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स्त्री अभिषेक नहीं करने वाली महिलाएं विचलित न हों, आप सही हैं

जिज्ञासा : श्रावक के छह आवश्यक कर्तव्य होते हैं, श्राविकाएं छह आवश्यक कर्तव्य करती हैं। प्रथम कर्तव्य देवपूजा में अभिषेक भी आता है। फिर महिलाएं अभिषेक क्यों नहीं करती हैं?
समाधान : वर्तमान समय में यह प्रश्न विवाद का है। अब यह प्रश्न परंपरा के जाल में घिर गया है। फिर भी पहला तो मेरा यही कहना है कि इसे लेकर विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए। किसी तथ्‍य को समझना अलग है और उलझना अलग। इसलिए तो भी प्रश्नकर्ता हैं, वे इसे अच्छे से समझें, उलझे ना।

जैन धर्म की क्रियाएं पर्याय सापेक्ष हैं। यही कारण है कि मनुष्य गति में रहते हुए भी स्त्री को मुक्ति संभव नहीं है। वह मुनि के समान पूर्ण दिगम्बर अवस्था धारण नहीं कर सकती है। आज स्त्री-पुरुष समानता के नाम पर बहुत कुछ विकृतियां हमारे स्वस्थ समाज और संस्कृति को विकृत कर रही हैं। जब प्राकृतिक रूप से स्त्री बिलकुल अलग है और पुरुष अलग तो उसे समान क्यों मानना? व्याकरण में भी दो पृथक-पृथक लिंग हैं, स्त्रीलिंग और पुल्लिंग। कुछ कार्य ऐसे भी हैं, जो महिलाएं कर सकती हैं, पर पुरुष नहीं। जन्म से ही नवजात शिशु को स्तनपान कराकर उसका पोषण करने का अधिकार मां को प्राप्त है, पुरुष को नहीं। ऐसे ही आप दृष्टि दौड़ाएंगे तो अनेक कार्य मिलेंगे जो पुरुष तो कर सकते हैं, पर महिलाएं नहीं और महिलाएं कर सकती हैं, पुरुष नहीं।

कई लोग तर्क देते हैं कि जब महिला तीर्थंकर को पैदा कर सकती है तो वह अभिषेक क्यों नहीं कर सकती है? उन लोगों से मेरा कहना है कि जब महिला तीर्थंकर को पैदा कर सकती हैं तो तीर्थंकर क्यों नहीं बन सकती है? कुछ लोग तर्क देते हैं कि मुनिराज को आहार दे सकती हैं तो अभिषेक क्यों नहीं कर सकती है? जब आहार देने के लिए पवित्र है, तो अभिषेक के लिए पवित्र क्यों नहीं है?

मैं पूछता हूं, जब महिला आहार दान करती है और शुद्ध है तो पुरुष की तरह मुनिराज के तन को पोंछ क्यों नहीं सकती है? पुरुष की तरह वैयावृत्ति क्यों नहीं कर सकती है? जो लोग ये कहते हैं कि कौन-से शास्त्र में लिखा है कि स्त्री अभिषेक नहीं कर सकती है? वे ये बताएं कि कौन-से शास्त्र में लिखा है कि महिला मुनिराज की, पुरुष की तरह वैयावृत्ति न करें। महिला आर्यिका बनने के बाद पाणि पात्र में तो आहार ग्रहण करती ही है, तो खड़े होकर आहार करने में क्या बाधा है?

सब जानते हैं कि शची इन्द्राणी तीर्थंकर बालक को प्रसूतिगृह से उठाकर लाती है लेकिन अभिषेक नहीं करती है, क्यों? अकृत्रिम जिनालय व नन्दीश्वर द्वीपादि में देव तो अभिषेक करते हैं, पर देवियां नहीं, आखिर क्यों?

आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी ने भक्ति में अभिषेक का वर्णन करते हुए लिखा है-

भेदेन वर्णना का सौधर्म: स्नपनकर्तृतामापन्न:।
परिचारिक भा‍वमित्ता: शेषेन्द्रारुन्द्रचन्द्र-निर्मलयशस:।।
मंगलपात्राणि पुनस्तद्देव्यो बिभ्रतिस्म शुभ्रगुणाढ्या:
अप्सरसो कर्तक्य: शेषसुरास्तत्र लोकनव्यग्रघिय:।।।

अर्थात सौधर्मेन्द्र अभिषेक करता है और उनकी देवियां मंगल पात्र धारण करती हैं। मूल संघ के आदिपुराणकर्ता आचार्य श्री जिनसेन स्वामी ने भगवान के अभिषेक के प्रसंग में सौधर्मेन्द्र आदि से तो अभिषेक करने की बात लिखी लेकिन प्रथम दर्शन करने वाली तथा प्रसूतिगृह से बालक को लाने वाली शची इन्द्राणी द्वारा अभिषेक करने की बात नहीं लिखी। सातवीं शताब्दी से पूर्व तक के आचार्यों ने स्त्री अभिषेक की कोई बात नहीं लिखी।

कल्पना कीजिए यदि स्त्री अभिषेक करते समय अशुद्ध हो जाए तो उस मूर्ति का क्या होगा? और ऐेसा होना सामान्य सी बात है, तब क्या होगा? अभिषेक की लाइन में खड़ी महिला के अशुद्धि होने पर अन्य लोग भी छू जाएंगे, इसका दोष किसे लगेगा?

स्त्री अभिषेक के आगम प्रमाणों के बारे में मेरा कहना है कि आचार्यों द्वारा शास्त्रों की रचना के बाद पूजन तो हमारे यहां प्राचीन आचार्यों द्वारा नहीं लिखी गई, लेकिन अभिषेक पाठ जरूर प्राचीन आचार्यों द्वारा लिखे गए। जलाभिषेक पाठ भी है और पंचामृताभिषेक। जलाभिषेक पाठ करने वालों की परंपरा में तो स्त्री अभिषेक प्रचलित नहीं है। पंचामृताभिषेक करने वाली परंपरा के मंदिरों में भी महिलाएं प्राय: अभिषेक नहीं करती हैं। अनेक मंदिरों में पंचामृत अभिषेक होता है, पर स्त्री अभिषेक नहीं होता है। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि दक्षिण भारत में स्त्री अभिषेक होता है जबकि दक्षिण भारत के बहुभाग में दिगम्बर जैन मंदिरों में उपाध्याय ही अभिषेक पूजा-पाठ किया करते हैं, गर्भगृह तक तो कोई जाता ही नहीं है।

धर्माधिकारी वीरेन्द्र हेगड़े की मां रत्नम्मा जिनकी प्रेरणा से धर्मस्थल में भगवान बाहुबली की प्रतिमा विराजित की गई, उस प्रतिमा के विराजमान करने की पूरी घटना का वर्णन पं. नीरज सतना ने धर्मस्थल बाहुबली में रत्नम्मा से साक्षत्कार लिया है जिसमें रत्नम्मा ने स्पष्ट रूप से कहा है कि दक्षिण में स्त्री अभिषेक की परंपरा नहीं है, इसका पृ. 22 भी देखने पर आपको सब सच ज्ञात हो जाएगा।

मैंने देखा कि श्रवणबेलगोला में जब गोमटेश्वर भगवान का महा मस्तकाभिषेक होता है, तब बिना किसी रोक-टोक के स्त्रियां भी वहां अभिषेक करती हैं। मैं समझती थी कि जहां स्त्रियों से अभिषेक कराने की परंपरा नहीं है, वहां भी बाहुबली का अभिषेक स्त्रियां करती हैं। इसलिए कि बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे। वे तो जिन बालक के समान ही थे।

हमें इन विशाल बाहुबली प्रतिमाओं पर अभिषेक की अनुमति शायद इसलिए दी जाती हो कि श्रवणबेलगोला, कारकल और वेणूर में बाहुबली किसी मंदिर के गर्भगृह में विराजे नहीं हैं। तीनों स्थानों पर वे खुले स्थान पर खुले आसमान के नीचे उन्मुक्त खड़े हैं। शायद इसलिए वहां उनकी पूजा-आराधना को लेकर किसी के लिए कोई वर्जना नहीं होती।

भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक देखना मुझे सदा से प्रिय रहा है। दक्षिण में स्त्रियों द्वारा जिनाभिषेक की परंपरा नहीं है, वे तो मंदिर के गर्भालय में भी प्रवेश नहीं कर सकतीं। (20)

बहुत पहले एक पुस्तक पढ़ने में आई थी जिसका नाम था- स्त्री प्रक्षाल की अविधेयता, इस पुस्तक में मूड़बिद्री आदि कई स्थलों के भट्टारकों के पत्र हैं, जिसमें दक्षिण भारत की स्त्री अभिषेक एवं स्त्रियों के गर्भगृह में प्रवेश का निषेध साफ-साफ दिया गया है।

यदि महिला अभिषेक कर सकती है तो दक्षिण भारत में जहां उपाध्याय अभिषेक आदि की क्रियाएं करते हैं, वहां उपाध्याय पद पर महिलाओं को क्यों नियुक्त नहीं किया जाता है? उत्तर भारत में दस-बीस साल पहले तक कहीं कोई इक्का-दुक्का महिलाएं ही अभिषेक किया करती थीं। लेकिन अब मुनिराजों और आर्यिकाओं द्वारा महिलाओं को अभिषेक करने का उपदेश और आदेश भी दिया जा रहा है। अनेक महिलाएं हमारे पास आकर कहती हैं कि हमें कहा जाता है कि तुम्हें अभिषेक करना चाहिए, करो और मुझे भी दिखाओ, तुम शूद्र नहीं हो, इत्यादि प्रकार से समझाया-बुझाया जा रहा है।

स्त्री अभिषेक के सबसे बड़े समर्थक निर्मल सेठी ने अपनी धर्मपत्नी से गोम्मटेश बाहुबली भगवान का अभिषेक कराने के लिए जब एक महाराज से कहलवाया तब श्रीमती सेठी ने विनयपूर्वक बड़ा ही मार्मिक उत्तर दिया, उसने कहा कि- आप महाराज हैं, पूज्य हैं लेकिन आप एक स्त्री के शरीर को नहीं जानते इसलिए क्षमा करना, मैं अभिषेक नहीं कर पाऊंगी। यह प्रसंग पं. श्री रतनलालजी बैनाड़ा ने बताया है, वे उनके रिश्तेदार भी हैं।

महिला के जवाब की पुष्टि महिलाएं तो स्वयं कर सकती हैं, बाकी जो स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर्स हैं उनसे जाना जा सकता है कि महिलाओं के क्या-क्या समस्याएं होती हैं और कितने प्रतिशत महिलाएं किस समस्या से पीड़ित हैं? आप सुनकर हैरान रह जाएंगे। शास्त्रों में तो स्त्री के शरीर में होने वाली प्राकृतिक समस्याएं लिखी हुई ही हैं।

आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज के नाम से भी स्त्री अभिषेक के प्रचार का कार्य किया जाता है। लेकिन पूज्यवर ने स्पष्ट रूप से स्त्री अभिषेक का निषेध किया है। पं. बंशीधर जी सोलापुर वालों ने 1932 में आचार्य महाराज के सामने ही यह पुस्तक लिखी, उन्हीं के सामने ही प्रकाशित हुई। यह पुस्तक आचार्यश्री का चरित्र बताने वाली पूर्णत: प्रामाणिक है, क्योंकि तिथि व वार के साथ ही घटनाओं का वर्णन किया गया है। कुछ लोगों ने इस पुस्तक को दुबारा भी छपवाया लेकिन स्त्री अभिषेक के प्रसंग को उड़ा दिया। उसमें साफ-साफ पूज्यवर ने स्त्री अभिषेक का निषेध किया है।

संघ शाहपुर चैत्र शु. 1 बुधवार सं. 1986 के दिन आया। यह सागर जिले का गांव है। जैन जैनेतर सभी की तरफ से स्वागत हुआ। प्रश्नोत्तरों में एक प्रश्न यह भी आया कि स्त्री जिन मूर्ति का अभिषेक करे या नहीं? आचार्य महाराज ने उसका निषेध किया। विधवा विवाह का जोरों से निषेध किया।
(आचार्य श्री शांतिसागरजी महा‍मुनि का चरित्र, लेखक- पं. बंशीधर शास्त्री, सोलापुर, प्रकाशक- जीवराव सखाराम दोशी सोलापुर, सन् 1932, पृ.- 135)

