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णमोकार मन्त्र

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श्रीमती सुशीला पाटनी
आर.के. हाऊस,
मदनगंज- किशनगढ़ (राज.)

क्र…… पद…………………………अक्षर…………मात्रा…………स्वर……………व्यंजन
1. ……णमो अरिहंताणं …………..7………….11…………..6……………….6
2. ……णमो सिद्धाण………..………5………….9……………5…..……..…..5
3. ……णमो आइरियाणं ….………7….………..11…………..7…..…………5
4.……णमो उवज्झायाणं….………7….………..12..……….7…….……….6
5. ……णमो लोए सव्वसाहूणं…….9….………..15….……..9……………..8
योग___________________ 35_________58______34________30

यह मंत्र प्राकृत भाषा में है और इसकी रचना आर्या छन्द में है। इस मंत्र के अंतिम पद में लोए और सव्व शब्दों का उपयोग हुआ है। ये शब्द अन्त्यदीपक है। अन्त्य का अर्थ अन्त में और दीपक का अर्थ प्रकाशित करना होता है। जिस प्रकार दीपक को जोड़कर अन्य वस्तुओं के अन्त में रख देने से वह दीपक पूर्व में रखी सभी वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार यहां भी समझना चाहिऐ अर्थात इन शब्दों को सम्पूर्ण क्षेत्र में रहने वाले त्रिकालवर्ती अरहन्त आदि देवताओं को नमस्कार करने के लिये उन्हें प्रत्येक पद के साथ जोड़ लेना चाहिये। इस प्रकार इस मंत्र का अर्थ निम्नानुसार होता है-

लोक में सब अरहन्तों को नमस्कार हो।
लोक में सब सिद्धों को नमस्कार हो।
लोक में सब आचार्यों को नमस्कार हो।
लोक में सब उपाध्यायों को नमस्कार हो।
लोक में सब साधुओं को नमस्कार हो।

णमोकार मंत्र को किसी भी अवस्था में कहीं भी पढ़ा जा सकता है क्योंकि यह मंगलकारक है और सभी मंगलों में प्रथम मंगल है। फिर भी प्रात: जागते ही, रात्रि को सोने से पूर्व तथा मनिदर जी में इसका पठनस्मरण अवश्य करना चाहिये। श्रावक की दिनचर्या में सबसे पहला कर्तव्य नमस्कार मंत्र का स्मरण करना बतलाया है-
ब्रहमे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत परमेषिठ स्तुतिं पठनं
अर्थात प्रात: ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर परम मंगल के लिये नमस्कार मंत्र का स्मरण करें।

नमन का वास्तविक भाव –
केवल नमस्कार मंत्र को बोलना अथवा नमस्कार करना सही अर्थों में नमन नहीं है। पांचों परमेष्ठियों के स्वरूप को समझकर उनके गुण चिन्तन करते हुये मन में जो समर्पण भाव उत्पन्न होता है वही वास्तविक नमन है। श्रद्धा इस मंत्र का मूल प्रवाह है। यह मंत्र णमो से शुरु होता है और णमो अहंकार का विसर्जन है। जो व्यक्ति नमस्कार करता है, समर्पण भाव रखता है, उसके अहंकार को कोई स्थान नहीं रहता है।

जो भी शब्द हम बोलते हैं उससे वातावरण में प्रकम्पन पैदा होता है और उसकी तरंगें हमें बहुत प्रभावित करती हैं। अत: साधक को मंत्र के शब्दों का सही चयन, अर्थ का बोध, शुद्ध उच्चारण और श्रद्धा भावना का योग करना होता है, तभी मंत्र का तदनुसार प्रकम्पन प्रभावशाली और लाभदायक होता है। नमस्कार मंत्र ऐसा मंत्र है जिसमें शब्दों का शकितशाली चयन है। इस मंत्र का निश्चित ध्वनि से एकाग्रतापूर्वक जप करने से यह अधिक प्रभावशाली हो सकता है और इसके चिन्तन से आत्मशुद्धि होती है। अत: इसका शुद्ध उच्चारण अपरिहार्य है।

