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नारेली क्षेत्र परिचय : अजमेर (राजस्थान)

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जिस स्थान से तीर्थ का प्रवर्तन किया जाता है, उसे तीर्थ कहते है अर्थात जहाँ भव्य जीव साधना कर संसार से तिरने की शिक्षा प्राप्त करते हैं, उन्हें तीर्थक्षेत्र कहते हैं। ऐसे भारत में अनेक जैन तीर्थक्षेत्र हैं, जिन्हें श्रावकों ने श्रद्धाभक्ति से बनाया और आज वे जगत विख्यात अतिशय क्षेत्र बन गये। इसी श्रृंखला में इस जैन धर्म की संस्कृति को अक्षुण्ण रखने एवं वृद्धिगत करने के लिये इस श्री दिगम्बर जैन ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र की स्थापना की गयी।

विश्व वन्दनीय आदर्श दिगम्बराचार्य संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज की दीक्षा स्थली अजमेर में वर्षों की साधना, आराधना, प्रार्थना के परिणाम स्वरूप आपके ही परम शिष्य आध्यात्मिक संत वास्तुविज्ञानी मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज का सन 1994 में ऐतिहासिक वर्षायोग हुआ।

नारेली क्षेत्र को आचार्य श्री भरत सागर जी ने अतिशय क्षेत्र घोषित किया था।

इसी वर्षायोग में कार्तिक सुदी पूर्णमासी के दिन सन 1994 को रात्रि के अंतिम प्रहर में स्वप्न में मुनि श्री को अजमेर की पूर्व दिशा में एक पहाडी भूखण्ड के दर्शन हुए। प्रातः काल मुनि श्री ने समाज से कहा कि आज पूर्व दिशा में चलो इसी दिशा में तीर्थ क्षेत्र बनेगा। समाज के कुछ लोग मुनि श्री एवं क्षु गंभीर सागर क्षु धैर्य सागर एवं ब्र संजय जी नारेली की तरफ चल पडे रास्ते में मदार क्षेत्र की अनेक पहाडियों का निरीक्षण करते हुए चल्ते गये और एकाएक श्रीनगर – बड्ल्या चौराहा के पास मुनि श्री उत्तर दिशा की तरफ बाईपास पर मुड गये। लगभग पौन किलोमीटर चलने के बाद मुनि श्री के चरण नारेली के इस विशाल पहाडी सहित भूखण्ड पर रुक गये तथा आँख बन्द कर खडे हो गये, ध्यान करने के बाद घोषणा कर दी कि इसी स्थल पर तीर्थ क्षेत्र बनेगा, यह भूमि वास्तु दोषों से रहित है, इस भूमि पर खडे होते ही हृदय में आह्लाद उत्पन्न हो रहा है, उसी समय एक गाय अपने बछडे को दूध पिला रही थी। मुनि श्री ने कहा कि यह सबसे बडा शुभ – शगुन है। मुनि श्री ने इस क्षेत्र की माटी की सुगन्ध का निरीक्षण किया सभी तरफ से योग्य प्रतीत हुई। समाज के लोगों ने उसी समय पानी भरा श्री फल फोड कर उसी के जल से मुनि श्री के चरण कमल का अभिषेक कर गंधोदक बनाकर क्षेत्र को पवित्र कर दिया मुनि श्री की चरण कमल की रज से भूखण्ड धन्य – धन्य हो गया। भजन की पंक्ति सार्थक हुई :

जहाँ – जहाँ पैर पड़े संतन के
वहाँ – वहाँ तीरथ होय।

मुनि श्री को आभास हुआ कि जरूर इस भूमि पर प्राचीनकाल में संतों ने तपस्या की होगी। पहाडी की चट्टान पर बैठ कर समाज को सम्बोधन दिया के इस भूमि पर भारत का प्रसिद्ध अद्वितीय बहु – उद्देशीय तीर्थ क्षेत्र बनेगा। धार्मिक रचनाओं के साथ सामाजिक परोपकारी एवं दया के प्रतीक आयतन बनेंगे।

