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सम्बन्ध : पिता-पुत्र के

संकलन:

श्रीमती सुशीला पाटनी
आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ

भारतीय संस्कृति में माता-पिता का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। हमें बचपन से ही ‘मातृदेवो भव’, ‘पितृदेवो भव’, जैसे सूत्र वाक्यों के मध्यम से उन्हें न केवल जन्मदाता के रूप में, अपितु देवता के रूप में पूजने के संस्कार दिये जाते रहे हैं। उसके पीछे केवल यही भावना रही है कि माता-पिता सृष्टि के मूल हैं। हमारा सबसे पहला सम्बन्ध माँ और पिता से ही बनता है। संसार के सारे सम्बन्ध तो जन्म लेने के बाद बनते हैं पर माता-पिता का सम्बन्ध तो जन्म से पहले ही प्रारम्भ हो जाता है। इसी कारण हमारी संस्कृति में इन्हें सर्वोच्च महत्व देते हुए कहा गया है।

दस उपाध्यायों (अध्यापक) के गौरव से एक आचार्य (लौकिक गुरु) का गौरव अधिक है, सौ आचार्यों से एक पिता का और एक हजार पिताओं से भी अधिक एक माता का गौरव होता है।

माता-पिता के प्रति भारतीय दृष्टि का यह एक उदाहरण है। परंतु आज हम देखते हैं कि माता-पिता का वह गौरव दिनों-दिन क्षीण होता जा रहा है। मातृत्व और पितृत्व की आभा मन्द पडती जा रही है। आज के माता-पिता अपनी संतानों की शिकायतों में कैद होकर उनके अनादर और अपेक्षा के पात्र बनते जा रहे हैं। जिस भारत देश से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का सन्देश अनुगुंजित हुआ, वहाँ वह परिवार बिखर रहे हैं। माता-पिता को अपने ही पुत्रों की उपेक्षा का पात्र बनकर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर होना पड रहा है। आज देश के प्रमुख महानगरों में ‘केयर’ और ‘आसरा’ जैसी अनेक संस्थाएँ ऐसे उपेक्षित माता-पिताओं की शरण स्थली बनी हुई है।

आज की युवा पीढी की घृणित मानसिकता का उदाहरण है यह, जो अपने जीते जागते माँ-बाप के अस्तित्व को नकारने लगे हैं।

आज के युवक-युवतियों की प्रायः एक शिकायत रहती है कि उनके माता-पिता का स्वभाव ठीक नहीं है। उनमें बुद्धि कम है। उन्हें निभा पाना बहुत मुश्किल है। वे हमें अपने युग के हिसाब से आगे ले जाना चाहते हैं। यह मेरे जीवन में संभव नहीं है। मेरी माँ का स्वभाव मेरी पत्नी से नहीं मिलता। आखिर निर्वाह कैसे करूँ? उन्हे एडजस्ट (समायोजित) कर पाना बहुत मुश्किल है।

जन्म देने की बात तो जाने दे, गर्भ में आते ही तुम्हारी माँ ने तुम्हारे पीछे कितना त्याग किया है, इसका कुछ पता है? तुम्हारी माँ ने तुम्हें नौ महीने पेट में रखा है। तुम एक छोटा सा फूल भी नौ दिन तक प्रसन्नता पूर्वक अपने हाथ में नहीं रख सकते। तुम्हारी माँ ने नौ माह तक तुम्हें अपने पेट में रख कर तुम्हारा भार उठाया है।

तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे जन्मदाता ही नहीं जीवनदाता भी हैं। बीज धरती पर बोने के बाद उसे समय पर खाद-पानी और रख-रखाव की भी आवश्यकता है। योग्य माली के संरक्षण के आभाव में उन्नत बीज भी अंकुरित होकर पल्लवित नहीं हो पाता। यह तो तुम्हारे माता-पिता का अनंत उपकार है कि उन्होंने तुम्हें जन्म देकर जीवन दिया है। यदि तुम्हारी माँ ने तुम्हे जन्म देकर यूँ ही छोड दिया होता तो क्या तुम जीते? स्मरण तो करो उनके उपकारों का! जन्म देने के बाद तुम्हारी माँ ने तुम्हारे जीवन के संरक्षण के लिये कितना कष्ट सहा। तुम्हारे लिये समय पर भोजन पानी दिया। तुम्हें प्यार और अपनत्व दिया। खुद गीले में रहकर तुम्हें सूखे में सुलाया। शायद तुम भूल गये बचपन में तुम रोज माँ की बिस्तर गीली करते थे और अब बडे होकर अपनी से उनकी आँखें गीली का रहे हो।

तुम रात में रोते तो तुम्हारी माँ कभी तुमसे खिन्न नहीं हुई। तुम्हारे रोने पर तुम्हे प्यार से पुचकारा है। अपनी लोरियाँ और थपकियों से दुलार कर तुम्हें सुलाया है। उस क्षण भी उनके मन में तुम्हारे प्रति अपार प्रेम और ममता उमडी है। तुम्हें सुलाने के पीछे तुम्हारी माँ ने कितनी रातें जागकर बितायी हैं इसका कुछ स्मरण है? सचमुच में एक माँ का हम पर अनंत उपकार है। उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। वह अनुभव भी केवल माँ ही कर सकती है। माँ ममता का सागर है।