अरिहन्त को पहले नमस्कार क्यों ?
इस मंत्र में सर्वप्रथम अरिहन्त को नमस्कार किया गया है जबकि पंच परमेष्ठी में सबसे ऊंचा स्थान सिद्धों का है। इसका कारण यह है कि संसार सागर को पार करने का दिव्य उपदेश जीवों को अरहन्त द्वारा ही दिया जाता है, सिद्धों द्वारा नहीं। चूंकि अरहन्त की कृपा से ही हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है और जग का कल्याण होता है, अत: उनके उपकार के अनुरूप सर्वप्रथम अरहन्त को नमस्कार करना युक्तिसंगत है। इसके अतिरिक्त परमात्मा की दो अवस्थाऐं होती हैं – अरहन्त और सिद्ध। अत: पहली अवस्था को पूर्व में और दूसरी अवस्था को बाद में नमस्कार किया गया है।

णमोकार मंत्र का शुद्ध रूप –
इस मंत्र के लिखने व बोलने में विभिन्न रूप प्रचलित हैं –
1. अरहन्त के साथ अरिहन्त का उपयोग प्राय: पाया जाता है। कहीं कहीं पर अरूहन्त का उपयोग भी किया गया है। अरहन्त का अर्थ देवों द्वारा पूज्य होता है, अरिहन्त का अर्थ शत्रु (कर्म या मोहरूपी शत्रु) का हनन करने वाला होता है और अरूहन्त का अर्थ संसाररूपी वृक्ष के बीज को दग्ध करने वाला होता है।
2. आइरियाणं के साथ-साथ आयरियाणं अथवा आइरीयाणं भी उपयोग में लिया जाता है।
3. चौथे पद में उवज्झायाणं तथा पांचवें पद में सव्व में व अक्षर के स्थान पर ब अक्षर का उपयोग किया जाता है।
4. णमो के स्थान पर नमो का उपयोग किया जाता है।
इस मंत्र का जो शुद्ध मूल पाठ है वही ऊपर दिया गया है और इस मूल पाठ का ही अनुसरण किया जाना अपेक्षित है।

अरिहन्त या अरहन्त –
णमोकार मन्त्र में वर्तमान में दोनों शब्दों (अरहन्त व अरिहन्त) का प्रचलन है। यह विचारणीय है कि इन दोनों शब्दों में से किसे अधिक शुद्ध माना जावे। इस हेतु निम्न बिन्दुओं पर गौर किया जाना अपेक्षित है –

1. अरिहन्त शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है अरि (शत्रु) + हन्त (हनन)। इस प्रकार अरिहन्त शब्द का अर्थ कर्म रूपी शत्रुओं का नाश करना हुआ। अरहन्त प्राकृत भाषा का है जिसका अर्थ होता है पूज्य। एक मंत्र में दो भाषाओं के शब्द आना युक्तिसंगत नहीं है। अत: इस प्राकृत भाषा के मंत्र में अरिहन्त (संस्कृत शब्द) न होकर अरहंत ही होना तर्कसंगत लगता है।

2. प्राचीन शिलालेख और शास्त्रों के अनुसार सबसे प्राचीन शब्द अरहन्त ही है। उड़ीसा में उदयगिरि के हाथीगुंफा के शिलालेख में कलिंग सम्राट खारवेल द्वारा आदि मंगल में अरहन्त शब्द का उपयोग किया गया है। इस शिलालेख का समय ईसा से पूर्व का माना जाता है मूडबद्री में उपलब्ध मूल ग्रन्थ षटखण्डागम में भी यही पाठ है। मूलाराधना नामक ग्रन्थ में भी यही पाठ आया है।

3. शत्रुओं के हनन जैसा भाव इस प्रकार के सर्वोच्च कोटि के मंत्र में अहिंसा संस्कृति के अनुकूल प्रतीत नहीं होता है।

4. कर्म, केवली भगवान के शत्रु नहीं हैं। केवली भगवान के तो कोई शत्रु या मित्र नहीं हैं। अत: यह कहना कि केवली शत्रुओं (कर्मों) का नाश करते हैं, युक्तिसंगत नहीं है।

