| प्रतिभास्थली | भाग्योदय तीर्थ अस्पताल | रेवातट सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र | दयोदय तीर्थ (जबलपुर) |
| बीनाजी-बारहा | दयोदय चेरिटेबल फाउंडेशन ट्रस्ट | श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र (कुण्डलपुर) |
| श्री दिगंबर जैन सर्वोदय तीर्थ क्षेत्र (अमरकंटक) | पुण्योदय तीर्थ हाँसी
 
धार्मिक गतिविधियाँ (Religious Activity)
 
प्रतिभास्थली
आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की प्रेरणा प्राप्त कर प्रतिभा मंडल की विदुषी ब्रह्मचारिणी बहनें इस महती शिक्षण योजना में अपनी सक्रिय सहभागिता प्रतिपादित करने के दृढ़ संकल्प सहित वनस्थली तथा हस्तिनापुर में विशेष अध्ययन प्राप्त कर इस संस्थान को अपनी सेवाएँ देने हेतु उद्यत हैं।
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भाग्योदय तीर्थ अस्पताल : सागर
''पीड़ित मानव की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।'' इसी उक्ति को ध्यान में रखकर इस युग के संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की साक्षात मौजूदगी में पाँच वर्ष पूर्व हम सबने मिलकर भाग्योदय तीर्थ रूपी एक पौधा रौंपा। हमारे साथ कितने जाने-अनजाने लोगों ने इसे अपने तन-मन और धन से सींचकर बड़ा किया और आज यह मानव सेवा में लगा है। हमने बहुत कुछ किया है लेकिन बहुत कुछ बाकी है। उसके अनंत यात्रा को जारी रखने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है।
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श्री दिगंबर जैन रेवातट सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र ट्रस्ट : देवास
त्रिकाल चौबीसी एवं पंचबालयति जिनालय में से तीन मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण होकर अगले तीन मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है तथा निर्माण प्रगति पर है। आचार्य श्री जी के चातुर्मास काल में जिन दानदाताओं ने मंदिर निर्माण में दान राशि की घोषणा एवं सहयोग किया। उसके लिए कमेटी बहुत-बहुत साधुवाद देती है। घोषणा राशि तथा नवीन दान प्रदान करके चल रहे निर्माण कार्य में सहयोग देकर पुण्य लाभ अर्जित करें।
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दयोदय तीर्थ पशु संवर्धन एवम्‌ पर्यावरण केंद्र : जबलपुर
धर्म प्रभावना एवं आर्यिका संघ की भावना से प्रेरित होकर श्री दिगंबर जैन समाज जबलपुर ने यह निश्चय किया कि बहुजन हिताय, बहुजन सुखायः, श्रमण संस्कृति के प्रभावनार्थ परमार्थिक गतिविधियों के संचालन करने के पवित्र उद्देश्य से एक आधुनिक गौशाला का निर्माण करने के लिए एक सार्वजनिक न्यास दयोदय पशु संवर्धन एवं पर्यावरण केंद्र (गौशाला) जबलपुर के नाम से स्थापित किया जाए।
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श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बीनाजी-बारहा : सागर
 
परम पावन अतिशय क्षेत्र बीनाजी-बारहा बुंदेलखण्ड में जैन संस्कृति की गौरवपूर्ण धरोहर है। यह एक प्राचीन अतिशय क्षेत्र है, जो सुख-चैन नदी के समीप अपनी अलौकिक छटा बिखेरता हुआ प्रकृति के सुरम्य वातावरण में स्थित है। प्राचीनता, भव्यता, अतिशय एवं आकर्षण में यह पावन क्षेत्र अपना अद्वितीय स्थान रखता है।
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दयोदय चेरिटेबल फाउंडेशन ट्रस्ट : इंदौर
जिस हृदय में 'दया' का दरिया लहराने लगे, जिसकी तपस्या से अर्जित जीवन-दर्शन हर हृदय में गुँजरित करने की ललक जग जाए, वह आत्मा मानव जीवन में जन्म धारण करने के कारण 'विद्यासागर' कहला सकती है। उन्हीं 'विद्यासागर' के आलोकित पथ पर चलकर अनंत सत्य के शिखरों को स्पर्श किया जा सकता है। 'दयोदय चेरिटेबल फाउंडेशन' इसी सत्य की किरण को छूने का एक दयामई प्रयास है। 'निरीह पशुओं के वध से द्रवित व आशीष से प्रसूत 'दयोदय चेरिटेबल फाउंडेशन' का गठन पशुओं को कत्लखाने के बजाए उन्हें पालकर जीवन जीने का अधिकार प्रदान करने के उद्देश्य से हुआ है।
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श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र : दमोह
प्राकृतिक सुषमा की आनंदमयी गोद में कुण्डलाकार पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित ऊंचे-ऊंचे जिनालय। दूर तक विस्तृत हरियाली और उसके ऊपर बड़े बाबा की भव्य, मनोहारी, मनोवांछित फलदायिनी और वितरागी प्रतिमा। कुल मिलाकर तीर्थयात्री का मन मोहने तथा आह्‌लादित करने को पर्याप्त है। भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश के सागर संभाग का एक जिला है दमोह। यहीं स्थित है जिला मुख्यालय से लगभग ३५ कि.मी. दूर पटेरा तहसील में, बुंदेलखंड का 'तीर्थराज' कुण्डलपुर। बड़े बाबा और प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का पावन और अद्वितीय तीर्थ-स्थल। यहीं स्थित है सुरम्य 'कुण्डलगिरि' नामक ६२ छोटे-बड़े जिन मंदिरों का उजला समूह। इनके बीच में स्थित है जैन धर्म की कीर्ति पताका फहराते हुए, जिन शिरोमणि 'बड़े बाबा' का मुख्य मंदिर।
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श्री दिगंबर जैन सर्वोदय तीर्थ क्षेत्र : अमरकंटक
गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकार्ड के लिए प्रस्तावित परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से कानपुर (उन्नाव) में ढली, अष्ट-धातु से निर्मित २४,००० किलोग्राम वजनी संसार की सबसे वजनदार भगवान श्री आदिनाथजी की पद्मासन प्रतिमा है।
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श्री 1008 भगवान पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षे‍त्र 'पुण्योदय तीर्थ' हाँसी
तोमर वंशीय सम्राट अंनगपाल प्रथम जिन्होंने 736 ई. में वर्तमान दिल्ली को बसाया, उन के प्रतापी पुत्र राजकुमार द्रुपद ने हाँसी में गढ़ (जो अब खंडहर रूप में है) का निर्माण करवाया था। पांडवों के तोमर वंशीय शासकों ने यहाँ 1153 ई. तक राज किया। इतिहास प्रसिद्ध सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज शाकम्भरी के चौहान नरेश विसलदेव ने हाँसी क्षे‍त्र जीतकर राज किया। उस काल खण्ड में हाँसी में भगवान पार्श्वनाथ एवं अन्य भव्य मंदिर थे। भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की दुर्भाग्यपूर्ण पराजय के बाद हाँसी पर मोहम्मद गौरी के एक मुँह लगे गुलाम कुतुबुद्दीनऐबक का कब्जा हुआ। इस तुर्क लुटेरे ने हाँसी के भव्य मंदिरों को लूटने के बाद नष्ट भी किया। ऐसे ही हिंसक लुटेरे मीरा साहब व अन्यों से बचाने के लिए अनेक शूरवीरों एवं धर्मपरायण श्रावकों एवं श्रद्धालुओं ने जान पर खेलकर कुछ जिन प्रतिमाओं को हाँसी किले में भूमिगत कर दिया।
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