तुम्हारे जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा के लिये उन्होंने समय, शक्ति और सम्पत्ति का त्याग किया है। यदि तुम्हारी माँ ने तुम्हें समय पर दूध नहीं पिलाया होता, तुम्हे समय पर भोजन नहीं दिया होता, तुम्हारा स्वास्थ्य बिगडने पर तुम्हे डॉक्टर को न दिखाया होता, तो तुम्हारा क्या होता? याद करो, उस दिन जब तुम गैस चूल्हे को छूने जा रहे थे, उस समय तुम्हारी माँ ने तेजी से तुम्हें न पकडा होता तो तुम्हारा क्या होता? उस दिन घर की चौथी मंजिल से नीचे झाँकते समय माँ ने तेजी से तुम्हें ना पकडा होता तो तुम्हारा क्या होता? सडक पर चलते हुए सामने से तेजी से आ रहे ट्रक को देख कर तुम्हारे पिताजी ने तुम्हें अपनी ओर न खींचा होता तो तुम्हारा क्या हुआ होता? कहाँ तक बात करूँ? कदम-कदम पर तुम्हारे माँ-पिता ने तुम्हें बचाया है।

तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे जन्मदाता और जीवनदाता तो हैं ही संस्कारदाता भी हैं। उन्होंने तुम्हें सदैव बुराई और बुरे लोगों की संगत से बचाया है। तुम्हें पढा-लिखा कर योग्य बनाया है। आज तुम अपने पावों पर खडे हो पाये हो। तुम्हारे अन्दर कोई व्यसन और बुराई नहीं है, यह तुम्हारे माता-पिता की निगरानी का ही फल है। यदि तुम्हारे संस्कारों का ध्यान नहीं दिया होता, तो तुम अपराधी, लफंगे या बदमाश बन गये होते। एक योग्य व्यक्ति होने की जगह अपनी ही काली-करतूतों के कारण सलाखों के अन्दर हो गये होते। अपने ही लाडलों के अपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण कभी-कभी माँ-पिताओं के मुख से यह निकल जाता है कि ऐसे पुत्र को जन्म देने से अच्छा तो हम निःसंतान ही रह जाते।

कैसा समय आ गया है? होनकार ही बलिहारी है। यह सब मनुष्य के बिगडे हुए सोंच का ही कुपरिणाम है। अब तो सोच इस कदर बिगड चुका है कि आज की संतान को अपने ही जन्मदाता, जीवनदाता, संस्कारदाता माता-पिता बोझ लगने लगे हैं। वे उनके परवरिश के लिये उनसे ही पैसे माँगने लगे हैं। आज तुम्हें अपने माता-पिता का स्वभाव बिगडा हुआ दिखता है, पर तुम पैदा हुए थे तो तुम्हारा स्वभाव कैसा था? तुम्हे पता है! अभी तुम्हें अपने माँ-बाप में कभी दिखाई देती है। पर जब तुम पैदा हुए थे तब तुममें तो केवल कमी ही कमी थी, जन्म के समय में तो तुममें इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि यदि कोई तुम्हारी आँख फोडे तो तुम उसे भगा सको। आज तुम्हें अपने माँ-बाप का स्वभाव बिगडा हुआ दिखता है? पर क्या तुम्हें पता है, बचपन में तुम्हारा स्वभाव कैसा था? तुमने स्तनपान कराती हुई अपनी माँ को कितनी बार लात मारी है? तुम्हें पता है, उस समय तुम्हारी माँ ने तुम पर क्षोभ करने की अपेक्षा तुमपर प्यार भरी दृष्टि बरसाई है। तुमने अपने माता-पिता की गोद पर मल मूत्र कर उसे कितनी बार गन्दा किया है, उस पर भी उन्होंने तुम्हें क्या घर से निकाल दिया। उन्होंने कितनी प्रसन्नता से तुम्हारे मल-मूत्र को साफ किया है। तुम अपने पिता को घोडा बना कर कितनी बार उनके कन्धे पर चढे हो, इस पर भी तुम्हारे पिता ने तुम्हे प्यार और दुलार ही दिया।

यह बात सच है कि वृद्धावस्था में माता-पिता का स्वभाव कुछ बदल जाता है, पर यह सब उम्र का तकाजा है। उनके बिगडे हुए स्वभाव से घृणा करने की अपेक्षा प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करनी ही हमारी बुद्धिमानी है। अपने वृद्ध माता-पिता से अपनी तरह चलने की अपेक्षा करना ठीक नहीं है। माता-पिता के बिगडे हुए स्वभाव को मत देखो, उनके उपकारों को देखो। हमें जिनके उपकारों का स्मरण रहता है, उनके प्रति सदैव श्रद्धा, आदर, विनय और आत्मीयता के भाव बने रहते हैं। हमारे द्वारा भूलकर भी उपेक्षा नहीं होती। माता-पिता के उपकारों की स्मृति हमें उनके दोषदर्शन से बचा देती है। उनकी अपेक्षा की जगह हमारे अन्दर प्रतिश्रद्धा होनी चाहिये। हमारे भाव तो ऐसे होने चाहिये जैसा कि एक शायर ने लिखा है-

