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रविवारीय प्रवचन (आचार्य श्री) [23-7-2012 – 3-8-2012]

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माँ,डाक्टर, वकील , गुरु को बतायें ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 3-8 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की आज विज्ञान ब्रह्माण्ड की खोज कर रहा है | हर बात में विस्फोट करता है | कई लोगो ने समर्थन भी दिया है | पृथ्वी की रचना भगवान् ने कैसे की है यह खोज की है 27 किलोमीटर की सुरंग में की है खोज लेकिन हमें तो नहीं लगता है की यह ठीक है | योग्य का ग्रहण ही अयोग्य को त्याग है | थेओरी तो ज्यादा पढते हैं लेकिन प्रेक्टिकल (प्रयोग) नहीं करते हैं | रोटी में नज़र न लग जाये इसलिए काले धब्बे हैं ऐसा एक व्यक्ति ने कहा अपनी बात छुपाने के लिए कहा की तिल जैसा है | प्रयोग के अभाव में आस्था का विकास नहीं हो पा रहा है | “मूकमाटी” की बाते कई लोगों को अच्छी लग रही है | अपने किये हुए दोषों की आलोचना अपने गुरु के सामने करना चाहिये | एक व्यक्ति ने कहा था की माँ,डाक्टर, वकील , गुरु को अपनी बात सही नहीं बताओगे तो आपकी समस्या का हल नहीं होगा , उपचारक भी ठीक होना चाहिये | अनंत बार अकाल मरण हुआ है जीवों का | माया और झूट सगी सहेली है, एक – दूसरे के समकक्ष रहती है | सिंथेटिक दूध से लीवर, दिल आदि के रोग होते हैं, यह मायाचार है | आज फास्ट लाइफ, फास्ट फ़ूड, फास्ट डेथ का जीवन चल रहा है |


भाव नगर में जहाज तोड़ते है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 2-8 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की शरीर का त्याग करना सुख, शांति की प्राप्ति का कारण है ! उसके तीव्र वेदना होने पर जीवन की आशा नष्ट हो जाती है ! मुक्ति को खोजने वाला साधू परिग्रह को मन, वचन, काय से त्याग कर देता है ! गाडी में पेट्रोल सप्लाई बंद कर दो तो सब ठीक हो जाता है ! हांथी को भी जब मद आता है तो तीन उपवास करवा देते हैं तो ठीक हो जाता है ! जैसे परीक्षा देना कठिन है ऐसे ही संलेखना कठिन है ! अच्छे – अच्छे घबडा जाते हैं ! कितने भी हार्स पावर की मशीन हो चढ़ाव पर सभी परेशान कर देती है ! ढलान पर बिना पेट्रोल के भी गाडी चलती है ! पंचंम काल में भाव में कमी आ रही है ! आयु, शरीर की क्षमता आदि कम होती जा रही है ! 400 -500 वर्ष पुराने प्रासाद का मटेरिअल मजबूत होता था और आज इतना मजबूत नहीं है ! पुराने तजुर्बों की हड्डी मजबूत होती थी ! कहते थे की “यह पुराना घी है “! शरीर के प्रति लगाओ कितना है उसके अनुसार ही कर्मों की निर्जरा होती है ! जिनका जीवन सुख पूर्वक, विलासिता पूर्वक व्यतीत होता है उनको शरीर छोड़ते समय परेशानी ज्यादा होती है इसलिए सहन करना चाहिए ! शरीर के आश्रित रत्नत्रय सुरक्षित रहे इसको ध्यान में रखकर संलेखना लेते हैं! पुराने वस्त्र भी छुटते नहीं है ! भाव नगर में जहाज रात में तोड़ते हैं क्योंकि मोह रहता है परिग्रह से मोह होता है तो छूटता नहीं है !


रक्षाबंधन पर्व मनाया गया ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 2-8 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की ज्ञात हो –

दिगम्बर जैन धर्म के अनुसार रक्षाबंधन के दिन 700 मुनिराजों का उपसर्ग (विघ्न) दूर हुआ था | विष्णु कुमार मुनि ने रिद्धियों के द्वारा किया था उसी की ख़ुशी में यह पर्व मनाया जाता है | आज के दिन मंदिर में पैसा दान करके राखी लेकर बांधते हैं और भाई की कलाई पर बहिन राखी बांधती है | आज के दिन चन्द्रगिरि में प्रतिभा स्थली की ब्रह्मचारिणी बहिने एवं छात्राओं ने आचार्य श्री के शास्त्रों की चौकी पर भी राखी बाँधी यह पर्व “वात्सल्य पर्व” के रूप में मनाया गया | सभी लोगो ने अलग – अलग तरह की राखी प्रदर्शित की | आचार्य श्री ने कहा की मित्र, शत्रु, लाभ, अलाभ, कांच, कनक में समता रखना साधू का गुण है | विष्णु कुमार मुनि की कथा का दृष्ठांत देते हुए कहा की वीतरागी संत प्रतिकार नहीं करते हैं सहन करते हैं !