यह क्षेत्र अजमेर से 10 किलोमीटर पूर्व दिशा में किशनगढ 25 ब्यावर बाईपास पर स्थित है। यहाँ की सम्पूर्ण योजनायें ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र के प्रेरणास्त्रोत मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद से वास्तुशास्त्रानुसार सम्पन्न हो रही है। जैसे 1000 वर्ष पूर्व सिद्धांत चक्रवर्ती नेमिचन्द्र के निर्देशन में विश्व प्रसिद्द गोम्मटेश बाहुबली क्षेत्र बना था, उसी प्रकार महामुनि सुधासागर जी महाराज के निर्देश में तथा उनकी साधना, तपस्या एवं आशीर्वाद की छाया में यह क्षेत्र सम्वर्धित-संरक्षित होता हुआ विकास की चरम ऊँचाईयाँ छू रहा है तथा अपनी योजना के स्वप्न को साकार रूप दे रहा है।

क्षेत्र की स्थापना :

संत शिरोमणि परम पूज्य आचार्य 108 श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक गम्भीर सागर जी, क्षुल्लक धैर्य सागर जी महाराज की प्रेरणा/आशीर्वाद एवं सान्निध्य में 30 जून, 1995 को 300 बीघा भूखण्ड में श्री कुन्द-कुन्द मूल आम्नायानुसार विश्व के प्रथम बहु-उद्देशीय श्री दिगम्बर जैन ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र की स्थापना की गयी है।

नामाकरण:

संस्कृत साहित्य के विश्व प्रसिद्ध विद्वान चार-चार संस्कृत महाकाव्यों सहित 30 ग्रंथों के सर्जक महाकवि दिगम्बराचार्य ज्ञानसागर जी महाराज हुए हैं। जिन्होंने 01 जून, 1973 में अजमेर से 22 किलोमीटर दूर नसीराबाद में आगमानुसार 6 माह तक विधिवत यम सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण किया। नसीराबाद मिलेट्री छावनी होने के कारण वहाँ दादा गुरु की स्मृति स्वरूप विशाल स्थल नहीं बनाया जा सकता था। अतः कुन्द-कुन्द मूलाम्नाय एवं श्रमण संस्कृति के उन्नायक आचार्य श्री विद्यासागर के गुरु एवं आचार्य शिवसागर महाराज के प्रथम शिष्य महाकवि आचार्य ज्ञानसागर की स्मृति चिरस्थाई बनाये रखने हेतु आपके ही प्रशिष्य मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के मुखारविन्द से इस क्षेत्र का नाम श्री दिगम्बर जैन ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र 30 जून, 1995 को उद्घघोषित किया, जिसे हजारों लोगों की सभा ने जयकारों के साथ स्वीकार किया, तभी से यह क्षेत्र इसी नाम से जाना जा रहा है और विश्व भर में सदैव इसी नाम से जाना जाता रहेगा।

ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र पर प्रथम वर्षा योग :

समाज की सच्ची श्रद्धा, आराधना एवं प्रार्थना के परिणामस्वरूप संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से श्री ज्ञानोदय तीर्थ के प्रेरणास्त्रोत मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज एवं क्षुल्लक श्री गम्भीर सागर जी क्षुल्लक श्री धैर्य सागर जी महाराज एवं ब्रह्मचारी संजय जी का सन 1997 में क्षेत्र पर प्रथम वर्षायोग हुआ। यह वर्षायोग क्षेत्र के लिये वरदान सिद्ध हुआ, क्षेत्र की लगभग अधिकांश योजनायें इसी वर्षायोग में घोषित हो गयी। एक हजार शिविरार्थियों का श्रावक संस्कार शिविर आर. के. मार्बल प्राईवेट लिमिटेड, किशंनगढ के सौजन्य से सम्पन्न हुआ। इस वर्षायोग में मुनि श्री ने 15 दिन तक लगातार रात्रि में पहाडी पर प्रतिमा योग धारण कर क्षेत्र को तपस्या स्थली बना दिया। करोडों जाप इस क्षेत्र पर कराये गये।

