण” आपके इस सूत्र को लक्ष्य कर के आपके आशीर्वाद से “प्रतिभा-स्थली” ज्ञानोदय पीठ नाम से जबलपुर (मध्यप्रदेश), चन्द्रगिरि (छत्तीसगढ़), रामटेक (नागपुर-महाराष्ट्र) में लगभग एक हज़ार लड़कियां शिक्षा ग्रहण कर रही हैं।

आदर्श जीवन मूल्यों के उच्चत्तम मानकों की पूर्ति के लिये गुरुकुल पद्धति पर आधारित शिक्षण के दायित्वों को विदुषी ब्रह्मचारिणी बहिनें निष्काम भाव से पूर्ण कर रही है।

सर्व कल्याण की आपकी भावना से सन् 1992 से “श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान” जबलपुर में संचालित है। यहां से निकले चार सौ युवा मध्यप्रदेश सरकार में सेवारत् हैं। दिल्ली में यूपीएससी एवं आईएएस करने करने वालों के लिये”अनुशासन” नाम से तथा इन्दौर में “आचार्य ज्ञानसागर छात्रावास”एवं “प्रतिभा-प्रतिक्षा”नाम से सुविधा स्थल हैं।

* आप श्री के आशीर्वाद से कुण्डलपुर (दमोह-मध्यप्रदेश), नेमावर, (देवास-म.प्र.), रामटेक (नागपुर-महाराष्ट्र), विदिशा (म.प्र), अमरकण्टक (अनूपपुर (म.प्र.), बीना बारहा (देवरीकला-सागर), तिलवाराघाट (जबलपुर), डोंगरगढ़ (राजनांदगाँव-छ.ग.), आदि स्थलों पर हज़ार वर्ष से अधिक वर्षों तक धर्म-ध्यान होता रहे, ऐसी अध्यात्म भावना से पाषाण के कलात्मक भव्य जिनालयों में से कुछ का निर्माण हो चुका है और शेष का निर्माण कार्य कुछ ही वर्षों में पूर्ण होने वाला है। अनेक स्थानों पर छोटे जिनालय बन चुके हैं।

* आराधक की वाणी और सार्थक सम्प्रेषण का योग समन्वित होकर कुशल कवि, प्रखर वक़्ता की लेखनी से उत्कृष्ट साहित्य का सृजन हुआ है। कन्नड़ भाषी होकर भी प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, कन्नड़, बांग्ला, अँग्रेजी और राष्ट्र भाषा हिन्दी के भण्डार की श्री वृद्धि में आपका योगदान अपूर्व है। आपका हिन्दी में सृजित चर्चित कालजयी महाकाव्य ‘मूकमाटी’ अप्रतिम कृति है। यह शोषितों के उत्थान का प्रतीक है। 300 से अधिक समालोचकों की लेखनी कृति को रेखांकित कर चुकी है। ग्यारह संस्करणों में भारतीय ज्ञानपीठ, नयीदिल्ली से प्रकाशित यह महाकाव्य हिन्दी, मराठी, कन्नड़ , बांग्ला और अँग्रेजी भाषाओं में अनुदित हो चुका है। अँग्रेजी संस्करण का महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के कर कमलों से सन् 2011 में लोकार्पण हुआ है। ‘नर्मदा का नरम कंकर’, ‘डूबोमत लगाओ डुबकी’, ‘तोता क्यों रोता ?’, ‘चेतना की गहराई में’, छ सँस्कृत शतक, दस हिन्दी शतक, अनेक ग्रंथों का पद्दानुवाद के साथ ही जापानी साहित्य की सारभूत विधा ‘हाइकु’ जिसमें पहले पांच, फिर सात और अन्त में पुन: पांच अक्षरों से भावों की अभिव्यक्ति होती है, इस शैली में तीन सौ पचास से अधिक हाइकुओं की रचना की है।

* तपोमूर्ति ने अपने परिचय में कहा है:-“मेरा परिचय वही दे सकता है, जो मेरे भीतर डूब जाए। मैं जहां बैठा हूँ वहाँ तक पहुँच जाए। आपकी दृष्टि वहीं तक पहुँच पाती है, जहाँ में हूँ। मेरा सही परिचय तो यही है कि मैं चैतन्य पुंज आत्मा हूँ जो इस भौतिक शरीर में बैठा हूँ ” सैकड़ों वर्षों से दिगम्बर साधु की चारित्रिक विशेषताऐं केवल शास्त्रों में रही है वह आपमें समाहित है। चौबीस घण्टों में सिर्फ एक बार खड़गासन मुद्रा में खड़े होकर दोनों हाथों की अंजुली में प्रासुक गरम जल, दूध, दाल, चावल, दलिया जैसा सीमित भोजन ही ग्रहण करते हैं। आपने चीनी, नमक, हरि-सब्ज़ी, रस, फल, तेल, सूखे मेवा आदि का आजीवन त्याग कर रखा है। लकड़ी के तख़्त पर अपनी इन्द्रिय शक्ति को नियन्त्रित करते हुए तप की साधना से एक ही करवट से लगभग तीन घण्टे शयन करते हैं। दिन में सोने का त्याग है। सभी भौतिक साधनों एवं वाहनों का त्याग है। शरीर पर कुछ धारण नहीं करते हैं।