शब्द की यात्रा तीन लोक तक होती है !- आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 1-8 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की उचित स्मृति रहती है तो विषयांतर नहीं होता है ! यह समझ भी आ जाता है की ठोस ज्ञान कितना है ! आप कई पृष्ठ पढ़ लो लेकिन उपयोग में नहीं आया तो क्या मतलब ! प्रतिभा संपन्न विद्यार्थी हमेशा परीक्षा को लेकर अलर्ट रहता है ! खूब लिखने से भी कुछ नहीं होता सही लिखोगे तो ही नंबर मिलेंगे ! शब्द जो आप बोलते हैं तीन लोक तक जाता है ! नदी कभी घर तक नहीं आती हमें जाना पड़ता है ! लोग कहते हैं नल आ गया पर नल तो वहीं रहता है ! आज लोग चाहते हैं की हमारे मुख में बटन दबाते ही पाने आ जाए ! आचार्य ज्ञान, दर्शन और चारित्र में विशुद्ध होना चाहिए ! जैसे वस्त्र आदि से बनी पताका जय को प्रकट करती है ! वैसे ही आराधना भी संसार में विमुक्ति को प्रकट करती है ! जिसका जीवन वर्गीकृत नहीं है वह निश्चित फेल होगा ! किसी कार्य को करने से पहले कर्मठता जरुरी है !


इंटरव्ह्यु में क्रीम बच जाती है ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 31-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की आयु के थोडा रह जाने पर आहार ग्रहण करने पर भी शरीर नहीं ठहरता! एक बार श्रधा के नष्ट हो जाने पर उसका पुनह प्राप्त होना दुर्लभ है ! तप में दोष लगने पर बहुत निर्जरा नहीं हो सकती ! बड़ा धंधा करने में जैसे बड़ी पूंजी लगती हैं उसी प्रकार संलेखना में पूरी शक्ति लगानी पड़ती है ! प्रशासन सम्बन्धी परीक्षाओं में संकेत दिया जाता है की तयारी करें और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में बैठते हैं लेकिन उसमे से लगभग 10 प्रतिशत (10000 ) को ही सेलेक्ट किया जाता है, उसमे से भी कई छट जाते हैं और इंटरव्ह्यु में क्रीम बच जाती है ! यह उदहारण है, ऐसे ही संलेखना में होता है, इसको मामूली नहीं समझों, इसमें सुप्प्लिमेंट्री ही नहीं फेल हो जाते हैं ! पेट भरने के बाद कई लोग त्याग करते हैं भोजन ! यहाँ प्रसंग चारो प्रकार के आहार का आजीवन नियम का चल रहा है ! उन मुनिराज के पास दूर – दूर से दर्शन करने आते हैं लोग ! जैसे विद्यार्थी को परीक्षा का ध्यान रहता है ऐसे ही व्रती को संलेखना स्मृति में रहना चाहिए ! जीवन में कभी भी कोई घटना, दुर्घटना हो सकती है ! मरण को मांगलिक समझें, मरण भी उत्साहपूर्वक होना चाहिए ! संकल्प का महत्त्व होता है ! यहाँ वेलकम नहीं वेलगो होता है !


डायमंड की भांति है धर्म ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 30-7 -2012)

चन्द्रगिरि डोंगरगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की वचनों की प्रमाणिकता वक्ता की प्रमाणता से आती है ! आचार्य श्री जी ने अनेक दृष्ठांत देते हुए समझाया की जब तैरना सीखते हैं तो लकड़ी का सहारा लेते हैं ! इसी प्रकार मोक्ष मार्ग में कई चीजों का सहारा लेना पड़ता है ! अपने किये हुए अनर्थों पर रोने से अन्दर ही अन्दर जलने से, पश्चाताप करने से पाप कम होते हैं ! यह धर्म हीरे ( डायमंड )  की भांति है उसे अच्छे ढंग से पालन करो ! आत्मा की अनुभूति श्रधान के माध्यम से होती है ! जितना आप कल के विषय में सोचते  हैं उतना आप आज के विषय में नहीं सोचते हैं ! इस अज्ञान से छुटकारा मिल जाए तो सारे संघर्ष छूट जाते हैं ! मुक्ति आती नहीं है हमें जाना है मुक्ति के पास !

