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रविवारीय प्रवचन (आचार्य श्री) [3-6-2012 – 22-7-2012]

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दिल्ली नहीं दिल जीतो ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी(दिनांक – 22-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की भिक्षा के लिए जाते समय सावधानी रखना चाहिए! त्रस और स्थावर जीवों को पीड़ा न पहुचे इसलिए अन्धकार में प्रवेश नहीं करते हैं ! आत्मा की विराधना नहीं होनी चाहिए, इधर – उधर अवलोकन करके घर में प्रवेश करना चाहिए संयम की विराधना न हो यह ध्यान रखना चाहिए ! वंदना करने वालों को आशीर्वाद देते हुए निकलते हैं साधू ! आहार के समय कोई नियम (विधि लिकर) जिनमन्दिर आदि से आहार के लिए निकलते हैं !
इतिहास उपहास का पात्र होता है या तो हँसते हैं या रोते हैं ! आचार्य श्री ने प्रधुमन की कथा सुनाई और कहा की तीन दिन के बालक का अपहरण हो जाता है ! कोई चमत्कार नहीं करता अपने कर्म ही चमत्कार करते हैं ! सब भावों का खेल है ! आस्था जब तक दृढ नहीं होती तब तक पैर डगमगाते हैं ! आस्था दृढ  होती है तो वह अडिग होकर चलता है ! आदर्श को देखते हैं तो मेरा – तेरा नहीं होता वीतरागता में भेद नहीं होता ! यह मंदिर मेरा, मेरे पूर्वजों ने बनवाया था , यह प्रतिमा मैंने विराजमान करवाई ऐसा भाव नहीं आना चाहिए ! उसकी पूजा आदि व्यवस्था तो करना चाहिए |

धन के नष्ट होने से दुःख होता है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी(दिनांक – 21-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी कहते हैं की भगवान् के वैराग्य रूपी हवा के झकोरों से इन्द्र का सिंहासन कम्पित होता है ! तब इन्द्र अवधि ज्ञान रूपी दृष्ठि का उपयोग करके भगवान् के द्वारा प्रारंभ किये जाने वाले कार्य को जानता है ! सौधर्म इन्द्र के पास ही मोबाइल नंबर रहता है उसी के पास यह रेंजे है जिसका सम्बन्ध हो जाता है ! इसी प्रकार अवधि ज्ञान का होता है ! सौधर्म इन्द्र सिंहासन से उठ , जिस दिशा में भगवान् है , उस दिशा की ओर सात पद चलकर नमस्कार करता है ! समीचीन धर्मरूप तीर्थ के प्रवर्तन के लिए उद्यत , शरणागत भव्य जनों की रक्षा करने वाले और अलौकिक नेत्रों से विशिष्ट जिनदेव को नमस्कार हो ! जैसे राष्ट्रपति को राजनंदगांव आना है तो सुरक्षा हेतु यहाँ के कलेक्टर से अनुमति लेना पड़ता है ! ऐसे ही तीर्थंकर भगवान् की रक्षा के लिए देव होते हैं ! इन्द्रिय सुख – सेवन के बाद खेद ही होता है ! वैराग्य का वर्णन करते हुए कहते हैं की न किसी का कोई मित्र है और न धन और शरीर ही स्थाई हैं ! बंधू और बांधव और परिवार यात्रा में मिलने वाले पुरुषों के समान हैं ! धन के कमाने में और कमायें हुए धन के नष्ट हो जाने पर बहुत दुःख होता है ! धन के कारण अन्य जनों से विरोध होता है !