श्री 1008 त्रिलोकतिलक महामण्डल विधान आपके ही ससंघ सान्निध्य में 800 इन्द्र-इन्द्रानियो द्वारा सम्पन्न किया गया। समापन पर दिगम्बर जैन श्रेष्ठी जैन गौरव श्री अशोक पाटनी, आर. के. मार्बल प्राइवेट लिमिटेड, किशनगढ के नेतृत्व में पहाडी पर गजरथ पर श्री जी की विशाल शोभायात्रा ले जाकर पाण्डुक शिला पर 1008 कलशों से श्री जी का महामस्तकाभिषेक किया गया, इसी दिन राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखवत, उच्च शिक्षामंत्री श्री ललित किशोर चतुर्वेदी आदि मंत्रीगण पधारे। क्षेत्र की बहुउद्देशीय पार्मार्थिक एवं सामाजिक परोपकारी योजनाओं को देख कर सरकार ने पहाडी तक डामर युक्त सडक बनाने की घोषणा की और दो माह के अंदर कार्य भी प्रारम्भ कर दिया। आज सडक का सम्पूर्ण कार्य समाप्त होकर, सिंहद्वार से लेकर पहाडी की ऊँचाईयों तक यात्रियों को जाने के लिये उपलब्ध है।

नाभिस्थल की स्थापाना (22 फरवरी, 1998 को दिन के 1:00 बजे) :

यह क्षेत्र नवोदित है, अतः इसे तीर्थक्षेत्र का संस्कार देने के लिये मुनि श्री की प्रेरणा से आपके ही ससंघ सान्निध्य में श्री सम्मेदशिखर जी, श्री कैलाशजी, श्री गिरनार जी, पावापुर जी चम्पापुर जी आदि सारे तीर्थ सिद्ध क्षेत्रो एवं अनेको अतिशय क्षेत्रों की पवित्र माटी इस क्षेत्र के मध्य केन्द्र में दिगम्बर जैन श्रेष्ठी श्री रतनलाल जी, श्री कंवरलाल जी जैन गौरव अशोक कुमार, सुरेश कुमार एवं विमल कुमर पाटनी, आर. के. मार्बल प्राइवेट लिमिटेड, किशनगढ द्वारा 1008 कलशों में उस पवित्र रज एवं बहुमुल्य धातुओं को भरकर तथा रजत के विशाल स्वास्तिक एवं 4-4 फुट लंबे चौडे यंत्रों की स्थापना की गयी। 1008 महिलाओं द्वारा कलश भरकर इस नाभी स्थल पर स्थापित किये एवं सदैव अखण्ड ज्योति जलती रहेगी।

त्रिमूर्ति जिनालय :
गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने की योग्यता रखने वाली विश्व में प्रथम 1008 भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंथनाथ, भगवान अरहनाथ की 24,000 किलोग्राम की अष्ट धातु की अलौकिक अनुपम विशाल सौम्य त्रिमूर्तियों को मन्दिर बनने के पूर्व ही मूल स्थल पर विराजमान कर दी। मूर्तियों की विशालता के कारण मन्दिर निर्माण के बाद ही स्थापित करना सम्भव नहीं था। ये प्रतिमायें प्रतिष्ठा के पूर्व ही अपना अतिशय दिखा रही है। सैकडों लोग प्रतिदिन इन अलौकिक मूर्तियों के दर्शन कर आश्चर्य चकित हो कर धन्य धन्य हो जाते है।

तलहटी का आदिनाथ मूल जिनालय :

इस जिनालय में वृत्ताकार प्रथम मंजिल पर प्रवचन हॉल पूरा हो गया। दूसरी मंजिल पर भारत में प्रथम लाल पाषाण से निर्मित भगवान ऋषभदेव की 21 फुट पद्मासन प्रतिमा विराजमान हो चुकी है। मन्दिर का निर्माण पूरा हो गया है। महाकवि आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज सभागृह सहित इस जिनालय का 11 अगस्त, 1997 को मुनि श्री के ससंघ सानिध्य में दिगम्बर जैन श्रेष्ठी श्री रतनलाल जी, श्री कंवरलाल जी, युवारत्न अशोक कुमार, सुरेश कुमार एवं विमल कुमार पाटनी, आर. के. मार्बल प्राइवेट लिमिटेड परिवार ने शिलान्यास कर पुण्यार्जन किया। इस जिनालय का प्रारूप अक्षरधाम मन्दिर का स्मरण दिलाने वाला होगा। यह जिनालय क्षेत्र का तलहटी स्थित मूल जिनालय है, जो सबसे बडे स्थान पर है। पाटनी परिवार द्वारा निर्मित यह मन्दिर भारत में अपनी विशालता एवं सौन्दर्य के लिये अनुपम होगा, निर्माणाधीन मन्दिर की भव्यता देखने प्रतिदिन हजारों लोग आते हैं।