क्या कर्म शत्रु है?
यह विचारणीय है कि क्या वस्तुत: कर्मों को जीव का शत्रु माना जाना उचित है। कर्म वस्तुत: जीव का न तो शत्रु है और न मित्र है। जैसा इस जीव का भाव तथा कार्य होता है, उसी अनुरूप उसे उच्च या नीच गति में सुख या दु:ख मिलता है। कर्म संज्ञा तो इस प्रकार का बही खाता है – जीव का जैसा अच्छा या बुरा कार्य होता ह, उसका लेखा कर्मों के रूप में नहीं होता है। कर्म अजीव पदार्थ है जिसमें दुश्मनी या दोस्ती करने की ताकत नहीं हैं। यदि इसे दुश्मन माना जावे तो यह जीव का बुरा ही करता, जीव का अच्छा कभी नहीं करता और इस प्रकार तीर्थंकर आदि महापुरूषों को केवलज्ञान या मोक्ष की प्राप्ति कैसे होती? कहा भी है –
कर्म विचारे कौन, भूल मेरी अधिकाई
अगिन सहे घन-घात, लोह की संगति पाई।

कर्म तो जड़ है। इसमें किसी को सुख या दु:ख देने की इच्छा नहीं है। स्वयं कर्म तो कर्म-रूप परिणमित होते नहीं है, जीव के भावों के निमित्त से कर्म-रूप होते हैं। यदि कोई व्यक्ति पत्थर लेकर अपना सिर फोडे़ तो इसमें पत्थर का क्या दोष है पत्थर एक पुदगल है जिसमें कठोरता एक गुण है। मगर वह स्वयं किसी को चोट नहीं पहुंचा सकता है। हमारे द्वारा क्रिया करने पर ही चोट पहुंचती है। इसमें पत्थर को दोषी नहीं माना जाना चाहिये। इसी प्रकार जीव अपने रागादिक भावों से पुदगल को कर्म-रूप परिणमित करके अपना भला-बुरा करे तो कर्म का क्या दोष है। इसलिये कर्म को जीव का शत्रु मानना भ्रम है। वस्तुत: जीव का शत्रु कर्म नहीं, उसकी करनी है।

जीव व पुदगल दोनों सदैव से हैं। इनमें से किसी का भी नाश नहीं होता है। कर्म जड़ वस्तु है। इसमें आत्मा के साथ विषेष संबंध होने की ताकत है। जब आत्मा अपने मूल स्वभाव में लीन हो जाती है तो कर्म उसका पीछा छोड़कर अलग हो जाते हैं। सो यह कहना उचित नहीं लगता कि आत्मा ने कर्मों का नाश किया। कुछ लोग कर्मों को अपना शत्रु मानते है और तप आदि द्वारा उनका नाश करना कहते हैं। कर्मों को बैरी मानने से उन लोगों के राग-द्वेष रहेगा तब तक केवलज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है।
इस प्रकार णमोकार मंत्र के प्रथम पद में अरहंत शब्द का उपयोग अधिक युक्ति-युक्त लगता है। फिर भी वर्तमान में दोनों शब्द (अरहन्त व अरिहन्त) प्रचलन में हैं, अत: इस बारे में पुन: विचार करके स्वयं के द्वारा निर्णय लिया जाना अपेक्षित है।

णमोकार मंत्र के विभिन्न नाम :
णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा का मंत्र है। प्राकृत में इसे णमोकार मंत्र कहते है। संस्कृत में इसे नमस्कार मंत्र कहते है। हिन्दी में इसी का अपभ्रंश नाम नवकार मंत्र है।

इस मंत्र के अनेक नाम है। इनमें प्रमुख हैं – पंच नमस्कार मंत्र, महामंत्र, अपराजित मंत्र, मूलमंत्र, मंत्रराज, अनादिनिधन मंत्र, मंगल मंत्र आदि।

पंच नमस्कार मंत्र :- जो परम पद (मोक्ष) प्राप्त कर चुके हैं अथवा उस मार्ग पर अग्रसर हैं, ऐसे पांच परमेष्ठियों को इस मंत्र में नमस्कार किया गया है, अत: इसे पंच नमस्कार मंत्र कहते है।

महामंत्र अपराजित मंत्र :- तीनों लोकों में इस मंत्र के समान कोई मंत्र नहीं है। आचार्य उमास्वामी ने णमोकार मंत्र स्तोत्र में कहा है कि तराजू के एक पलड़े में णमोकार मंत्र और दूसरे में तीन लोक रख दें तो णमोकार मंत्र वाला पलड़ा ही भारी रहेगा। अत: इसे महामंत्र अथवा अपराजित मंत्र भी कहते है।

मूलमंत्र मंत्रराज :- यह मंत्र संसार के सभी मंत्रों का जनक (मूल) है। इससे 84 लाख मंत्रों की रचना हुई है। अत: इसे मूल मंत्र अथवा मंत्रराज भी कहते हैं।