आचार्यश्री अभयनन्दि महाराज द्वारा रचित अमृताभिषेक पाठ में अभिषेककर्ता को इंद्र भी बनाया गया है और यज्ञोपवीत भी पहनाया गया है। स्‍त्री न इंद्र बनती है, न यज्ञोपवीत पहनती है फिर अभिषेक की विधि कैसे संपन्न कर सकती है? आचार्यश्री माघनन्दिकृत जलाभिषेक पाठ में तो ये सब क्रियाएं हैं ही नहीं, लेकिन जो पंचामृत के बिना अभिषेक नहीं मानते स्त्री को अभिषेक करना अनिवार्य मानते हैं और जो एक-एक आचार्य की सारी बातों को परम प्रमाणिक मानने का गर्व करते हैं, वे इंद्र बने बिना और यज्ञोपवीत पहनाए बिना अभिषेक कैसे कर सकते हैं? जब आचार्य रचित अभिषेक विधि है तो उसका पालन पूरा-पूरा क्यों नहीं? उन्होंने लिखा है-
श्रीमन्मन्दर-सुन्दरे शुचिजलैर्धोतै: सदर्भाक्षतै:,
पीठे मुक्तिवरं निधाय रचितां त्वत्पाद-पद्‍मस्त्रज:।
इन्द्रोऽहं निजभूषणार्थकमिदं यज्ञोपवीतं दधे,
मुद्रा कंकण शेखराण्यपि तथा जैनाभिषेकोत्वे।।

अर्थात् श्री सम्पन्न में पर्वत मेरु के दर्भ और अक्षत से युक्त पवित्र जल से प्रक्षालित सुन्दर पीठ पर मुक्ति रूपी लक्ष्मी के नायक श्री जिनेन्द्र देव को स्थापित करके इन्द्र हूं इस प्रतिज्ञा के साथ मैं जिनेन्द्र देव को अभिषेक के समय अपने आभूषण स्वरूप आपके चरण कमलों की माला को तथा यज्ञोपवीत, मुंदरी, कंगन और मुकुट को धारण करता हूं।

जब अभिषेक की विधि स्पष्ट कह रही है कि इन्द्रोऽहं अर्थात् इंद्र बनकर अभिषेक कर रहा हूं स्पष्ट रूप से पुल्लिंग का प्रयोग किया गया है, क्या यह पर्याप्त नहीं है?

जलाभिषेक की परम्परा वालों में यज्ञोपवीत अनिवार्य नहीं है किन्तु पंचामृताभिषेक की परम्परा में यज्ञोपवीत अनिवार्य है। अभिषेक पाठ में आगत यज्ञोपवीत पहनने के समय महिलाओं को यज्ञोपवीत क्यों नहीं पहनाया जाता?

स्त्री अभिषेक का प्रचार-प्रसार करने वाली पुस्तकों में बड़े-बड़ अक्षरों में लिखा रहता है कि दान पूजन के लिए यज्ञोपवीत अनिवार्य है फिर स्त्री को यज्ञोपवीत क्यों नहीं पहचानते? जो लोग तर्क करते हैं कि कौन-से शास्त्र में लिखा है कि स्त्री अभिषेक नहीं कर सकती? जिस शास्त्र में ये लिखा कि स्त्री यज्ञोपवीत नहीं पहन सकती, उसी शास्त्र में लिखा है कि स्त्री अभिषेक नहीं कर सकती है। यदि इसका निर्णय किया जाए तो यही तो होगा कि अभिषेक पाठ के अनुसार अभिषेक किया जायेगा। एक एक क्रिया जब मंत्रपूर्वक की जायेगी तब यज्ञोपवीत पहनने का मंत्र आएगा, उस समय स्त्री को यज्ञोपवीत क्यों नहीं पहनाया जाएगा? इसके कुछ मनगढ़ंत उत्तर तैयार किए गए हैं जो कि आगम, युक्ति व तर्क से रहित हैं। वे कहते हैं कि स्त्री का यज्ञोपवीत पुरुष पहन लेता है, इसलिए दो यज्ञोपवीत पुरुष पहन लेता है। वही स्त्री का यज्ञोपवीत कहलाता है। यदि ऐसा ही हो तो जिन चक्रवर्ती की 96 हजार स्त्रियां होती हैं, क्या वे 96 हजार यज्ञोपवीत पहनेंगे? जिनकी दो-तीन है वे दो-तीन। यदि जिस कन्या ने शादी न करके आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया है, उसका यज्ञोपवीत कौन पहनेगा?

