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ऋषभ जयंती पर्व

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श्रीमती सुशीला पाटनी

आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ

प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण नवमी को ऋषभ जयंती पर्व मनाया जाता है। इस दिन इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ था। वर्तमान अवसर्पिणी के तृतीय काल में चौदह मनु (कुलकर) हुए जिनमें चौदहवें मनु नाभिराय थे। इन्हीं नाभिराय और उनकी पत्नी मरूदेवि के चैत्र कृष्ण नवमी के दिन उत्तराषाढ नक्षत्र और ब्रह्म नामक महायोग में मति, श्रुत और अवधिज्ञान के धारक पुत्र का जन्म अयोध्या में हुआ था। इन्द्रों ने बालक का सुमेरु पर्वर पर अभिशेक महोत्सव करके ‘ऋषभ’ नाम रखा गया।

ऋषभदेव के अनेक नाम

ऋषभदेव के हिरण्यगर्भ, स्वयंभू, विधाता, प्रजापति, इश्वाक, पुरुदेव, वृषभदेव, आदिनाथ इत्यादि अनेक नाम पाये जाते हैं। महापुराण के अनुसार चूंकि उनके स्वर्गावतरण के समय माता ने वृषभ को देखा था, अतः वे वृषभ नाम से पुकारे गये। कल्पसूत्र में उपर्युक्त कारण के अतिरिक्त उनके उरुस्थल पर वृषभ का चिन्ह होने का कारण भी उल्लिखित किया है। भागवत पुराण के अनुसार उनके सुन्दर शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्वर्य, यश और पराक्रम प्रभूति सद्गुणों के कारण महाराजा नाभि ने उनका ‘ऋषभ’ नाम रखा। वृषभदेव जगत भर में ज्येष्ठ हैं और जगत का हित करने वाले धर्म रूपी अमृत की वर्षा करेंगे, एतदर्थ ही इन्द्र ने उनका नाम ‘वृषभदेव’ रखा। वृष श्रेष्ठ को कहते है। भगवान श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हैं, इसलिये भी इन्द्र उन्हें ‘वृषभस्वामी’ के नाम से पुकारा। जब वे गभग में थे तभी हिरण्य (स्वर्ण) की वर्षा हुई थी, इसलिये देवों ने उन्हें ‘हिरण्यगर्भ’ कहा। वर्तमान जन्म से पूर्व तीसरे जन्म जो तीन ज्ञान प्रकट हुए थे उन्हीं के साथ वे उत्पन्न हुए इसलिये ‘स्वयम्भु’ कहे जाते हैं। उन्होंने भारत क्षेत्र में नाना प्रकार की व्यवस्थाएं की, अतः वे ‘विधाता’ कहे जाते हैं। वे सब ओर से प्रजा की रक्षा करते हुए ही प्रभु हुए, अतः ‘प्रजापति’ कहलाते हैं। उनके रहते हुए प्रजा ने इक्षु रस का आस्वादन किया, इस लिये उन्हे इक्ष्वाकु कहते हैं। वे समस्त पुराण पुरुषों में प्रथम थे, महिमा के धारक और महान थे तथा अतिशय देदीप्यमान थे अतः उन्हें ‘पुरुदेव’ कहते हैं। धर्म कर्म के आदिप्रवक्ता होने के कारण ऋषभदेव को आदिनाथ भी कहा जाता है।

गृहस्थ जीवन

ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे। जब वे युवा हुए तो नन्दा और सुनन्दा नामक कन्याओं के साथ उनका विवाह हुआ। नन्दा के भरत नामक चक्रवर्ती पुत्र और ब्रह्मी नामक पुत्री युगल रूप में उत्पन्न हुई। इन्हीं भरत ले नाम से इस देश का नाम भारत पडा।

भरत और ब्राह्मी के अतिरिक्त नन्दा रानी के वृषभसेन आदि अट्ठानवे पुत्र और हुए। सुनन्दा नामक दूसरी रानी के बाहुबली नामक पुत्र तथा अतिशय रूपवती सुन्दरी नामक पुत्री को जन्म दिया।

ऋषभदेव ने असि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य और व्यापार इन छः विद्याओं का सूत्रपात किया। कृषि और उद्योग में अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया। कर्मयोग की वह रसधारा बही कि उजडते और वीरान होते जन-जीवन में सब और नव वसंत खिल उठा, महक उठा। जनता ने उन्हें अपना स्वामी माना और धीरे-धीरे  बदलते हुए समय के अनुसार दण्ड-व्यवस्था, विवाह आदि समाज-व्यवस्था का निर्माण हुआ।

ऋषभदेव विषयक मान्यताएं

भागवत पुराण में ऋषभदेव को विष्णु का आठवां अवतार स्वीकार किया गया है। वहां कहा गया है कि भगवान विष्णु महाराजा नाभि का प्रिय करने के लिये उनके अंतःपुर की महारानी मरुदेवी के गर्भ में आए। उन्होने इस पवित्र शरीर का अवतार वातरशना श्रमण ऋषियों के धर्मों को प्रकट करने की इच्छा से ग्रहण किया।