हमारे पास पूरा मसाला है बस पुरुषार्थ करना बाकी है ! प्रभु के गुणानुवाद से हमारी सारी वक्ता बढ जाती है ! अज्ञानी कभी रोता नहीं, रोता है तो स्वार्थ के लिए ! सम्यग्ज्ञानी इसलिए रोता है कि मेरा इतना काल अज्ञान में निकल गया ! बुरे को बुरा समझाना ही सम्यग्ज्ञान है ! आत्म तत्त्व का उपभोग कीजिये ! यदि उपभोग नहीं हो रहा हो तो विश्वास कीजिये ! इतनी बारिश में भी आप आयें हैं आपके विश्वास की सराहना करते हैं हम, इसी प्रकार धर्म लाभ लेते रहें !

ड्रेस और एड्रेस अलग – अलग होते हैं !   – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 28-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन  आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने कहा की गुरुओं के सन्मुख आलोचना करके अपने व्रतों की अच्छी तरह विशुधि  करते हैं ! संयम के लिए पिच्छी ग्रहण करते हैं ! शरीर से ममत्व छोड़कर चार प्रकार के उपसर्ग को सहते हैं ! दृढ धैर्यशाली तथा निरंतर ध्यान में चित्त लगते हैं ! जैसे कक्षा में छात्र पास होते जाते हैं तो निकलते जाते हैं और छात्रों का प्रवेश होता रहता है, ऐसा ही संघ में होता है ! उच्च साधना के लिए अलग व्यवस्था होती है, जैसी व्यवस्था अस्पताल में होती है वैसी यहाँ होती है ! यहाँ गंभीरता आनी चाहिए समझना चाहिए प्रत्येक बात को !
ड्रेस और एड्रेस अलग होते हैं! कोर्स में कमी रखोगे तो हम कुछ नहीं सिखा सकेंगे ! जैसे मिलिटरी आदि में थोडा भोजन दिया जाता है, ऐसे ही साधू भी कभी – कभी थोडा भोजन लेते  हैं ! णमोकार मंत्र भी अंतिम समय याद रह गया तो समझो सौभाग्य है ! जो परीक्षा देने वाला होता है वह इधर – उधर की बातें नहीं करता अतिपरिचय करने से अवज्ञा होती है !
विशेष – चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन  आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी  के संघस्थ शिष्य मुनि श्री दुर्लभ  सागर महाराज जी 50 घंटे एवं मुनि श्री आनंद सागर महाराज जी 38 घंटे ध्यान में बैठे 24 /07 /2012 से 26 /07 /2012 तक do उपवास  अर्थात  72 घंटे बाद  आहार  लिया  पद्मासन  मुद्रा  में बैठे रहे  !

एक दिन में इंजिनियर नहीं बनते ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 26-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान दिगम्बर जैन आचार्य श्री  विद्यासागर महाराज जी  ने कहा की किसने कहा हम गृहस्थों को दीक्षा नहीं देते, देखकर दे सकते हैं ! ३० वर्ष दीक्षा का समय लिखा है क्योंति ३० वर्ष तक ऊंचाई शरीर में वृद्धि होती है ! एक दिन में ही इंजिनियर बनता है क्या कोई ? कई – कई एक्साम देने के बाद बनते हैं ! आज कालेजों की भरमार हो गयी है !
उन मुनिराजों को विक्रिया – चारण और क्षीरा – स्रवित्व आदि रिधियाँ उत्पन्न होती है किन्तु राग का अभाव होने से उनका प्रयोग नहीं करते ! थोड़ी सी साधना होने के बाद चमत्कार होने लगते हैं lekin उससे प्रभावित नहीं होंगे तो शक्तियां बढेगी और प्रयोग करेंगे तो वह समाप्त हो जाती है ! पहले वैद्य दवाओं के बारे में सीखते थे और सेवा करते थे और रोगी दान देते थे, औषधि दान के रूप में वह वैद्य हाँथ नहीं लगाते थे ! एलोपेथिक में यही गड़बड़ी  हो रही है बड़े – बड़े लोग भी यह मेडिकल कालेज खोल रहे हैं ! लाखों रुपयों में एम.बी.बी.एस. होती है ! भावों में कलुषता नहीं होनी चाहिए ! पहले भारत को ऋषि, साधक, संत उपदेश के माध्यम से चलाते थे !
पार्शवनाथ मोक्ष कल्याणक निर्वाण दिवस मनाया गया :-
आज यह महावीर भगवान् से पूर्व पार्शवनाथ के निर्वाण कल्याणक को सूचित करने वाला दिन है यह एक ऐसी परम्परा है जिसको किसी ने रोका नहीं यह धारा निरंतर बहती रहती है ! यह धारा वीतराग धारा है जो टूट नहीं सकती अपनी मंजिल तक पहुचकर विश्राम पा लेती है ! विकृति का मिटना ही संस्कृति है ! नीर के मंथन से नवनीत की प्राप्ति नहीं होती है ! आत्मा मरती नहीं यह किसी को ज्ञात नहीं है ! सब लोग धन के चक्कर में पड़ गए हैं इसलिए आत्मा को भूल गए हैं ! आत्मा की उपलब्धि भू-शयन वालों को ही हुई है ! राम-राम रटने से कुछ नहीं होता है राम जैसा काम करो ! आत्मराम का चिंतन करो ! इसके पहले अनंत प्रभु हो चुके हैं, यह धारा टूटी नहीं है ! अब  नींद की धारा को तोडना है वह है मोह की नींद ! माया के कारण उठ नहीं पा रहा है व्यक्ति ! धन के पीछे पड़ोगे तो दिमाग खराब होगा ! सोना ज्यादा रखने से पीलिया हो जाता है !