भाग्यसंपदा में भी सार नहीं है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी(दिनांक – 20-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर  जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की सभी जिन्देवों का अभिषेक कल्याणक बड़ी विभूति के साथ मनाया जाता है ! इन्द्र की आज्ञा से कुबेर उनके लिए अंगराग, वस्त्र, भोजन, वाहन, अलंकार आदि सम्पति प्रस्तुत करता है ! मन के अनुकूल क्रीडा करने में चतुर देव कुमारों का परिवार रहता है ! वह चक्र के माध्यम से देव, विद्याधर और राजाओं के समूह को अपने अधीन कर लेते हैं ! काल, महाकाल आदि नौ निधियां उनके राजकोष में उत्पन्न होती हैं ! चक्ररत्न आदि 14 रत्न होते हैं ! प्रत्येक रत्न की एक हज़ार देव रक्षा करते हैं ! 32000 राजाओं के द्वारा उनके पाद पीठ पूजे जाते हैं ! देव कुमार भेटें ले लेकर उनकी सेवा में सदा उपस्थित होते हैं ! वह विचार करते हैं की यह मोह की कैसी महत्ता है की तुरंत संसार समुद्र के दुःख रूपी भवरों  को प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले हम  जैसों को भी आरम्भ और परिग्रह में फसाता है  ! इस भोग सम्पदा में भी सार नहीं है !
पूज्य पुरुषो की पूजा न करना भी स्वार्थ का घोतक  है ! चक्र का मैनेजमेंट यह है की देव भी  सुरक्षा करते हैं ! तीर्थंकर सभी वैभव होने के बाद भी उनमे रचते नहीं है ! हमे बार – बार बोलना पड़ता है निचे चावल नहीं चढ़ाएं क्योंकि चीटियाँ होती है ! लोग पास आने का साधन ढूंढते हैं, पासपोर्ट लेकर आते हैं पास आने को! चौके  में भी आज तक फर्स्ट क्लास फर्स्ट नहीं आये !  एक बार भगवान् के तप कल्याणक की जय तो बोलों ऐसा कहा आचार्य श्री ने !

वैज्ञानिक भी मानते हैं उपवास को श्रेष्ठ ! (दिनांक – 16-7 -2012)

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जैसा साधक मिलना कठिन है इस काल में! वे गर्मी में बहुत दिनों तक कमरे में स्वाध्याय करते थे जहाँ का तापमान 46 डिग्री के आस-पास था और अभी रात में दहलान में खुले में शयन करते हैं कई बार बारिश के कारण ठंडा भी हो जाता है मौसम फिर भी वह खुले में ही रहते हैं वह शाम से सुबह तक एक ही पाटे पर रहते हैं चलते – फिरते नहीं हैं अँधेरे में ! उनके संघ के सभी साधू मौन साधना में रत हैं 02 जुलाई से 02 सितम्बर 2012 तक की मौन साधना गुरु के उपदेश से सभी साधू पालन कर रहे हैं ! मुनि श्री योगसागर जी महाराज चातुर्मास में एक आहार एक उपवास की साधना करते हैं अन्य साधू भी सप्ताह में 1 – 2 उपवास करते हैं ! इस वर्षाकाल में जठ रागनी गंध पड़ जाती है शरीर में बीमारियाँ होती है इसलिए प्रकृति एवं धर्म ग्रंथों के अनुसार उपवास, एकासन करने से शरीर की विकृति समाप्त हो जाती है ! दिगम्बर जैन धर्म के अनुसार साधुओं को उपवास पहले और बाद में 48 घंटे बाद भोजन लेना होता है बीच में कुछ भी खाया पीया नहीं जाता कई लोग जल उपवास भी करते हैं लेकिन एक बार ही जल लेते हैं बार – बार नहीं वैसे भी वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है की अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी इन तिथियों में समुद्र में 5 बार भाठा आते हैं क्योंकि जल की मात्रा बढ जाती है इसी प्रकार हमारे शरीर में भी वर्षाकाल में जल की मात्रा बढ जाती है जिससे बीमारियाँ होती है जो उपवास, एकासन करने से ठीक हो जाती है ! वैज्ञानिकों, डाक्टर ने यह भी सिद्ध किया है उपवास के दिन विशेष रसायन का स्राव होता है मुख में जिससे विशेष एनर्जी मिलती है !


