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अक्षय तृतीया – दान तीर्थ का प्रारम्भ

प्रतिवर्ष वैषाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया पर्व अत्यन्त हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है। इसके प्राचीनत्व के मूल में कारण है क्योंकि यह पर्व आदिम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव से सम्बन्धित है जो कि स्वयं ही इसके करोड़ो वर्ष प्राचीनता का प्रमाण है। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव दीक्षोपरान्त मुनिमुद्रा धारण कर छः माह मौन साधना करने के बाद प्रथम आहारचर्या हेतु निकले।
यहां ध्यातव्य है कि तीर्थंकर क्षुधा वेदना को शान्त करने के लिये आहार को नहीं निकलते, अपितु लोक में आहार दान अथवा दानतीर्थ परम्परा का उपदेष देने के निमित्त से आहारचर्या हेतु निकलते है।
तदनुसार भगवान ऋषभदेव के समय चूंकि आहारदान परम्परा प्रचलित नहीं थी। अतः पड़गाहन की उचित विधि के अभाव होने से वे सात माह तक निराहार रहे। एक बार वे आहारचर्या हेतु हस्तिनापुर पधारे। उन्हें देखते ही राजा श्रेयांस को पूर्वभवस्मरण हो गया, जहां उन्होंने मुनिराज को नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान दिया था। तत्पष्चात् उन्होंने भगवान ऋषभदेव से श्रद्धा विनय आदि गुणों से परिपूर्ण होकर हे भगवन्! तिष्ठ! तिष्ठ!  यह कहकर पड़गाहन कर, उच्चासन पर विराजमान कर, उनके चरण कमल धोकर, पूजन करके, मन वचन काय से नमस्कार किया। तत्पष्चात् इक्षुरस से भरा हुआ कलष उठाकर कहा कि हे प्रभो! यह इक्षुरस सोलह उद्गम दोष, सोलह उत्पादन दोष, दष एषणा दोष तथा धूम, अंगार, प्रणाम और संयोजन इन चार दाता सम्बन्धित दोषों से रहित एवं प्रासुक है, अतः आप इसे ग्रहण कीजिए। तदनन्तर भगवान ऋषभदेव ने चारित्र की वृद्धि तथा दानतीर्थ के प्रवर्तन हेतु पारणा की।
आहारदान के प्रभाव से राजा श्रेयांस के महल में देवों ने निम्नलिखित पंचाष्चर्य प्रकट किये –
1.    रत्नवृष्टि
2.    पुष्पवृष्टि
3.    दुन्दुभि बाजों का बजना
4.    शीतल सुगन्धित मन्द मन्द पवन चलना
5.    अहोदानम्-अहोदानम् प्रषंसावाक्य की ध्वनि होना।
प्रथम तीर्थंकर की प्रथम आहारचर्या तथा प्रथम दानतीर्थ प्रवर्तन की सूचना मिलते ही देवों ने तथा भरतचक्रवर्ती सहित समस्त राजाओं ने भी राजा श्रेयांस का अतिषय सम्मान किया। भरत क्षेत्र में इसी दिन से आहारदान देने की प्रथा का शुभारम्भ हुआ।
पूर्व भव का स्मरण कर राजा श्रेयांस ने जो दानरूपी धर्म की विधि संसार को बताई उसे दान का प्रत्यक्ष फल देखने वाले भरतादि राजाओं ने बहुत श्रद्धा के साथ श्रवण किया तथा लोक में राजा श्रेयांस “दानतीर्थ प्रवर्तक“ की उपाधि से विख्यात हुए। दान सम्बन्धित पुण्य का संग्रह करने के लिये नवधाभक्ति जानने योग्य है।
जिस दिन भगवान ऋषभ देव का प्रथमाहार हुआ था उस दिन वैषाख शुक्ला तृतीया थी। भगवान की ऋद्धि तथा तप के प्रभाव से राजा श्रेयांस की रसोई में भोजन अक्षीण (कभी खत्म ना होने वाला, “अक्षय“) हो गया था। अतः आज भी यह तिथि अक्षय तृतीया के नाम से लोक में प्रसिद्ध है।
ऐसा आगमोल्लेख है कि तीर्थंकर मुनि को प्रथम आहार देने वाला उसी पर्याय से या अधिकतम तीसरी पर्याय से अवष्यमेव मुक्ति प्राप्ति करता है। कुछ नीतिकारों का ऐसा भी कथन है कि तीर्थंकर मुनि को आहारदान देकर राजा श्रेयांस ने अक्षयपुण्य प्राप्त किया था। अतः यह तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। वस्तुतः दान देने से जो पुण्य संचय होता है, वह दाता के लिये स्वर्गादिक फल देकर अन्त में मोक्ष फल की प्राप्ति कराता है।
अक्षय तृतीया को लोग इतना शुभ मानते है कि इस दिन बिना मुहूर्त, लग्नादिक के विचार के ही विवाह, नवीन गृह प्रवेष, नूतन व्यापार मुहूर्त आदिक भी करके गौरव मानते है। उनका विष्वास है कि इस दिन प्रारम्भ किया गया नया कार्य नियमतः सफल होता है। अतः यह अक्षय तृतीया पर अत्यन्त गौरवषाली है तथा राजा श्रेयांस द्वारा दानतीर्थ का प्रवर्तन कर हम सभी पर किये गये उपकार का स्मरण कराता है।


श्रीमती सुशीला पाटनी

आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ

आचार्यश्री

23 नवंबर 1999 को आचार्यश्री का इंदौर से विहार हुआ था। तब से अब तक प्रतीक्षारत इंदौर समाज

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