मिलट्री जैसी होती है मुनि चर्या ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 25-7 -2012)

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी कहते है की अपना हित करना चाहिए, यदि शक्ति हो तो पर का हित भी करना चाहिए, किन्तु आत्महित और पर हित में से आत्महित अच्छे प्रकार से करना चाहिए ! प्राणी संयम को पालने के लिए और जिनदेव का प्रतिरूप रखने के लिए पिच्छि (मोर पंख की बनी) रखते हैं ! शरीर का संस्कार नहीं करते, धैर्य बल से हीन नहीं होते ! रोग से या चोट आदि से उत्पन्न हुई वेदना का प्रतिकार नहीं करते, मौन के नियम का पालन करते हैं, यह होती है मुनि की साधना ! आचार्य श्री ने कहा हमारी आई साईट ठीक है ! जैसे डाक्टर लोग इलाज करते समय बोलते नहीं है कार्य में लगे रहते हैं ! जैसे पेपर में इधर – उधर नहीं देखते हैं बच्चे परीक्षा के समय ऐसा ही मुनि चर्या में होता है ! यहाँ मिलिट्री जैसा शासन चलता है !
आज दीक्षा दिवस में मुनियों द्वारा दिए गए प्रवचन इस प्रकार हैं –
मुनि भावसागर जी – मुनि भावसागर जी ने कहा की आचार्य श्री विद्यासागर जी सर्वश्रेष्ठ आचार्य हैं वह छत्तीसगढ़ की भूमि पर दूसरी बार प्रवास कर रहे हैं ! मुनि श्री समयसागर जी स्वाध्याय, साधना में लीन रहते हैं ! मुनि श्री योगसागर जी एक उपवास एक आहार करते हैं एवं सभी साधुओं को वात्सल्य देते हैं ! मुनि श्री अनंत सागर जी को भी याद किया ! मै करूँगा, करूँगा, करूँगा यह चिंतन करता रहता है लेकिन यह भूल जाता है की मैं मरूँगा, मरूँगा, मरूँगा, यह मुनि मार्ग मोक्ष प्राप्त करने का साधन है ! जन्म, जरा और मृत्यु से छुटकारा पाने का साधन है ! आचार्य श्री विद्यासागर जी जैसे चतुर्थकाल में अतुलनीय साधक हैं ! आचार्य श्री विद्यासागर जी की चर्या स्वयं में चमत्कार और अतिशय से कम नहीं है ! दीक्षा, आचार्य श्री, जिनशासन की अनेक बातें बताई ! इस अवसर पर हम मुनि श्री विराट्सागर जी, विशद सागर जी, अतुल्सागर जी, को भी याद करते है !
मुनि श्री शैल सागर जी – मुनि श्री शैल सागर जी ने कहा की मुनि श्री भावसागर जी ने मंगलाचरण में कहा की काया में कितना रहना इसी प्रसंग को लेकर हम प्रारंभ करते हैं ! एक माटी का टीला है और एक पूजक का दृष्टान्त दिया ! आचार्य महाराज बहुत सरल हैं ! आचार्य श्री को संघ का अनुशासन बनाने के लिए कठिन होना पड़ता है ! जब भी मरण हो, अंतिम समय आचार्य श्री जी के चरणों में निकले !
मुनि श्री विनम्र सागर जी – मुनि श्री विनम्र सागर जी ने कहा की मुनि श्री भावसागर जी ने कहा की कई लोग आचार्य श्री से तुलना करते हैं लेकिन आचार्य श्री तुला हैं, उनसे किसी की तुलना नहीं हो सकती ! आचार्य श्री कहते हैं की काल थोडा है जल्दी कल्याण करो ! एक दृष्टान्त देते हुए कहा की जन्म और मृत्यु को जितने वाली विद्या सीखना है ! आचार्य महाराज हमारे एक – एक श्वास के आराध्य हैं हमें उनकी तुला में तुलने का मौका मिला, उनके दर्शन देवताओं को भी दुर्लभ है ! आचार्य श्री ने कहा था एक विद्वान् से की यह हमारी नाव में बैठे हैं निश्चिन्त पार होंगे !
मुनि श्री धीर सागर जी – मुनि श्री धीर सागर जी ने माँ जिनवाणी को नमन करते हुए कहा की शारदे मुझे सार दे ! आचार्य श्री जी की हर चर्या निराली है हम भावना करें की वह आगामी तीर्थंकर बने ! उनका गुणगान हरपल दिल की धडकनों में हुआ करता है ! वाणी वीणा का कार्य करे वाण का नहीं ! भक्ति में हो शक्ति इतनी की कर्म पिघल जाएँ ! आचार्य श्री कोहिनूर से भी कीमती रत्नों का दान करते हैं !
मुनि श्री वीर सागर जी – मुनि श्री वीर सागर जी ने कहा की मुनि भावसागर जी, मुनि श्री विनम्र सागर जी ने गुरु जी के बारे में बहुत सी बातें बताई है ! गुरु जी में बहुत सी विशेषताएं हैं प्रत्येक जीव उनके आगे – पीछे रहना चाहते है ! उनके बहुत अच्छे चारित्र , आचरण है ! गुरु का ऐसा आकर्षण होता है, जिसे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं ! सुबह आचार्य श्री ने सूत्र दिए थे , उन्होंने कहा था की समीचीन दृष्ठि बनाना ! व्यक्ति भौतिक सुख को सभी कुछ मानता है ! मनुष्य एक दीपक की तरह है जिसमे दीपक भी है और ज्योति भी है !
मुनि श्री योगसागर जी – मुनि श्री योगसागर जी ने कहा की आचार्य श्री ने पांच मुनिराजों को बोलने (प्रवचन) के लिए कहा था, अब समय हो गया है ! मैं समय का और आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहता हूँ और जिनवानी की स्तुति की !