गुरु की सेवा महान कार्य है ! (भगवतीआराधना) (दिनांक – 14-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की गुरु के पीछे इस प्रकार बैठे की अपने हाँथ पैर आदि से गुरु को किसी प्रकार की बाधा न पहुचे ! आगे बैठना हो तो सामने से थोडा हटकर गुरु के वाम भाग में उधतता त्याग कर और अपने मस्तक को थोडा नवाकर बैठे आसन पर गुरु के बैठने पर स्वयं भूमि में  बैठे ! गुरु के नीचे आसन पर सोना जो ऊँचा नहीं हो ऐसे स्थान में सोना , गुरु के नाभि प्रमाण पात्र भूभाग में अपना सिर रहे इस प्रकार सोना ! अपने हाँथ पैर वगरह से गुरु आदि का संघठन न हो इस प्रकार शयन करे, गुरु को बैठना हो तो आसन दान करें पहले जीव को देख ले ! उसे मार्जन (साफ़) करें या गुरु को उपकरण भी दे सकते हैं ! गुरु को पुस्तक आदि भी दे सकते हैं ! गुरु को यदि शीत, ग्रीष्म, आदि की बाधा है तो उन्हें आवास दान की व्यवस्था करें ! गुरु से थोडा हटकर बैठे ! गुरु को शीतलता प्रदान करें सेवा के माध्यम से एवं ठण्ड के समय में हवा से बचाव का प्रबंध करें !


अनुराग को भक्ति कहते हैं ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 13-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की जो तप में अधिक है उनमे और तप में भक्ति और जो अपने से तप में हीन है उनका अपरिभव यह श्रुत के अनुसार आचरण करने वाले साधू की तप विनय है ! मुख की प्रसन्नता से प्रकट होने वाले आंतरिक अनुराग को भक्ति कहते हैं ! जो तप में न्यून है उनका तिरस्कार नहीं करना ! देखने से भगवान् नहीं दीखते आँखे बंद करलो तो दिख जायेंगे रूचि होना चाहिए तभी  दीखते हैं  भगवान्  ! गुरु आदि के प्रवेश करने पर या बाहर जाने पर खड़े होना, वंदना करना, शरीर को नम्र करना, दोनों हांथो को जोड़ना, सिर का नवाना, गुरु के बैठने अथवा  खड़े  होने पर उनके सामने जाना और जब गुरु जाएँ तो उनसे दूर रहते हुए अपने हाँथ पैर को शांत और शरीर को नम्र करके गमन करना और गुरु के साथ जाने पर उनके पीछे अपने शरीर प्रमाण भूमि भाग का अन्तराल देकर गमन करें !

शरीर दुःख का कारण है ! (भगवती आराधना) आचार्य श्री विद्यासागर महारजा जी(दिनांक – 12-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की आत्मा और शरीर के प्रदेश परस्पर मिलने से आयु कर्म के कारण यद्यपि शरीर ठहरा रहता है तथापि शरीर सात धातु रूप होने से अपवित्र है, अनित्य है, नष्ट होने वाला है, दुःख से धारण करने योग्य है, असार है, दुःख का कारण है, इत्यादि दोषों को जानकार “न यह मेरा है न मैं इसका हूँ” ऐसा संकल्प करने वाले के शरीर में आदर का अभाव होने से काय का त्याग घटित होता ही है ! शरीर के विनाश के कारण उपस्थित होने पर भी कायोत्सर्ग करने वाले के विनाश के कारण को दूर करने की इच्छा नहीं होती !