सहस्त्रकूट जिनालय :
अरिहंत तीर्थकरों के शरीर में 1008 सुलक्षण होते हैं। अतः तीर्थकओं को 1008 नामों से पुकारते हैं। इस एक-एक नाम के लिये एक-एक वास्तुकला में विराजमान कर 1008 जिनबिम्ब एक स्थान पर विराजमान किये जाते हैं। इस जिनालय का 31 जनवरी,1998 को मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में शिलान्यास हो चुका है। इस जिनालय में 1008 प्रतिमायें होंगी।

त्रिकाल चौबीसी जिनालय (ध्यान केन्द्र) :

यह वह जिनालय है जिसमें भरत क्षेत्र के भूत, भविष्य व वर्तमान की 24-24 जिन प्रतिमायें 5’6” फुट उतुंग (पाषाण) की 72 प्रतिमायें 24 जिनालयों में विराजमान की जावेगी। एक-एक मन्दिर में तीन-तीन प्रतिमायें स्थापित की जायेंगी। इन जिनालयों का शिलान्यास 27, दिसम्बर 1997 को मुनि श्री के ससंघ सान्निध्य में पृथक-पृथक पुण्यार्जकों द्वारा प्रारम्भ किया गया था।

प्रत्येक दर्शनार्थी इन मन्दिरों को देख कर भावविभोर हो जाता है। इस युग में प्राचीन पद्धति के अनुसार 24 मन्दिरों का निर्माण होना अपने आप में एक अतिशय है। प्रत्येक यात्री यही कहता है कि हम धन्य हैं कि हम अपने जीवन काल में ऐसे मन्दिरों का निर्माण कार्य देख रहे हैं। इस मन्दिर की आधुनिक टेक्नोलॉजी, भव्यता एवं सौन्दर्य देख कर अनेक साधु-संतों श्रेष्ठीजनों विद्वद्जनों कला-प्रेमियों इंजीनियरों एवं वास्तुविज्ञों ने खुले मुख से इसकी प्रशंसा की है। हम सब धन्य हैं कि जो इस युग में ऐसे विशाल जिनालय स्थापित होते देख चुके हैं।

समवशरण जिनालय :

तीर्थकर प्रकृति के पुण्य के फलस्वरूप समवशरण की विभूति प्राप्त होती है। इस समवशरण की रचना कुबेर अपनी स्वर्ग की सम्पत्ति लगा कर अलौककिक अनुपम रूप से रचना करता है। जिस समवशरन में विराजमान भव्य जीवों को भगवान उपदेश देकर मोक्ष मार्ग का प्रवर्तन करते हैं तथा चक्रवर्ती आदि मनुष्यगण, देव, तिर्यंच, बारह सभाओं के रूप में बैठकर दिव्य ध्वनि का पान करते हैं, ऐसे समवशरण की रचना, स्थापना निक्षेप से इस कलिकाल में समस्त स्थापना निक्षेपों से श्रेष्ठ है। इसका शिलान्यास दिनांक 30 जुलाई, 2000 को कटारिया परिवार ने किया।

सहस्त्रफणी पार्श्वनाथ जिनालय :
तलहटी एवं पहाडमार्ग पर जहाँ से सीढियाँ प्रारम्भ होती है, धर्मनिष्ठ, उदारमना श्रेष्ठी श्री तिलोकचन्द जी महेन्द्र कुमार जी गादिया, अजमेर के पुण्यार्जकत्व में इस मन्दिर का निर्माण कार्य लगभग पूर्ण-सा हो गया है।

संतशाला :

तीर्थ क्षेत्र हमेशा से साधु-संतों के धर्म-ध्यान करने का आवास स्थान रहे हैं। इस क्षेत्र पर भी महाकवि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जैसे महासंत संघ के साथ भविष्य में यहाँ विराजमान होंगे एवं अन्य पूजनीय आचार्य साधुगण वन्दनार्थ, साधनार्थ, विराजमान रहेंगे। उनकी साधनानुकूल पहाडी पर बहुत ही सुन्दर संतशाला का निर्माण किया गया है।