आपकी कसम मुझे तो है इतनी श्रद्धा आप पर।
आप यदि श्राप भी देंगे ओ वरदान बन जायेगा॥

माता-पिता अपनी संतान से और कुछ नहीं चाहते। वे चाहते हैं अपनी संतान का प्रेम। इस प्रेम को सदैव बनाये रखो। वे तुम्हारी श्रद्धा, भक्ति और आत्मीयता के अधिकारी हैं, उपेक्षा के नहीं। उनके उपकारों को कभी चुकाया नहीं जा सकता। कितने कष्टों में उन्होंने तुम्हें पाला है, काश तुम इसे जान पाते। नीतिकारों ने लिखा है-जिसके सिर पर माता-पिता का वरदहस्त रहता है उसका भाग्य और सम्पदा दिनों-दिन ऊपर चढते जाते हैं।

एक विचारक ने लिखा है कि पिता घर के मस्तक हैं और माँ घर का हृदय। यदि शरीर में हृदय की उपेक्षा की जाये तो जीवन समाप्त हो जाता है। घर में यदि माँ की उपेक्षा की जाये तो घर की प्रसन्नता समाप्त हो जाती है। शरीर में मस्तक की उपेक्षा की जाए तो जीवन बिखर जाता है। घर में यदि पिता की उपेक्षा की जाये तो घर अस्तव्यस्त हो जाता है।

1. माता-पिता को अपनी सेवा द्वारा प्रसन्न रखकर।
2. अपने कुल के गौरव को बढाकर।
3. उनके आध्यात्मिक उन्नति में सहयोगी बनकर।

अपने माता-पिता के प्रति बहुत मान और भक्ति होनी चाहिये। उन्हें अपनी सेवा द्वारा सदैव प्रसन्न रखना चाहिये। कोई भी कार्य को प्रारम्भ करो, अपने माँ-बाप से पूछकर करें। यदि किसी कार्य में सफलता मिले तो उनके चरणों में प्रणाम कर कहें कि आपकी कृपा और आशीर्वाद से मुझे इस कार्य में सफलता मिली है। ऐसे पुत्र ही सुपुत्र कहलाने के अधिकारी हैं।

दूसरी बात है- अपने कुल के गौरव को बढाने की। मनुष्य के उन्नत आचार से कुल का गौरव बढता है। अपने कुल के गौरव को बढाए। संतान का आचरण इतना पवित्र और उत्तम होना चाहिये कि जिसे देख कर लोग माँ-बाप से यह पूछ बैठे कि किस पुण्य से आपने ऐसी संतान को पाया है? माँ-बाप जब अपने पुत्र की बडाई सुनते हैं तो उन्हें हार्दिक प्रसन्नता होती है।

तीसरी बात, यदि आप चाहते हैं कि आपके बेटे आपके अनुकूल बर्ताव करें तो सोलह वर्ष की उम्र होने के बाद बेटे से मित्रवत व्यवहार करें। उनसे उन्मुक्त चर्चा करें। उनके मन में यह बात बैठ जानी चाहिये कि हमारे माँ-बाप हमारी भावनाओं, आकांक्षाओं और अरमानों के प्रति आंतरिक सहानुभूति रखते हैं। ऐसा होने पर वे आपके आज्ञाकारी बने रहेंगे। चौथी बात बच्चों को अनुभव का अवसर दें। जब भी कोई सफलता मिले उन्हें प्रोत्साहन दें और यदि उनसे कोई त्रुटि हो जाये तो उन्हें हतोत्साहित करने की जगह उन्हें सांत्वना दें। और साथ ही अपनी संतान को प्रारम्भ से ही संस्कार और समय दें। आजकल के व्यस्त माता-पिताओं के पास अपने ही बच्चों के लिये समय नहीं होता। अपने बच्चों को पैसा देकर लाड खरीदते हैं। ऐसी स्थिति में आपके बच्चे बडे होकर आपके प्रति स्नेह कैसे दे सकेंगे? इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये। पुत्रों को भी चाहिये कि वे माता-पिता को सम्मान करें। उन्हें बेकवर्ड कहकर उनकी उपेक्षा न करें। उनके अनुभवों का लाभ लें। यथोचित सम्मान और सत्कार करें तभी जीवन धन्य होगा।

आचार्यश्री

23 नवंबर 1999 को आचार्यश्री का इंदौर से विहार हुआ था। तब से अब तक प्रतीक्षारत इंदौर समाज

2019 : विहार रूझान

मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार नेमावर से यहां होना चाहिए :




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