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आहार दान में विज्ञान

श्रीमती सुशीला पाटनी
आर.के. हाऊस,
मदनगंज- किशनगढ (राज.)

1. धातु और नॉनस्टिक बर्तन भोजन को विषाक्त बनाते हैं। इनमें टैफलान होता है जिसके गर्म होने पर 6 विषैली गैसें निकलती हैं और एल्युमीनियम, धातु व प्लास्टिक की कुछ मात्रा वस्तुओं में घुल-मिल जाती है, विशेषकर चटपटे भोजन, टमाटर और खट्टे पदार्थ से सबसे अधिक एल्युमीनियम घुलती। इससे कभी-कभी वह मस्तिष्क के तंतुओं में जमा हो जाती है। इसके अतिरिक्त यह गुर्दे, जिगर, पैराथाइराइड ग्रंथि और अस्थि-मज्जा में जमा हो जाती है।

2. स्टील के बर्तन से पाचन शक्ति घटती है। स्टील लोहे का मिश्र धातु है। इसमें निकल क्रोमियम व मैगनीज मिलाया जाता है। यह याददाश्त कमजोर होने वाली बीमारी एल्माइजर का रोगी बना सकता है। इसके आयन शरीर में पहुंचकर न्यूरॉन पर असर डालते हैं।

3. लोहे की कड़ाही में खाना पकाने से लोहा आयन के रूप में हमारे शरीर में पहुंच जाता है जिससे एनीमिया रोग की आशंका कम रहती है।

4. तांबे के बर्तन का उपयोग करने से भोजन एवं जल में तांबे के तत्व आ जाते हैं, जो कीटाणुओं को नष्ट करते हैं और पाचनक्रिया को दुरुस्त रखते हैं।

5. पीतल के बर्तन में पानी रखने से जीवाणु नहीं पनपते हैं, क्योंकि पीतल में तांबा रहता है, जो पानी में घुलकर जैविक व्यवस्था को नष्ट कर देता है। तांबे के कण जीवाणुओं की कोशिकाओं की दीवारों और उनके एंजाइमों के काम में बाधा डालते हैं।

6. नींबू का सत (टाटरी) मांसाहारी है : नींबू का सत-फल साइट्रिक एसिड नींबू से नहीं बनता। कई रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा प्राप्त होने वाला यह पदार्थ असंख्य जीवों की हिंसा से बनता है। विकल्प में नींबू के रस को धूप में सुखाकर दूसरे दिन उपयोग करें अथवा ताजा रस, टमाटर का सिरका, आंवले का रस, खट्टे फलों का रस, खट्टे शाक-सब्जी, जड़ी-बूटी आदि का उपयोग कर सकते हैं।

चलित रस की अवधारणा : सराइल के वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान के माध्यम से यह पता लगाया है कि फलों को 55 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म पानी में डुबकी लगाने से फलों की उम्र 1 सप्ताह तक बढ़ जाती है। वे फफूंद पेनिसिलियम डिजिटेटम और पीटेलीकम के नष्ट हो जाने से सड़ते नहीं हैं। इन रोगाणु, विषाणु के नष्ट हो जाने के बाद फलों की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है तथा पॉलीमर लिगानिन का स्राव रिस करके रक्षा प्रणाली को मजबूत करता है।

अब इस वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद हमें चितंन इस बात का करना होगा कि फलों को गर्म करने से उनकी अभक्ष्यता मानना वैज्ञानिक आधार पर कितना उचित होगा? जबकि चलित रस अभक्ष्य उन दलहन, तिलहन, अन्न, फल आदि पर लागू होता है, जो बहुत समय तक रखे रहने के कारण फफूंद पेनिसिलियम और अन्य बैक्टीरिया, विषाणु के पैदा हो जाने से अपना मूल रस/स्वाद बदल देते हैं। उन्हें अभक्ष्य की श्रेणी में अहिंसा की दृष्टि से गर्भित किया जाता है। फलों को गर्म करके अचित्त करना किसी भी प्रकार के रोगाणु, विषाणु, फफूंद आदि को पैदा नहीं कर सकता है। यह धारणा गलत है कि फलों को ज्यादा गर्म करने से स्वाद बदल जाएगा।

  • जब गर्म पानी से धुले हुए वस्त्रों का संपर्क अन्य दूसरे सवंमित वस्त्रों से होता है तो कुछ ही सेकंडों में रोगाणुओं का संक्रमण हो जाता है। यह संक्रमण बहुत तीव्र गति से होता है। (1 सेकंड में करोड़ों जीवाणु की उत्पत्ति या संक्रमण होता है।) वस्त्र के रन्ध्रों एवं तंतुओं के बीच में जीवाणुओं का फैलाव तथा उनका गुणसूत्री उत्पादन संक्रमण की दर को बहुत अधिक विस्तार दे देता है।
  • सोला की वैज्ञानिकता : बैक्टीरिया, वायरस, क्विक, शैवाल, फफूंद, खमीर, कृमि, लाखा जैसे रोगाणुओं के संक्रमणों को रोकने के लिए वस्त्र उपकरण, खाद्य सामग्री एवं भोजनशाला की पवित्रता बनाए रखने के लिए जिन विधियों या पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है, उसे ‘सोला’ कहा जाता है।
  • स्पंज की स्लीपर पहनकर भोजन-पाक क्रिया को संपन्न करने वालों को नहीं मालूम है कि स्पंज एक ऐसा पदार्थ है जिसमें सदैव जीवाणु और रोगाणुओं के रहने का आवास मौजूद रहता है, जो 1 सेकंड में करोड़ों की संख्या में संक्रमण करते हैं।
  • उपकरणों में कई ऐसे रंग, छिद्र, कटे-फटे, खुरदुरापन होने से उपकरणों में बैक्टीरिया और वायरस अपने आप पैदा होने लगते हैं। बर्तनों को अग्नि या गर्म जल से धोने की प्रक्रिया नहीं की जाएगी तो बर्तन रोगाणु निरोधी नहीं हो सकेंगे।
  • सूखे खाद्य पदार्थों में गीले हाथ, बर्तन, वस्त्र आदि का प्रयोग नहीं करना जैसे आटा, बेसन, मसाले आदि कई निर्मित पदार्थों में नई का जो संस्कार आता है उस कारण से खमीर-बैक्टीरिया खाद्य पदार्थों में उत्पन्न हो जाते हैं।