भोजनशाला:

आगंतुक बन्धुओं के शुद्ध सात्विक भोजन की व्यवस्था हेतु बहुत ही सुन्दर भोजनशाला का निर्माण किया गया है, जिसमें एक साथ 2,000 व्यक्ति बैठकर भोजन कर सकते हैं। जिसका शिलान्यास दिगम्बर जैन महिला मण्डल द्वारा 11 अगस्त, 1997 को मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में किया गया। राजस्थान का यह प्रथम भोजनालय है।

गौशाला:
वर्तमान में मानव स्वार्थ पूर्ण होता चला जा रहा है। इसी कारण से गाय, बैल, भैंस आदि जब इसके उपयोगी नहीं होते अथवा दूध देना बन्द कर देते हैं तब व्यक्ति उनकी सेवा सुश्रूषा नहीं कर के उनको कसाई अथवा बूचडखाने में भेज देता है। ऐसे बेसहारा पशुओं को इस क्षेत्र में रखकर उनके जीवन को अकाल मृत्यु से बचाया जा रहा है। वर्तमान में 450 गौवंश का पालन किया जा रहा है। इसका विधिवत उद्घाटन 10 दिसम्बर, 1995 को मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमान भैरोसिंह जी शेखावत के मुख्यातिथ्य में किया गया था।

गौशाला के भूखण्ड में विशाल चारागृह 450 गायों के रहने के लिये विशाल शेड खेलिया सहित निर्मित किये गये हैं। रुग्न गायों की सेवार्थ चिकित्सालय सुविधा उपलब्ध है। साथ ही पानी के लिये पहाड की तलहटी में विशाल पक्क पानी का टैंक बनाया गया है। चारे के लिये कुट्टी मशीनें आदि रखी गयी हैं। यह गौशाला दान-दातारों ले सहयोग से चल रही है। समिति का निवेदन है कि अहिंसा एवं दया के महायज्ञ में अपना आर्थिक सहयोग प्रदान कर अपने जीवन में अहिंसा को क्रियांवित कर जीवन धन्य करें। बूचडखाने जाती हुई कसाईयों के हाथों से छुडाकर गायों को जीवन दान दिया जाता है। अकाल की विभिषिका में मौत से जूझती हुई सैकडों गायों को जीवनदान इस गौशाला ने दिया है।

आर्यिका वसति/ महिला आश्रम :

परम पूज्य मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागर जी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में दिनांक 03 दिसम्बर, 2000 को प्रातः 8:30 बजे महिला श्रेष्ठी श्रीमती सुशीला जी पाटनी ध. प. जैन गौरव युवारत्न श्रीमान अशोक जी पाटनी एवं श्रीमती अंजना पहाडिया ध. प. परम गुरुभक्त, दानवीर श्रेष्ठी श्री निहालचन्द जी पहाडिया, किशनगढ ने शिलान्यास किया।

सिंहद्वार/मुख्य प्रवेश द्वार :

भव्य सिंह द्वार का प्रवेशोत्सव व उद्घाटन दिनांक 16जून, 2000 शनिवार वास्तुविज्ञ क्षेत्र के प्रणेता मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में इस विशाल मुख्य द्वार का शिलान्यास विश्व विख्यात जैन गौरव दानवीर श्रेष्ठी श्री रतनलाल जी कंवरलाल जी सा. पाटनी, आर. के. मार्बल परिवार, किशनगढ के करकमलों से सुसम्पन्न हुआ। लालपाषाण से निर्मित यह सिंह द्वार 81 फुट ऊँचाई का है। इसके दोनो ओर सुरक्षा कर्मचारियों के लिये दो मंजिले कमरे बनाये गये हैं। इस द्वार में प्रवेश होते ही क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण श्री आदिनाथ जिनालय में स्थापित विशाल भव्य मनोहरी आदिनाथ भगवान की प्रतिमा के दर्शन होते हैं।

क्षेत्र कमेटी ने पैदल जाने वाले यात्रियों के लिये सीढियों का निर्माण कराकर पहाड पर जाने का मार्ग बहुत सुलभ कर दिया है।

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