भारत में संस्कृति का पतन हो रहा है ! – आचार्य श्री विद्यासागर जी (दिनांक – 11-7-2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में आयोजित धर्मसभा को सम्भोधित करते हुए दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की दादी माँ ने कहानी कही छोटी – छोटी पर कहानी कहीं लिखी नहीं है ! कुछ युवा बालक उसे समझने का प्रयास करें ऐसी ही जिनवाणी की कहानी है ! उसे समझने का प्रयास करें ! “मन के जीते जीत है और मन के हारे हार है ” याने मन के अन्दर पावर है ! हमारी उर्जा बाहर लग रही है उसे भीतर लगाये ! आज मंत्र का नहीं यन्त्र का उपयोग हो रहा है ! भोतिक विज्ञान से ज्यादा आत्मिक विज्ञान जरुरी है ! शोध करने वाला सहपाठी का इन्तेजार नहीं करता ! पहले विद्याओं के माध्यम से बड़े – बड़े कार्य होते थे !
आचार्य श्री विद्यासागर जी द्वारा रचित विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य “मूकमाटी” के राजकोट गुजरात के विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है ! अहिंसा के क्षेत्र में कार्य करने वाले बसंत मनोरकर औरंगाबाद वालों ने भी आचार्य श्री को श्रीफल भेट किया ! बी.आर.जैन भिलाई ने भी श्रीफल भेट किया ! आचार्य श्री के चंद्रगिरी चातुर्मास की संभावना पूरी नज़र आ रही है !
चंद्रगिरी पर्वत के निचे चंद्रप्रभु की 21 फीट की प्रतिमा का कार्य शुरू हो गया है 7 शिल्पी कार्य कर रहे हैं लगभग 6 महीने में बनने की सम्भावना है ! बिर्जौलिया पाषाण की बनना है प्रतिमा ! आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के बारे में लोगो को भ्रमित किया जा रहा है स्वस्थ्य सम्बन्धी आचार्य श्री पूर्णतया स्वस्थ्य हैं सभी चर्चा पूर्ववत हैं ! आचार्य श्री विद्यासागर जी जैसी साधना देखना दुर्लभ है ! उनका त्याग हिमालय जैसा है !


दंड से उदंडता ठीक होती है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (भगवती आराधना) (दिनांक – 11-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की दंड के माध्यम से उदंडता ठीक हो जाती है ! शुद्धी के प्रावधान हैं प्रतिक्रमण आलोचना ! जो क्षेत्र संयम को हानि पहुचाते हैं अथवा संक्लेश उत्पन्न करते हैं उसका त्याग क्षेत्र प्रत्याख्यान कहलाता है ! घर में महिलाओं के लिए निर्वाह करना पड़ता है कर्त्तव्य निभाने पड़ते हैं !
अपने द्वारा पहले किये गए हिंसा आदि को “हां मैने बुरा किया, हां मैने बुरा संकल्प किया, हिंसा आदि में प्रवर्तन वाला वचन बोला” इस प्रकार स्व और पर विषयक निन्दा के द्वारा दोषयुक्त बतलाते हुए तथा वर्तमान में मै जो  असंयम करता हूँ और पूर्व में जैसा असंयम किया है वैसा मै भविष्य में नहीं करूँगा ऐसा मन में संकल्प करके त्याग करता है ! हिंसा का त्याग कृत, कारित, अनुमोदना से करना चाहिए !

आप क्वांटिटी नहीं क्वालिटी देखें ! आचार्य श्री विद्यासागर महारज जी  (दिनांक – 8-7-2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की इस चातुर्मास की स्थापना का समर्थन इन्द्र भी कर रहे हैं जब वर्षा के साथ यदि धर्म वर्षा भी हो जाए तो ये अच्छा रहेगा ! मुनिराज अहिंसा धर्म के पालन एवं जीव रक्षा के लिए करते हैं चातुर्मास ! आज हम वनों में नहीं रह पाते हैं तो यहाँ स्थापना करना पड़ रहा है ! हमारी स्थापना तो 2 जुलाई 2012 को हो गयी थी श्रावको ने आज कलश स्थापना की है ! आज हमें जल छानने के संस्कार देने चाहिए ! रस्सी , कलशा, छन्ना हमेशा बाहर जाते समय साथ में रखना चाहिए ! आज मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, आदि बड़े – बड़े शहरों में लोग कूये के पानी के द्वारा प्रतिमाओं का पालन कर रहे हैं ! हम विज्ञापन के चक्कर में नहीं पड़ते हमारी तो पत्रिका (प्रवचन) प्रत्येक रविवार को प्रसारित होते हैं ! राजस्थान वाले कहते हैं की आप राजस्थान नहीं आते हो आप अपने बच्चों का दान करें जिन्हें हम मुनि, आर्यिका आदि बना सके ! आज के कलश बड़े बाबा कलश श्री अशोक पाटनी (आर.के.मार्बल), चंद्रप्रभु कलश प्रभात जी मुंबई, चातुर्मास कलश पंकज जैन दिल्ली, स्वाध्याय कलश विनोद कोयला परिवार, जीवदया कलश हनुमान प्रसाद बडजात्या जसपुर आदि ने लिया ! आज महासभा अध्यक्ष निर्मल सेठी दिल्ली से पधारे इस कार्यक्रम में डोंगरगढ़, राजनंदगांव, धमतरी, दुर्गा, भिलाई, आदि से पधारे!


जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण करना है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक -6-7-2012)

वीर शासन जयंती एवं प्रतिभा स्थली के बच्चों ने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम दिखाए !

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की प्रतिभा स्थली के बच्चों ने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम दिखाए शीत, हवा, पौधे, आदि के रूप में मुखोटा लगाकर कार्यक्रम प्रस्तुत किया !
“मै राष्ट्रीय पशु न सही लेकिन राष्ट्रीय संत की गाये हूँ”
“बच्चों ने कहा की आचार्य श्री कहते हैं की मंदिर में लगने वाले पत्थर की चीप बनो चिप नहीं चीफ (मुख्य) है ! प्रतिभा स्थली में लगभग 500 छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रही है ! बच्चों ने अडवांस में राखी भेंट की आचार्य श्री को आज हम महावीर को नहीं देख पा रहे हैं पर हम गुरु के माध्यम से उन्हें जान रहे हैं ! हम इस परंपरा में आये इसलिए वीर प्रभु हमसे दूर नहीं और हम उनसे दूर नहीं! एक – एक क्षण को उपयोग करो और कराओ ! आप लोग नदी बने तालाब नहीं, पानी पर टला लगा दिया जाए उसका नाम तालाब होता है ! हम बहुत सारे तीर्थों से जुड़े हैं चतुर्थ काल से पंचम काल और आगे जब तक तीर्थ नहीं आता है अभी महावीर का शासन काल चल रहा है ! हर व्यक्ति अपने आप को उन्नत बनाना चाहता है ! शारीर के दास नहीं बनो गुणों के साथ शारीर का सम्बन्ध होना चाहिए ! हम वासना के दास नहीं बने ! उत्साह जरुरी है पुरस्कार भी जरुरी है ! उत्साह अलग है प्रेरणा अलग है ! आत्मा की खुराक तो ज्ञानामृत है ! इमली को मुख से निकालो तभी लड्डू का स्वाद आएगा ! इस शरीर को पेट्रोल (भोजन) नाप तौल कर ही दो ! जीवन का निर्वाह नहीं निर्माण करना है ! अच्छे कुम्भकार की तलाश करो ! आप लोगों के लिए बोध बहुत हो गया अब शोध की आवश्यकता है ! आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी का आहार डोंगरगढ़ चंद्रसेना के प्रेसिडेंट सपेम जैन “अमूल” के यहाँ हुआ !