दिगम्बर साधू के नियमानुसार सभी मौसम में पूर्णत: दिगम्बर नग्न अवस्था में रहते हैं। पैदल ही विहार करते हैं। शहर से दूर खुले मैदानों, नदी किनारों, पहाड़ों जैसे शान्त स्थलों पर साधना को प्राथमिकता देते हैं। बिना बताए विहार करते हैं। बिना प्रचार-प्रसार पिच्छी परिवर्तन करते हैं। समाज जन आपको चलते- फिरते भगवान मान कर चरणों में नमन करते हुए कभी तृप्त नहीं होते हैं। आपके दर्शन पाकर स्वयं के भाग्य को सराहते हैं।

* मानव जीवन को दिशा प्रदाता ऐसे योगीश्वर का बचपन का नाम विद्याधर था। धार्मिक माता श्रीमंती जी और पिता मल्लपा पारस जी अष्टगे के यहाँ आपका जन्म आश्विन शुक्ल 15, संवत 2003, 10, अक्टूबर 1946 को कर्नाटक के ग्राम “चिक्कोड़ी” (जिला- बेलगाँव) में हुआ था। आप पर बचपन से ही साधुओं का गहरा प्रभाव था।

* आपने संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित 84 वर्षीय आचार्य ज्ञानसागर के चरणों में अजमेर में रह कर वास्तविक शिक्षा ग्रहण ग्रहण की। चार महाकाव्य और 24 ग्रंथों के सृजक ज्ञानसागर से आषाढ़ शुक्ल पंचमी, वि. सं. 2025, रविवार, 30, जून 1968 को मुनि पद से विभूषित होते समय आपने गुरु चरणों में निवेदन किया:-“मैं सकल चराचर जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी मुझे क्षमा करें। मैं अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी के द्वारा प्ररूपित अनादिकालीन श्रमण-धर्म की शरण को स्वीकार करता हूँ। आपकी चरण-शरण को स्वीकार करता हूँ, जैनेश्वरी-दीक्षा प्रदान कर अनुग्रहित करें।” वृद्धावस्था की चरम परिणति के कारण अजमेर जिले के नसीराबाद में मगसिर कृष्ण द्वितीया, संवत 2021, बुधवार, 22, नवम्बर 1972 को गुरु ज्ञानसागर ने संस्कारित कर आपको अपना आचार्य पद सौंप दिया। ज्ञात इतिहास की यह पहली घटना थी, जब किसी आचार्य ने अपना पद विसर्जित किया और स्वयं मुनि होकर निचले आसन पर विराज गये। अतुलनीय शिष्य ने अपूर्व सेवा करके अनन्य गुरु का नसीराबाद में शुक्रवार, एक जून 1973 को समाधिमरण कराया।

* आपके वैराग्य-पथ से प्रभावित होकर माता श्रीमंती जी आर्यिका समयमती जी, पिता मल्लपा जी मुनि श्री मल्लीसागर जी, भाई शांतिनाथ मुनि श्री समयसागर जी, अनन्तनाथ हो गये-मुनि श्री योगसागर जी, बहनें शांता एवम् स्वर्णा दीदी ब्रह्मचारिणी होकर सभी मोक्षमार्ग के पथिक बन आत्मकल्याण रत् हैं।

परिवार के आठ में से सात सदस्यों का मोक्ष-पथ अपनाना वर्तमान युग की अद्वितीय घटना है। आपसे दीक्षित लगभग सौ मुनिराज, दो सौ आर्यिका माताऐं बाल ब्रह्मचारी हैं। हज़ार से अधिक दीक्षा ग्रहण करने को तत्पर हैं।

* विज्ञान के इस युग की भौतिक चकाचौंध में आप महाव्रति ने भगीरथ जैसी जो ज्ञान की गंगा प्रवाहित की है, जिसके द्वारा भाषा, संस्कृति, समाज, राष्ट्र और विश्व को विनाश से रोका जा सकता है।

2019 : विहार रूझान

मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार सागर से यहां होना चाहिए :




17
12
20
16
1
View Result

Countdown

कैलेंडर

march, 2019

चौदस 05th Mar, 201905th Mar, 2019

अष्टमी 14th Mar, 201914th Mar, 2019

चौदस 20th Mar, 201920th Mar, 2019

अष्टमी 28th Mar, 201928th Mar, 2019

X