  • ऋषभदेव ने साधक अवस्था में नग्न दिगम्बर वेष को अपनाया। शिव भी दिगम्बर वेषधारी स्वीकार किये जाते हैं।
  • ऋषभदेव की तप तथा निर्वाणभूमि कैलाशपर्वत मानी जाती है। शिव का भी निवास कैलाश पर्वत ही माना जाता है। भगवान ऋषभदेव का कैलाशपर्वत से निर्वाण हुआ तो चक्रवर्ती भरत ने उनके निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में कैलाश पर 72 चेत्यालय बनाये।
  • शिव का वाहन वृषभ है और ऋषभदेव का चिन्ह भी वृषभ है।
  • हिमवत पर्वत के पद्य द्रह से गंगा नदी निकलकर जिस स्थान पर गिरती है, वहाँ जटाजूट वाली खडगासन अकृत्रिम ऋषभदेवकी मूर्ति है। शिव के जटाजूट में गंगावतरण कहा जाता है।
  • शिव के अन्धकासुर नामक त्रिशूल से मिथ्यात्वअन्धकार-नाशक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्ररूप रत्नत्रय ग्रहण किये जा सकते हैं।
  • शिव के विषपान से ऋषभदेव से विकार पान का आशय है।
  • शिव को पशुपति कहा जाता है। ताण्ड्य और शतपथ ब्राह्मण में ऋषभ को पशुपति कहा है।

श्री, यश, शांति, धन, आत्मा, आदि अनेक अर्थों में पशु शब्द का व्यवहार वैदिक साहित्य में पाया जाता है। अतः पशुपति शब्द का अर्थ हुआ प्रजा, श्री, यश, धन, आत्मा, आदि का स्वामी। चूंकि ऋषभ इन सबके स्वामी थे अतः वे पशुपति कहलाए।

ऋषभदेव का वैराग्य

ऋषभ के जन्म से लेकर तेरासी लाख पूर्व व्यतीत हो गये तब इन्द्र को चिंता हुई कि मानवता का कल्याण करने के लिये तथा संसार को मुक्ति की राह दिखाने के लिये जिसका जन्म हुआ है वह भोगों में लिप्त हो रहा है। अतः ऋषभदेव को वैराग्योन्मुख करने के लिये इन्द्र ने नीलांजना नामक एक अप्सरा को नृत्य हेतु ऋषभदेव के दरबार में भेजा। उस अप्सरा की आयु अल्प थी, अतः वह नृत्य करते-करते ही विलीन हो गयी। इन्द्र ने ततक्षण वैसे ही रूपवाली दूसरी अप्सरा को नृत्य के लिये उपस्थित कर दिया। समय की क्षिप्रता के कारण इस बात को अन्य लोग नहीं जान सके। किंतु ऋषभदेव ने यह जान लिया और यह देखकर उन्हें संसार से विराग हो गया। तत्क्षण लौकांतिक देव आए। उन्होने ऋषभदेव के वैराग्य की प्रशंसा की। वे देवों द्वारा लायी शिविका पर चढकर सिद्धार्थ नामक वन में पहुँचे। वहाँ उन्होने अंतरंग और बहिरंग परिग्रह का त्याग संयम धारण कर लिया।

आहार प्राप्ति

छः माह बाद प्रतिमा योग का संकोचकर वे आहार के लिये चले। उस समय कोई आहार-दान की विधि नहीं जानता था, अतः छः माह तक निराहार विचरण करते रहे। अंत में पूर्व जन्म का स्मरण हो जाने पर श्रेयांस को आहारदान की विधि स्मृत हुई और उन्होंने उन्हें आहार दिया। सारी प्रजा ने खुशियाँ मनाई।

केवलज्ञान और निर्वाण

चार ज्ञान को धारण करने वाले ऋषभदेव ने स्वयं मोक्षतत्व का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिये एक हजार वर्ष तक नाना प्रकार का तप किया। लम्बी-लम्बी जटाओं के भार से सुशोभित हो रहे थे। अनंतर विहार करते हुए वे वृषभसेन के राज्य में पूर्वतालपुर नगर में आये। वहां वे शकटास्य नामक उद्यान में ध्यान धारणकर वटवृक्ष के नीचे एक शिला पर पर्याकांसन कर्मों का नाशकर केवल ज्ञान प्राप्त किया। दोनों ने उनके समवसरण की रचना की। भव्यजीवों को उपदेश देते हुए अंत में वे कैलाश पर्वत पर जा कर आरूढ हो गये और योगों का निरोधकर शेष चार अघातिया कर्मों का नाशकर मुक्ति प्राप्त की। उनकी कुल आयु चौरासी लाख पूर्व की हुई।

वर्तमान कर्मयुग और धर्मयुग के आदि सूत्रधार होने के कारण ऋषभदेव मानव संस्कृति के आद्य सृष्टा, विधाता और प्राण है। उनकी पावन जयंती हमें उन जैसा निस्पृह बनकर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देती है। उनका पावन चरित्र स्पृहणीय और वन्दनीय है। हमें अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी जयंती-पर्व मनाना चाहिये।

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