छात्र – छात्राओं को विशेष प्रवचन संसार में सबसे बड़ी बीमारी तनाव है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक -5-7-2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की प्रतिभा स्थली में शिक्षिकाओं को संख्या ज्यादा और छात्राओं की संख्या कम है आप लोग संख्या बढाएं खर्चा ज्यादा हो और काम कम यह ठीक नहीं है ! किसका मन प्रतिभा स्थली में नहीं लग रहा है हाँथ उठायें ! जिनका मन नहीं लग रहा उनका सहयोग करें जिनका मन लग रहा है ! आचार्य श्री ने बच्चों से चर्चा भी की ! जिस प्रकार सब विषयों में नंबर मिलते हैं वैसे ही खेल कूद में भी नंबर आना चाहिए ! सब लोगों की पढाई ठीक चल रही है ? सब पढ़ाते ठीक हैं ? मोक्ष मार्ग में चलते समय गाडी चलती रहती है लेकिन सोना नहीं है ! भगवान् ने गाडी दी है तो हम गंतव्य तक पहुचेंगे ! टेंशन किसको बढती है नंबर कम आने से क्यों बढती है टेंशन ! टेंशन को हिंदी में तनाव कहते हैं ! तन जाते हैं तो तनाव आता है तनाव की परिभाषा, तनाव के कारण क्या है ? यह बीमारी बहुत खतरनाक है ! तनाव में आजायेंगे तो पढाई नहीं होगी ! किसी भी अस्पताल में तनाव का इलाज नहीं है ! डॉक्टर भी तनाव में रह सकते हैं ! किस रास्ते से तनाव आता है उस रास्ते को बंद कर दो !
प्रतिभा स्थली जबलपुर में है इसमें कक्षा १२वी तक की शिक्षा सी.बी.एस.ई. के माध्यम से दी जाती है ! सिर्फ छात्राओं को ही दी जाती है ! लगभग १०० ब्रह्मचारिणी बहने शिक्षिकाएं हैं जो जैन धर्म के संस्कार भी देती हैं और वहां मंदिर के प्रतिदिन दर्शन, रत्रिभोजन त्याग, पाठशाला एवं अन्य संस्कार भी दिए जाते हैं ! संस्कृति, कला, डांस, अन्य चीजे भी सिखाई जाती है जो अन्य स्कूलों में सिखाई जाती हैं ! यह देश का सर्वश्रेष्ठ विद्यालय है जहाँ संस्कार शाला है !


गुरु पूर्णिमा पर विशेष प्रवचन भगवान् का पता देते हैं गुरु ! – आचार्य श्री विद्यासागर महारज जी (दिनांक – 3-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की यह गुरु पूर्णिमा पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है ! आज के गुरु बनाते है लोग और दर्शन करने आते हैं ! पूर्ण चन्द्रमा का दर्शन पूर्णिमा के दिन होता है ! चन्द्रमा पूर्ण कलाएं बिखेरता है ! इस तिथि का विशेष महत्व है ! इस दिन गुरु को शिष्य और शिष्य को गुरु मिले थे ! वीर भगवान् की दिव्य ध्वनि 66 दिन तक नहीं खीरी थी फिर वीर शासन जयंती के दिन खीरी थी, उसी दिन से वीर शासन प्रारंभ हुआ, वीर भगवान् का शासन प्रारंभ हुआ ! कुछ सेल्समेन होते हैं जिनको कमिसन मिलता है ! वह मुनि मेकर होते हैं ! गुरु प्रभु की पहचान बताते हैं पता देते हैं जो राम आतमराम की पहचान बताते हैं ! जो भगवान् का स्वरुप बताते हैं ! जो आत्मा का पता दे वह गुरु होता है ! गुरु का एड्रेस नहीं होता है, विश्वास को साथ लेकर चलो ! अनेक दृष्टान्त भी बताएं !


वर्षायोग स्थापना महत्वपूर्ण है !  – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 2-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की आज हमारी स्थापना हो गयी है ! साधू साधना के लिए ही चातुर्मास करते हैं ! श्रावक 8 जुलाई को कलश की स्थापना करेंगे ! चातुर्मास में बहुत जीव उत्पन्न होते हैं इसलिए साधू एक जगह रहकर साधना करते हैं ! आज आचार्य श्री ने सभी मुनिराजों को मौन की साधना दी है !


भगवान की मुद्रा प्रसन्न है  ! – आचार्य श्री विद्यासागर जी (दिनांक – 1-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की उपवास करते समय मन आकुल – व्याकुल नहीं होना तप है ! भूख  – प्यास की वेदना से आकुल – व्याकुल नहीं होना चाहिए ! रस को त्यागने से शरीर में उत्पन्न हुए संताप को सहना तप है ! मनुष्यों से शून्य स्थान (जंगल आदि) में निवास करते हुए पिशाच, सर्प , मृग, सिह, आदि को देखने से उत्पन्न हुए भय को रोकना तथा परिषय को जीतना चाहिए !

