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क्षमावाणी – एक पर्व

क्षमावाणी – एक पर्व

लेखिका: राजश्री कासलीवाल

दस लक्षण पर्व एक ऐसा पर्व है जो पर्युषण पर्व के रूप में आकर समूचे देशवासियों को सुख और शांति का संदेश देते हैं। ‘यह पावन पर्व सिर्फ जैनियों को ही नहीं सभी समाजजन को अपने अहंकार और क्रोध का त्याग करके संयम के रथ पर सवार होकर सादा जीवन जीने, उच्च विचारों को अपनाने की प्रेरणा देते हैं।’ दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व जैन समुदायी बहुत ह‍ी सद्‍भाव और संयम से मनाते है।
इन दस दिनों में लोग पूजा-अर्चना, आरती, उपवास, एकासन व्रत, रात्रि अन्न-जल का त्याग करके बहुत ही त्याग भावना से संयमपूर्वक और धर्म ध्यान में अपना चित्त लगाकर पर्व का आनंद उठाते हैं। इस समय दैनिक क्रियाओं से दूर रहने का प्रयास किया जाता है। इन दिनों मंदिर परिसर में अधिकतम समय तक रहना जरूरी माना जाता है और इसका प्रभाव पूरे समाज में दिखाई देता है।
इन दिनों रात्रि मंदिरों में सामायिक पाठ के साथ-साथ भक्ति और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। जिसके माध्यम से अलग-अलग विचारधाराओं का प्रेरित करके सन्मार्ग पर चलने का, अपने अंह को त्यागने और दूसरों की भलाई के लिए कार्य करने की प्रेरणास्पद कार्यक्रमों का मंचन करके समाजवासियों को प्रेरणा देते हैं।
इसमें क्षमावणी पर्व का अपना एक अलग ही महत्व होता है। क्षमा पर्व हमें सहनशीलता से रहने की प्रेरणा देता है।
क्रोध को पैदा न होने देना और अगर हो भी जाए तो अपने विवेक से, नम्रता से उसे विफल कर देना। अपने भीतर आने वाले क्रोध के कारण को ढूँढकर, क्रोध से होने वाले अनर्थों के बारे में सोचना और अपने क्रोध को क्षमारूपी अमृत पिलाकर अपने आपको और दूसरों को भी क्षमा की नजरों से देखना।
अपने से जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए खुद को क्षमा करना और दूसरे के प्रति भी इसी भाव को रखना इस पर्व का महत्व है। अपने अंदर क्षमा के गुणों का निरंतर चिंतन करते रहना।
क्षमा पर्व मनाते समय अपने मन में छोटे-बड़े का भेदभाव न रखते हुए सभी से क्षमा माँगना इस पर्व का उद्देश्य है। हम सब यह क्यों भूल जाते हैं कि हम इंसान हैं और इंसानों से गलतियाँ हो जाना स्वाभाविक है।
ये गलतियाँ या तो हमसे हमारी परिस्थितियाँ करवाती हैं या अज्ञानतावश हो जाती हैं। तो ऐसी गलतियों पर न हमें दूसरों को सजा देने का हक है, न स्वयं को। यदि आपको संतुष्टि के लिए कुछ देना है तो दीजिए ‘क्षमा’।
यदि मौका मिले तो जिसने आपकी भावनाओं को आहत किया है उससे बिना झिझक उसके व्यवहार का कारण पूछ लें, हो सकता है आपके मन की सारी दुविधा दूर हो जाए। यदि आपको मौका मिले न मिले तो बिना किसी संकोच के उसे माफ कर दीजिए और पुनः सहज हो जाइए, पहले की तरह।
हर इंसान को जीवन में कई बार बहुत ही कड़वे अनुभवों और सच्चाइयों से रूबरू होना पड़ता है। कई बार ऐसा भी हो जाता है कि गलती सामने वाले इंसान की होने के बाद भी वह ही आप पर हावी होकर आपको चार कड़वी बातें सुना देता है।
आपकी अवहेलना करता है। आपको वह-वह बातें भी सुना देता है जिसकी आपको उस इंसान से कभी अपेक्षा भी नहीं होती है। ऐसे समय में आपका क्रोधित होना संभव है लेकिन फिर भी उस इंसान के द्वारा कहीं कई कड़वी बातों को दिल से ना लगाते ह‍ुए उसे माफ कर दें।

अपने मन में यह विचार धारण करें कि उसने जो इज्जत आपको बक्षी है उससे आप नई सीख लेते हुए उसे माफ करें। पहले यह सोचे कि वह भी आपकी तरह एक इंसान है और उससे भी गलती हो जाता स्वाभाविक ही है।
इसलिए किसी के द्वारा कहीं गई कड़वी बातों को भूल जाए। और अपने ह्रदय के क्षमारूपी अमृत से उसको लाभान्वित कर दें। उस इंसान का उन सब बातों के लिए भी धन्यवाद करें जो उसने आपको क्रोध के समय कहीं थी। तभी आप एक सच्चे और संयमधारी इंसान होने का महत्व समझ पाएँगे।
क्षमावाणी पर्व के दिन सभी जैनधर्मावलंबी धार्मिक स्थल पर इकट्‍ठा होकर अपने जान-पहचान वाले और अनजान बंधुओं से भी क्षमा माँगते हैं। यह पर्व हमें यह शिक्षा देता है कि अगर आपकी भावना अच्छी है तो दैनिक व्यवहार में होने वाली छोटी-मोटी त्रुटियों को अनदेखा करें और उससे सीख लेकर फिर कोई नई गलती न करणे की प्रेरणा देता है।
यह हमें ज्ञात कराता है कि हम अपने में सुधार का प्रयास सदैव जारी रखें, स्वयं की अच्छाइयों व अच्छे कार्यों को प्रोत्साहित करके ऐसी ही सकारात्मक सोच दूसरों के प्रति भी रखते हुए समता और संयम का भाव अपने जीवन में उतार कर सभी को एक नजरिए से देखने की प्रेरणा देता है।
क्षमा करने से आप दोहरा लाभ लेते हैं। एक तो सामने वाले को आत्मग्लानि भाव से मुक्त करते हैं व दिलों की दूरियों को दूर कर सहज वातावरण का निर्माण करके उसके दिल में फिर से अपने लिए एक अच्छी जगह बना लेते हैं।
तो आइए अभी भी देर नहीं हुई है। इस क्षमावणी पर्व से खुद को और औरों को भी रोशनी का नया संकल्प पाठ गढ़ते हुए क्षमा पर्व का असली आनंद उठाए और खुद भी जीए और दूसरों को भी जीने दे के संकल्प पर चलते हुए क्षमापर्व का लाभ उठाएँ।

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आचार्यश्री

23 नवंबर 1999 को आचार्यश्री का इंदौर से विहार हुआ था। तब से अब तक प्रतीक्षारत इंदौर समाज

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मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार सतवास से यहां होना चाहिए :




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