अब किसी स्त्री का पति स्वर्ग सिधार गया है, वह अभिषेक करेगी तो उसका यज्ञोपवीत कौन पहनेगा? जो अविवाहित कन्या है वह अभिषेक करेगी तो उसका यज्ञोपवीत कौन पहनेगा? इस प्रकार अनेक ऐसे प्रश्न उपस्थित होंगे जिन के उत्तर नहीं होंगे। सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि कौन से शास्त्र में लिखा कि स्त्री का यज्ञोपवीत पुरुष पहने? जो लोग बड़े-बड़े अक्षरों में लिख रहे हैं कि दान-पूजन के लिए यज्ञोपवीत अनिवार्य है फिर स्त्री और पुरुष में भेद क्यों? स्त्री और पुरुष को समान अधिकार देने वाले अभिषेक करने की बात आई तो आखिर स्त्री के यज्ञोपवीत का अधिकार किस आधार पर छीन रहे हैं?

जो स्त्रियां अभिषेक नहीं करती हैं उनके पास आगम भी है, युक्ति भी है और तर्क भी है। अभिषेक नहीं करने वाली स्त्रियों ने आचार्य माघनन्दी एवं आचार्य अभय‍नन्दि दोनों के अभिषेक विधि का पानल किया है। अभिषेक पाठ विधि का प्रयोग करके भी इसे समझा जा सकता है। दि अभिषेक की विधि आचार्यों द्वारा बनाई हुई न होती तो फिर भी संदेह हो सकता था लेकिन आचार्यों द्वारा लिखित विधि में जिस कार्य का वर्णन नहीं है, वह करना समझ से परे है।

जब महिला पुरुष को एक समान ही क्रियाएं करानी हैं तो महिलाओं को धोती दुपट्टा पहनने का निषेध कहां किया गया है? क्यं न महिलाओं को भी धोती दुपट्टा पहनाया जाए? सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिसे जिनेन्द्र देव का अभिषेक करना है क्या उसे पूर्णास्नान नहीं करना चाहिए? क्या बिना पूर्ण स्नान के कोई भगवान का अभिषेक कर सकता है? कदा‍पि नहीं। महिलाएं प्रतिदिन पूर्ण स्नान भी नहीं करती हैं ऐसे में उनके द्वारा अभिषेक कैसे कराया जा सकता है? मुझे तो ये महिलाओं के स्नान के बारे में ज्ञान भी नहीं था ऐसे ही एक दिन स्वाध्याय में इसी प्रसंग में किसी महिला ने कहा कि हम लोग प्रतिदिन सिर से स्नान नहीं करते हैं, ऐसे में बिना पूर्ण स्नान के भगवान का अभिषेक कैसे कर सकते हैं?

स्त्री पुरुष समानता की बात की जाए तो महिलाएं दिगम्बरत्व क्यों नहीं धारण कर सकती? यही उत्तर होगा न कि पर्याय बाधक है। यदि समानता की ही बात की जाए तो पुरुष धोती दुपट्टा पहनकर अभिषेक-पूजन करते हैं तो क्या महिलाएं भी धोती दुपट्टा पहनकर पूजन करें। जो लोग कहते हैं कि किस ग्रंथ में लिखा है कि महिला अषिेक न करें, वे बताएं कि किस ग्रंथ में लिखा है कि महिला धोती दुपट्टा न पहनें?

चाण्डाल, धीवरादि सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकते हैं, अणुव्रत धारण कर सकते हैं लेकिन अभिषेक नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार जैन दर्शन में पर्याय की प्रधानता से क्रियाएं की जाती हैं।

*फोटो : प्रतिकात्मक रूप से दिया गया है

2018 : विहार रूझान

मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार दिवाली पश्चात यहां होना चाहिए-




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