बहुत रोचक वर्णन है भगवान् का ! – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (दिनांक – 23-7 -2012)

प्रभु का जन्मोत्सव लोक रूपी घर में छिपे हुए अन्धकार के फैलाव को दूर करने में तत्पर होता है ! अमृतपान की तरह समस्त प्राणियों को आरोग्य देने वाला है ! प्रिय वचन की तरह प्रसन्न करता है ! पुण्य कर्म की तरह अगणित पुण्य को देने वाला है ! प्रभु का जन्म होता है तो तहलका मच जाता है तीनो लोको में ! निरंतर बजने वाली मंगल भेरी और वाद्यों की ध्वनि से समस्त भुवन भर जाता है ! भगवान् के जन्म के समय इन्द्र का सिंहासन कम्पायमान हो जाता है ! भेरी के शब्द को सुनकर इन्द्रादि प्रमुख सब देवगण एकत्र हो जाते हैं ! जन्माभिषेक के समय जिन बालक को लाने के लिए आई हुई इन्द्राणी के नूपुरों के शब्द से चकित हुई हंसी के विलास से राजमंदिर का आँगन शोभित होता है ! ऐरावत हांथी से उतरकर इन्द्र अपनी वज्रमयी भुजाएं फैला देता है ! गमन करते समय बजाये जाने वाले अनेक नगारों का गंभीर शब्द होता है ! इन्द्रों का समूह अपूर्ण चन्द्रमा की किरणों के समान शुभ चमरों को दक्षतापूर्वक ढोरता है ! इन्द्रानियाँ जिन बालक का मुख देखने के लिए उत्कंठित होती है ! श्वेत छत्र रूपी मेघों की घटाओं से आकाश ढक जाता है ! पताकाएं बिजली की तरह प्रतीत होती है ! इन्द्रनील्मय सीढियों की तरह देव सेना गमन करती है ! दिनांक – 24 /07 /2012 को 25 मुनिराजों का दीक्षा दिवस चन्द्रगिरि में मनाया जाएगा एवं 25 /07 /2012 को पार्शवनाथ भगवान् का निर्वाण महोत्सव (निर्वाण लाडू ) दिवस चन्द्रगिरि में बड़ी धूम – धाम से मनाया जाएगा |

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