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जैन धर्म की मौलिक विशेषताएँ

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जैन धर्म शाश्वत है। (हरिवंश पुराण १/२७-२८) तीर्थंकर ऋषभदेव तथा महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं, अपितु प्रचारक थे।

सिंधु सभ्यता में जैन धर्म के अस्तित्व के प्रमाण हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता की योगी की कायोत्सर्ग मुद्रा अब भी जैनों में प्रचलित है।

जैन धर्म प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल में भरत क्षेत्र में २४ तीर्थंकरों के अस्तित्व को मानता है। (हरिवंश पुराण १/४-२४, पदमचरित ५/१९१-१९५)

जैन पंचपरमेष्ठियों की पूजा करते हैं।

जैन धर्म के अनुसार मनुष्य सर्वत्र हो सकता है। प्रमाण मीमांसा (पृ. २७-३)

जैन धर्म के अनुसार ईश्वर सृष्टिकर्ता नहीं है।

जैनों के मूल ग्रंथों की भाषा प्राकृत है।

जैन वेदों को प्रमाण नहीं मानते हैं।

जैन पूजा में सभी प्रकार की हिंसा वर्जित है।

जैनों के मूल ग्रंथ आचारांग-सूत्र-कृतांग आदि हैं। तत्वार्थसूत्र १/२०, सर्वार्धसिद्धि १/२०)

जैन धर्म वर्ण-व्यवस्था को जन्मना नहीं मानता है।

शूद्र भी धर्मपालन का अधिकारी है। (सागर धर्मामृत २/२२)

मोक्ष हेतु पुत्र आवश्यक नहीं है। (ज्ञानार्ठाव २/८/११)

जैन साधु नवधाभक्ति पूर्वक आहार लेते हैं।

जैन धर्म में मांसाहार पर पूर्णतः प्रतिबंध है। (पुरुषार्थ सिद्धयुपाय ६७-६८)

जैन धर्म में मद्यपान पर पूर्णतः प्रतिबंध है।

आटा, घी, शक्कर आदि की पशुमूर्ति बनाकर उसे खाना जैन धर्म में पूर्णतः वर्जित है। (जसहर चरित्र – २७)

जैनों में श्राद्ध प्रथा नहीं है। (स्याद्वाद मंजरी पृ-९७, भाव संग्रह-५०)

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