भोग-भूमि का सोपान- आहारदान :

  • साधु आहार के लिए निकल रहे हों अथवा आहार कर रहे हों और शवयात्रा निकल रही हो तो साधु से निवेदन करके कि ‘आगे रास्ता गड़बड़ है’, उनसे दूसरी गली में मुड़ने के लिए निवेदन करें और यदि आहार चल रहे हैं तो बाजे की आवाज या रोने की आवाज आ रही हो तो थाली बजाना या म्यूजिक आदि प्रारंभ करवा सकते हैं जिससे साधु का अंतराय या अलाभ नहीं होगा।
  • बालक/बालिका 8 वर्ष के उपरांत आहार दे सकते हैं और विवेकशील समझदार नहीं है तो 16 वर्ष तक के होने पर भी नहीं दिलाना चाहिए। विवेकी दाता अतिरिक्त सोला के कपड़े भी रखें, क्योंकि पहने हुए वस्त्र यदि अशुद्ध हो गए हो तो उनका प्रयोग किया जा सकता है अथवा श्रावक जो आहार देते के इच्छुक हैं, वे भी उन वस्त्रों का प्रयोग कर सकते हैं।
  • आहार देते समय जमीन पर यदि कोई वस्तु गिर जाती है तो विवेकी दाता उसे उठाकर एक और कर देता है व पुन: स्वच्छ प्रासुक जल से हाथ धोकर ही आहार देने में प्रवृत्त होता है। चौके में चींटी आदि नहीं आए उसके लिए कर्पूर, हल्दी की चारों ओर बाउंड्री बना दें।
  • जिनका हरी का त्याग हो, वह गन्ने का रस नहीं ले सकता है। जिसका मीठे का त्याग हो, वह गन्ने का रस ले सकता है। 6 रसों का त्यागी छाछ ले सकता है, क्योंकि छाछ रस में नहीं है, रस की यदि चाशनी बन जाती है, तो हरी में नहीं रहेगा।
  • कोई भी पदार्थ कोशिश भर हाथ से नहीं दें, चम्मच से दें, क्योंकि उस पदार्थ पर हाथ की ऊष्मा का प्रभाव पड़ता है। कभी भी एक हाथ से आहार नहीं दें, दोनों हाथों से दें अथवा दाएं हाथ में बाएं हाथ को लगाकर दें।
  • चौके में पाटा आदि घसीटें या सरकाएं नहीं, उठाकर रखें, क्योंकि घसीटने से जीव हिंसा हो सकती है। वस्तु खत्म होने पर दूसरी वस्तु चलाना प्रारंभ कर दें। यह नहीं कहें कि खत्म हो गई।
  • चौके में मारो, काटो, चीरो, चूरा-चूरा कर दो, टुकड़े-टुकड़ कर दूं, पीस लो, गर्म कर लें, गूंध दो, रगड़ दो, मसल दूंगा आदि हिंसात्मक एवं अशोभनीय शब्दों का भी प्रयोग न करें। ऐसा बोलने से साधु अंतराय कर सकते हैं।

वस्त्र कैसे होना चाहिए : एक वस्त्र पहनकर, फटा वस्त्र, जीर्ण, बहुत पुराना, छेद सहित मलिन वस्त्र, काला, ऊन से बना हुआ, जल गया हो, चूहों के द्वारा कुतरा गया, गाय-भैंस द्वारा खाया गया, धुएं के वर्ण वाला, अत्यंत छोटा हो आदि इन वस्त्रों को पहनकर आहार दान नहीं देना चाहिए। धोती-दुपट्टे अखंड वस्त्र माने जाते है। उन्हें ही पहनकर आहार दान दें।

(नोट : रेशम, टेरीलीन, वूली, सिलकर, मखमल, ऊनी एवं कोरे वस्त्र (बिना धुले), जालीदार आदि वस्त्र नहीं पहनें और कलावा (धागा) आदि यदि पहने हों तो उन्हें गीला करके ही शुद्ध कपड़े पहनें।)

द्विदल क्या है : दो दल वाले अनाज/ दाल (मूंग, उड़द, चना, मोठ, अरहर, मसूर आदि अन्न) जिनकी दो दालें-फाड़ें होती हैं, ऐसे अन्न दही, छाछ (कच्चा-पक्का) के साथ देने से जीभ की लार के माध्यम से त्रस जीव पैदा होते हैं और नष्ट होते हैं। जिन दालों का आटा बनता है, वे द्विदल होते हैं। जिनका तेल निकलता हैं, जैसे मूंगफली, बादाम आदि के साथ द्विदल नहीं होता है।

आचार्यश्री

23 नवंबर 1999 को आचार्यश्री का इंदौर से विहार हुआ था। तब से अब तक प्रतीक्षारत इंदौर समाज

2019 : विहार रूझान

मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का विहार नेमावर से यहां होना चाहिए :




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