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बर्थ-डे नहीं “टैम्पल-डे” मनायें

संकलन:

श्रीमती सुशीला पाटनी
आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ

जन्म पर प्रसन्नता और मृत्यु पर खिन्नता, इस संसार की रीति है। आगम में जिस जन्म को हमारे कर्मों का फल एवं दुःख का रूप कहा है वही जन्म ले कर हम संसारी कृतकृत्य और पुण्यों का प्रतिफल मानते हैं। सत्य यह भी है, पुण्य के फलस्वरूप ही हमें स्वस्थ शरीर एवं उत्तम भोगोपर्यान सामग्री उपलब्ध होती है। नरभव अमूल्य है और यही वह गति है, जिसके लिये स्वर्ग के देवता भी लालायित रहते हैं। परमपुरुषार्थी इस नरभव का प्राप्त लोक में अमूल्य है। परंतु वर्तमान में हम इस जन्म को पाकर यदि सचमुच “बडकाग नरतन पावा” यह नरभाव फरि मिलन कठिन है जैसे अनमोल वचनों की सार्थक सिद्ध करना चाहते हैं तो हमें इसी धरा पर आँखें खोलना है।

आज बच्चे हों या बडे जन्मदिन को आयोजन पूर्वक मनाने की एक प्रतिस्पर्धा सी चल गयी है। बडी पार्टियाँ, डाँस, केक काटना, मोमबत्ती जलाना, बुझाना, इन सबके बिना तो हमारा जन्म समारोह पूर्ण नहीं होता। होना मूक यूं चाहिये हम अपने बच्चों के “बर्थ-डे” की प्रातः उस प्रभु के दर्शन से करें, उस स्थान पर जा कर करें जहाँ हम कहते हैं :-

गर ये जन्म हमको दुबारा मिले!

ये जिनवर ये जिनालय सदा ही मिले!!

जन्म की महता और सार्थकता इसी में है कि हम प्रातः सर्वप्रथम मन्दिर में जा कर प्रभु के पूजन दर्शन से अपने दिन का प्रारम्भ करें, उस दिन केक काटने का नहीं, कर्म काटने का संकल्प लें, मोम के नहीं ओम के दिये जलायें। डी. जे., डिस्को नहीं भगवान के कीर्तन, आरती करें और प्रभु से यही कामना और आराधना करें, हमारा जन्म निरर्थक ना जाए, हम कुछ सार्थक करें। यदि एक बार भी हमनें अपने बर्थ को इस अर्थ पर सार्थक कर लिया तो निश्चित है कि हमारा संसार भ्रमण भी समाप्त होगा, पर इसके लिये आवश्यक है, अपने बर्थ-डे को “टैम्पल-डे” बनायें और अपने इस टैम्पल-डे को प्रभु का निवास स्थान समझकर पवित्र रखें।

काश हम समझ पाते जन्मदिन कितना महत्वपूर्ण हृदया-दोलित कर देने वाला संबोधिपरक पर्व है, हम उसका समुचित मूल्यांकन नहीं कर पाते। प्रदर्शन, आडम्बर, परम्परा निर्वहन में ही समाप्त कर देते हैं। हम जन्म लेते ही वह भी जैन कुल में श्रावक बन जाते हैं और श्रावक चरित्ररूपी खजाने को समंतभद्र जी जैसे उद्भट्टाचार्य ने रत्नों ले करण्ड में रखा है। और हम इस रत्न के होते हुए भी अन्धेरे में खडे हैं, अपने पद व श्रावक धर्म से च्युत हैं। संसार में उसी का जन्म लेना सार्थक है जो धर्म-पुरुषार्थी द्वारा इस विनाशधर्मा संसार में अपने जीवन को सद्गुणों एवं सद्कार्यों में लगाता है। आत्मदीप में ज्ञान ज्योति की प्रतिष्ठा किये बिना संसार सागर को पार करने की आकांक्षा व्यर्थ है। हमें अपने जन्म की महत्ता का जब तक पूर्ण विश्वास नहीं होगा तब तक वह इसको सार्थक कर जन्म-जन्मांतर को समाप्त करने के लिये धर्मोन्मुख नहीं होता तब तक जीव की 14 रानू स्तुंग अभीष्ट मंजिल सिद्धालय तो छोडिये जमीन पर रेंगने वाली अर्थ और काम जैसी तुच्छ वस्तुएं प्राप्त नहीं होती।

अतः आप अपने जन्मदिवस पर अपनी आत्मा को आध्यात्मिक ज्ञान से सम्पूरित करें। प्रखर ज्ञान चेतना के तेजस्व में हम अपनी आत्मा को कुन्दन बनाने का प्रयास करें। आज ही प्रण करें, हम अपने बच्चों के “बर्थ-डे” “टैम्पल-डे” के रूप में मनायेंगे। निश्चित रूप से प्रतिदिन मन्दिर जाने का नियम लेंगे और अपने बच्चों के भी प्रभु के दर्शन से नववर्ष का प्रारम्भ करेंगे और जिनालाय में प्रभु के सम्मुख यही प्रार्थना करेंगें – हे प्रभु ! जैसे आपने अपने जन्म को अजन्मा बनाया वैसे हम भी प्रयासरत रहे। गुरुदेव ने हमें प्रेरणा दी, कि हम अपने माता-पिता या परिवार के किसी प्रिय सदस्य का चित्र रखें एवं रिंगटोन हमेशा भजन या णमोकार मंत्र ही रखें, क्योंकि जीवन के हर पल में हम मोबाइल का प्रयोग करते हैं, उस समय प्रेरणा दायी चित्र एवं संगीत ही हमारे साथ रहे, न जाने जीवन का कौन सा पल अंतिम हो जाये।

2018 : चातुर्मास रूझान

मेरी भावना है कि संत शिरोमणि विद्यासागरजी महामुनिराज का सन, २०१८ का चातुर्मास होना चाहिए :-




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