प्रायश्चित करने से उत्पन्न हुए श्रम से मन में संक्लेश न करना “यह जगत जीवों से भरा है  बचाना शक्य नहीं है फिर भी जानबूझकर हिंसा से बचना ही धर्म है ! प्रसन्न मुद्रा भगवान् की मुद्रा मानी जाती है ! मन तो भोजन की ओर जाता है लेकिन संकल्प है की लेना नहीं है, यह महत्वपूर्ण है ! “समयसार” का उपयोग तो करो कब करोगे ! केवल पेट्रोल डालना है भाडा देना है शरीर को और चलाना है, उसके दास नहीं बनना है ! भगवान के पुण्य से जन्म के समय सभी वस्तुएं दिव्य आती हैं भोजन, वस्त्र आदि ! अपनी शक्ति का सदुपयोग करो यह हमें अच्छा लगता है
“सब जग देखो छान, छान नहीं पाये तो पहचान नहीं पायें” ! आत्मा को श्रद्धा की आँखों से देखा जाता है ! आज के वैज्ञानिक और डाक्टर भूत-प्रेत आदि नहीं मानते हैं क्योंकि वह M.R.I., C.T. स्केन, एक्सरे आदि मशीन  में नहीं आता है ! आज भले डाक्टर M.B.B.S., M.D.   हो जाएँ फिर भी नहीं जान पाते हैं भूतों को !

भाव को नहीं छोड़े ! – आचार्य श्री विद्यासागर जी (दिनांक – 24 -06 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने दीक्षा दिवस के अवसर पर धर्म सभा को सम्भोधित करते हुए कहा की आज रविवार है और भी कुछ है (दीक्षा दिवस ) लेकिन अतीत की स्मृति के लिए आचार्य कुंद – कुंद कहते हैं की याद रखना है तोह दीक्षा तिथि को याद रखो जिस समय दीक्षा ली थी उस समय क्या भाव थे उन्ही को याद करो ! काल निकल जाता है पर स्मृति के द्वारा ताज़ा बनाया जा सकता है ! उस समय की अनुभूति और अभी की अनुभूति में अंतर दीखता है ! हमारे भाव कितने वजनदार हैं देखना है ! भावों की उन्नति होना चाहिए ! जो गिरता है वो जल्दी उठता भी है और संभालता भी है ! आप दान, परोपकार आदि के भावों को याद रखो ! आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज जी को याद भी किया और कहा की वह महान थे ! आत्मा की कोई उम्र नहीं होती भावों की उम्र होती है, अनुभूति भावों की होती है ! गुरुदेव का उत्तर हमारे लिए अनुत्तर बन बन गया था ! भावो को नापो ज़िन्दगी क्या है ! द्रव्य की जगह भाव को याद करने की हमें वह योग्य बनाया गुरुदेव ने, हम गुरुदेव को प्रणाम करते हैं ! आचार्य श्री विद्यासागर जी रविवार होने के कारण दीक्षा दिवस पर, मंच पर आये ऐसा बहुत दिनों बाद हुआ है ! चातुर्मास कमिटी का भी गठन हुआ अध्यक्ष श्री सिंघई विनोद कोयला वाले बिलासपुर कार्यकारी अध्यक्ष जय श्री आईल मिल दुर्ग , संरक्षक श्री राजेंद्र विधायक गोंदिया को बनाया गया !


मधुर वचन होते हैं प्रभु के ! (दिनांक – 17 -06 -2012)

चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बराचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज धर्म सभा को सम्भोधित करते  हुए कहा की  आज रविवार है, रवि तो प्रतिदिन आता है और जाता है ! आचार्य श्री ने गजकुमार का दृष्ठांत देते हुए वैराग्य मय दास्ता सुनाई भगवान् नेमिनाथ के प्रसंग  भी   सुनाये  और  कहा  मधुर  वचन  होते  हैं प्रभु के ! कीचड़ में पैर रखकर पानी से धोने की अपेक्षा कीचड़ से बचकर पैर रखना ठीक है ! अज्ञानी हो तो ठीक है पर ज्ञानी होने पर भी यदि पैर रखे तो ठीक नहीं ! कषायों का कीचड़ उछलता है उसे धोने की आवशयकता है ! सूत्र अनेक अर्थ को पेट में रखे रहते हैं ! अखबार में खबर आती है नोट के बारे में लेकिन नोटों का भोजन नहीं किया जा सकता है ! आचार्य श्री का द्वितीय बार चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में 2012 का चातुर्मास 02 जुलाई को स्थापित होगा, कलश स्थापना की संभावना 01 जुलाई 2012 की है ! वैसे ज्ञात हो आचार्य श्री पहले से नहीं बताते हैं !
आचार्य श्री का दीक्षा दिवस रविवार २४ जून २०१२ को पूरे भारत में धूम – धाम से मनाया जाएगा तयारियां जारी हैं ! मुनि श्री सुधासागर जी महाराज का चातुर्मास कटनी या ललितपुर में होने की संभावना नज़र आ रही है !

सोचना भी भटकन है ! – आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज (दिनांक – 03 -06 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में आयोजित प्रवचन सभा को सम्भोधित करते हुए दिगम्बराचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा की जब उपसर्ग आता है तो साधू जब ताल नहीं पाते तब संलेखना ले लेते हैं ! भयंकर दुर्भिक्ष हो, भयंकर जंगल में भटक गया हो तो भी संलेखना लेते हैं ! चाहे विज्ञान हो चाहे वीतराग विज्ञान हो दोनों ही बताते हैं की गलत आहार भी प्राणों को संकट पैदा करता है ! दुर्भिक्ष पड़ने पर साधू आहार का त्याग कर देते हैं ! जो ज्यादा सोचता  है वह जंगल में भटक जाता है, आज विज्ञान भी भटक रहा है ! वर्मुला ट्रगल में भटक जाते हैं ! बहुत सारे वज्ञानिक फस गए और बाहर नहीं निकले !
हम तो प्रत्येक व्यक्ति को स्वर्गवासी कहते हैं क्योंकि हमारी भावना नरक भेजने की नहीं है ! कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं हैं जहाँ विश्वास काम नहीं करता हो “अनुभव करो विश्वास करो ” किसी ने विष को चखा नहीं है फिर भी विश्वास है की इससे मरण हो जाता है ! विश्वसनीय के ऊपर ही विश्वास किया जाता है ! जब कोई संकट आता है तो साधू उस समय आहार का त्याग कर देते हैं की जब तक यह संकट दूर नहीं हो जाता है तब तक आहार का त्याग है ! बहुत सारा धन और समय का अपव्यय हो रहा है आज ! मोबाइल पर भी व्यक्ति झूट बोलता है, बोलता देहरी से है और कहता है देहली से बोल रहा हूँ !
आज प्रतिभा, समय, धन व्यर्थ में जा रहा है, उपयोग नहीं हो रहा है ! एक छात्र वैज्ञानिक के भाषा में बात करने लगा था ! यह कुछ वर्ष पूर्व हमने पढ़ा था यह लेख और यह विस्मय जैसा  लगा ! जैन दर्शन में दूरस्रावी आदि पहले से लेख है !
विदर्भ जैन न्यूज़ द्वारा प्रकाशित रामटेक पंचकल्याणक स्मारिका का विमोचन आर.के. मरबले पाटनी के द्वारा किया गया ! इस इस्मारिका में पंचकल्याणक एवं गुरु शिष्य मिलन आचर्य श्री विद्यासागर जी  से मुनि श्री सुधासागर जी के मिलन के बहुत सारे फोटो हैं ! चंद्रगिरी कमिटी ने आचार्य श्री विद्यासागर जी से चातुर्मास का निवेदन किया !
विदर्भ जैन न्यूज़ के संपादक अनिश जैन नागपुर मोबाइल 09420569115  से स्मारिका प्राप्त कर सकते हैं !

One Response to “रविवारीय प्रवचन (आचार्य श्री) [3-6-2012 – 22-7-2012]”

Comments (1)
  1. Jai jai gurudev

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