अनादि-निधन मंत्र :- कर्म काल (चतुर्थ काल) में पांचों परमेष्ठी अनन्त काल से होते आ रहे हैं और भविष्य में भी अनन्त काल तक होते रहेंगे। इस प्रकार इनका आदि भी नहीं है और अन्त भी नहीं है। इस मंत्र को किसी ने बनाया नहीं है और न यह कभी नष्ट होगा। अत: यह अनादि-निधन मंत्र कहलाता है। वर्तमान काल की अपेक्षा से आचार्य भूतबलि और पुष्पदन्त ने इस मंत्र को जैनधर्म के महान ग्रन्थ षटखण्डागम में सर्व प्रथम प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध किया।

मंगल मंत्र :- यह मंत्र पापों का नाश करने वाला व मंगल करने वाला है।
णमोकर मंत्र का महात्म्य :

एसो पंच णमोयारो सव्व-पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं पढ़मं होइ मंगलं।।

यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करने वाला है और समस्त मंगलों में पहला मंगल है।

मंत्र की विशेषतायें :
1. इस मंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी विशेष व्यकित या देवी-देवता को नमस्कार नहीं किया है। जिन्होंने तप-ध्यान करके अपनी आत्मा का कल्याण किया है और परमेष्ठी पद प्राप्त किया है अथवा इस हेतु प्रयासरत रहे हैं अथवा प्रयासरत हैं, ऐसे सभी महापुरूषों को नमस्कार किया गया है।

2. यह मंत्र किसी धर्म, सम्प्रदाय अथवा जाति विशेष से संबंध नहीं रखता है। सभी प्राणी चाहे वे किसी भी जाति, संप्रदाय, धर्म, देश के हों अथवा गरीब हों, अमीर हों, इस मंत्र के द्वारा अपना कल्याण कर सकते हैं।

3. इस मंत्र की एक विशेषता यह भी है कि इसमें किसी प्रकार की याचना नहीं की गई है। केवल नि:स्वार्थ भाव से पंच परमेष्ठी के प्रति भक्ति भाव प्रकट किया गया है। अन्य मंत्रों में कोई न कोई चाहना प्राय: की जाती है। जैसे :- सर्व शांतिं कुरू-कुरू स्वाहा। इसमें भी शांति की याचना की गई है। यद्यपि यह सार्वजनिक हित के लिये याचना है फिर भी याचना तो की ही गई है। मगर णमोकार मंत्र में किसी से भी किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या परोक्ष याचना नहीं की गई है।

4. णमोकार मंत्र को किसी भी स्थान व स्थिति आदि में जपा जा सकता है। चाहे वह स्थान पवित्र हो, अपवित्र हो, चाहे व्यक्ति गतिमान हो या स्थिर हो, खड़ा हो या बैठा हो, सभी स्थितियों में यह मंत्र जपा जा सकता है।

5. णमोकार मंत्र को 18432 प्रकार से पढ़ा जा सकता है।

णमोकार मंत्र को पूर्ण श्रद्धा के साथ जपने से यह बहुत ही फलदायक है। अत: आवश्यकता इसी बात की है कि हमें इस मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिये। राजकुमार जीवंधर ने मरणासन्न कुत्ते को यह मंत्र सुनाया तो कुत्ते का जीव सुदर्शन नामक यक्षेन्द्र हुआ। पद्मरूचि सेठ ने मरणासन्न बैल को णमोकार मंत्र सुनाया जिसके प्रभाव से वह वृषभध्वज राजकुमार बना। कुछ भव पश्चात ये दोनों क्रमश: राम और सुग्रीव बने। जिनदत्त सेठ के वचनों को प्रमाणित मानकर अंजन चोर ने परोक्ष रूप से इस मंत्र पर श्रद्धान किया तो उसे आकाश गामिनी विद्या प्राप्त हुई।

इस मंत्र का कभी अपमान नहीं करना चाहिये। इस मंत्र का अपमान दु:खदायी होता है। सुभौम चक्रवर्ती ने अपने प्राणों की रक्षार्थ णमोकार मंत्र को समुद्र के पानी पर लिखकर अपने पैरों से मिटाकर अपमान किया तो व्यन्तर देव ने उसे लवण समुद्र में डुबो दिया और वह मरकर सातवें नरक में गया।

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