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आर्यिका 105 पूर्णमती माता जी

गुणों की पूर्णता : आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी परम पूज्य आ . श्री विद्यासागर जी महाराज को अगर वर्तमान युग का महावीर कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । आपका हिमगिरि के समान दृढचरित्र उदधि के समान अगाध तथा तलस्पर्शी ज्ञान बरबस ही जीवों के चित्त को आह्लादित कर देता है तथा साक्षात् मोक्षमार्ग पर अग्रसर होने के लिये प्रेरित करता है । आपके यही गुण आपकी शिष्यावली में भी प्रतिबिम्बित होते हैं । आपके सभी शिष्यगण चारित्र एवं ज्ञान में आपकी ही प्रतिलिपि हैं ।

पूज्य आर्यिका श्री 105 पूर्णमति माताजी आपके इन्हीं रत्नावली का एक दैदीप्यमान रत्न हैं । आपकी ओजस्वी वाणी जहां एक ओर जिनवाणी के गूढतम रहस्यों का रसास्वादन कराती है वहीं अपनी मधुरता से भव्यजीवों के कानों में अमृत का संचार करती है । पूज्य माताजी का जन्म इसी वीरभूमि राजस्थान के बागड़ प्रान्त में डूंगरपुर की पावन वसुन्धरा पर दिनांक 14 मई 1964 को हुआ था । आपके माता – पिता का नाम दिगम्बर जैन श्रेष्ठी श्री अमृतलाल जी जैन तथा श्राविका श्रीमती रुक्मणी देवी जी था । कहते हैं कि जब जब कोई शुभ घटना होने को होती है तब तब उसके लक्षण पूर्व में ही दृष्टिगोचर होने लगते हैं ।

आपके जन्म के पूर्व आपकी मां को स्वप्न में अद्भुत और अलौकिक जिनबिम्बों के दर्शन होने लग गये थे तथा शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी की वन्दना के शुभ भाव स्वप्न में प्रकट होने लग गये थे । यह सब गर्भस्थ शिशु के पुण्यप्रभाव तथा पवित्रता का ही तो प्रतीक था । प्रारम्भ से ही आपकी वाणी में वीणा के तार झंकृत होने के कारण माता पिता ने आपका सार्थक नाम वीणा ‘ रखा । आपने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण के पश्चात् भी साधना में पूर्णता अभाव महसूस करते हुए अनवरत स्वयं की खोज में लगे हुए अमूर्त शिल्पी तथा पूर्णता के सागर आ . श्री विद्यासागर जी की धवल तथा पावन लहरों में अपने को समर्पित कर दिया तथा दिनांक 7 अगस्त 1989 को श्री सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में उनका पूर्ण गुरु अनुग्रह प्राप्त कर आर्यिका दीक्षा उपरान्त ‘ पूर्णमति यह स्वनामधन्य तथा सार्थक नाम प्राप्त किया साथ ही पूर्वार्जित ज्ञान तथा चारित्र को परिष्कृत तथा परिमार्जित किया । आपके इस अगाध ज्ञान की झलक आप हारा विरचित विविध साहित्य में देखने को मिलती है ।

आपने कुण्डलपुर बड़े बाबा विधान , श्री शांतिनाथ विधान आदिक अनेकों विधान अपनी छन्दप्रवीणा लेखनी से निस्सरित किये हैं जो कि भव्य जीवों के मुक्ति मार्ग को प्रशस्त करते हैं । पूज्य माताजी अपने प्रवचनों में अधिकांश रूप से मानवतावादी सिद्धान्तों का प्रतिपादन करती हैं , अपने कण्ठ के बजाय हृदय से निकलने वाली हित मित प्रिय वाणी से इन्हीं सिद्धान्तों के अनुरूप जीवन शैली अपनाने के प्रेरित करती हैं । आप कोरी शुष्क तत्व ज्ञानी नहीं हैं अपितु ज्ञान , तप , रस , भाव , आत्मसौन्दर्य , कला और साहित्य की एक जीवन्त समन्वय मूर्ति हैं । आपने अपने गुरु की प्रज्ञा परम्परा की अनन्य प्रतिनिधि हैं ।

आपका स्वयं का जीवन त्याग , तप व सरलता से ओत प्रोत है । साधना की खुशबू से महकता ऐसा आचरण चेहरे पर ऐसी चमक , समर्पण की ज्योति से जगमगाती आंखें ऐसी सहज पारदर्शी मुस्कान के रूप में मैंने जीवन के ऐसे शाश्वत अक्षय सौन्दर्य के दर्शन किये हैं तथा अब मेरे हर ऊहापोह को भेदकर आपका हर शब्द मेरे लिये अनिवार्य आदेश है । आपके उदयपुर चातुर्मास के पावन अवसर पर सपरिवार आपके चरणों में बारम्बार वन्दामि प्रस्तुत कर मेरी भावना है कि आपका यह चातुर्मास निर्विघ्न तथा सानन्द सम्पन्न हो तथा आप भगवान महावीर के अहिंसा , क्षमा तथा दया आदि जिन सिद्धान्तों की जनमानस में अलख जगाने निकली हैं उन सिद्धान्तों का हमारे जीवन में समावेश हो तथा हम भी अपना कल्याण मार्ग प्रशस्त करें ऐसी भावना भाती हूं ।

संकलन:

श्रीमती सुशीला पाटनी
आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ


1. मंगलाष्टक, अभिषेक पाठ एवं शांतिधारा

2. भक्तामर

3. तत्वार्थ सूत्र

4. सहस्त्र नाम

5. एकीभाव (संघस्थ बम्हचारिणी रितु दीदी)

6. आत्मबोध शतक (संघस्थ बम्हचारिणी रितु दीदी)


7. मूक माटी भाग 1

8. मूक माटी भाग 2

9. मूक माटी भाग 3

10. मूक माटी भाग 4


 


* वेबसाइट पर प्रस्तुत सामग्री धर्म प्रभावना हेतु डाली गई है। इसे विनयपूर्वक देखें-सुनें, अविनय ना हो। *

19 Comments

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  • I want printed shantidhara as per this audio cd. Which book has it. or where can I get printed shantidhara

  • Hello Sir,

    Thanks a lot for uploading such a nice and useful material. Can you please also provide lyrics of “Aatmbodh Shatak Ji”, “Ekibhav strotra”.
    Thanks in advance.

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2021 : विहार रूझान

मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार जबलपुर से यहां होना चाहिए :




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