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हायकू

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दिगम्बर जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इन दिनों (Japanese Haiku, 俳句 ) जापानी हायकू (कविता) की रचना कर रहे हैं | हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। महाकवी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने लगभग 500 हायकू लिखे हैं, जो अप्रकाशित हैं।  कुछ हायकू इस प्रकार हैं :-

१‍ – जडो ना जोडो, जोडो बेजोड़ जोडो, जोड़ा तो छोडो |
२ – संदेह होगा, देह है तो देहाती ! विदेह हो जा |
३ – ज्ञान प्राण है, संयत हो तो त्राण, अन्यथा स्वान |
४ – छोटी दुनिया, काया में सुख दुःख, मोक्ष नरक |
५ – द्वेष से बचो, लवण दूर् रहे, दूध ना फटे |
६ – किसी वेग में, अपढ़ हो या पढ़े, सब एक हैं |
७ – तेरी दो आँखें, तेरी ओर हज़ार, सतर्क हो जा |
८ – चाँद को देखूँ, परिवार से घिरा, सूर्य सन्त है |
९ – मैं निर्दोषी हूँ, प्रभु ने देखा वैसा, कर्ता रहता।
१‍० – आज्ञा का देना, आज्ञा पालन से भी, कठिनतम।

१‍१‍ – तीर्थंकर क्यों, आदेश नहीं देते, सो ज्ञात हुआ।
१‍२ – साधु वृक्ष है, छाया फल प्रदाता, जो धूप खाता।
१‍३ – गुणालय में, एक आध दोष भी, तिल सालगे।
१‍४ – पक्ष व्यामोह, लौह पुरुष को भी, लहू चूसता।
१‍५ – पूर्ण पथ लो, पाप को पीठ दे दो, वृत्ति सुखी हो।
१‍६ – भूख मिटी है, बहुत भूख लगी, पर्याप्त रहें।
१‍७ – टिमटिमाते, दीपक को देख, रात भा जाती।
१‍८ – परिचित भी, अपरिचित लगे, स्वस्थ्य ध्यान में (बस हो गया)।
१‍९ – प्रभु ने मुझे, जाना माना परन्तु, अपनाया ना।
२० – कलि न खिली, अगुंली से समझो, योग्यता क्या है ?

२१‍ – आँखें लाल है, मन अन्दर दोषी, दोनों में कौन ?
२२ – इष्ट-सिध्दि में, अनिष्ट से बचना, दूष्टता नहीं।
२३ – सामायिक में, कुछ न करने की, स्थिति होती है।
२४ – मद का तेल, जल चुका बुझा सो, विस्मय द्वीप।
२५ – ध्वजा वायु से, लहराता पे वायु, आगे न आती।
२६ – ज्ञेय चिपके, ज्ञान चिपकता तो, स्मृति हो आती।
२७ – तैराक बनूँ, बनू गोताखोर सो, अपूर्व दिखे।
२८ – वर्षा के बाद, कड़ी मिट्टी सी माँ, दोषी पुत्र पे।
२९ – कछुए सम, इन्द्रिय संयम से, आत्म रक्षा हो।
३० – डूबना ध्यान, तैरना स्वाध्याय है, अब तो डूबो।

३१‍ – गुरु मार्ग में, पीछे की हवा सम, हमें चलाते।
३२ – संघर्ष में भी, चंदन सम सदा, सुगन्ध बाँटू।
३३ – प्रदर्शन तो, उथला है दर्शन, गहराता है।
३४ – योग साधन, है उपयोग शुद्धि, साध्य सिद्ध हो।
३५ – योग प्रयोग, साधन है साध्य तो, सदुपयोग।
३६ – धर्म का फल, बाद में न अभी है, पाप का क्षय।
३७ – पर पीड़ा से, अपनी करुणा सो, सक्रिय होती।
३८ – सीना तो तानो, पसीना तो बहाओ, सही दिशा में।
३९ – प्रश्नों से परे, अनुत्तर है उन्हें , मेरा नमन।
४० – फूल खिला पे, गंध नहीं आ रही, सो काग़ज़ का।

४१‍ – सरोवर का, अन्तरंग छुपा क्यों ? तरंग वश।
४२ – मान शत्रु है, कछुआ बन बचूँ, खरगोश से।
४३ – हाई कू कृति, तिपाई सी अर्थ को, ऊँचा उठाती।
४४ – अधूरा पूरा, सत्य हो सकता है, बहुत नहीं।
४५ – भूख लगी है, स्वाद लेना छोड़ दें, भर लें पेट।
४६ – ज्ञानी कहा था, जब बोलूँ अपना, स्वार्थ छूटता।
४७ – गुरू ने मुझे, प्रगट कर दीया, दीया दे दिया।
४८ – नीर नहीं तो, समीर सही प्यास, कुछ तो बुझे।
४९ – निजी प्रकाश, किसी प्रकाशन में, क्या कभी दिखा ?
५० – जितना चाहो, जो चाहो जब चाहो, क्या कभी मिला।

५१‍ – वैधानिक तो, पहले बनो फिर, धनिक बनो।
५२ – टिमटिमाते, दीपक को भी पीठ, दिखाती रात ।
५३ – रोगी की नहीं, रोग की चिकित्सा हो, अन्यथा भोगो।
५४ – देखा ध्यान में, कोलाहल मन का, नींद ले रहा।
५५ – मिट्टी तो खोदो, पानी को खोजो नहीं, पानी फूटेगा।
५६ – सुनना हो तो, नगाड़े के साथ में, बाँसुरी सुनो।
५७ – मलाई कहाँ, अशान्त दूध में सो, प्रशान्त बनो।
५८ – कब पता न, मरण निश्चित है, फिर डर क्यों ?
५९ – भरा घड़ा भी, खाली लगे जल में, हवा से बचों।
६० – नौ मास उल्टा, लटका आज तप (रहा पेट में) सो डर कैसा ?

६१‍ – मोक्षमार्ग तो, भीतर अधिक है, बाहर कम।
६२ – गूँगा गुड़ का, स्वाद क्या नहीं लेता ? वक्ता क्यों बनूँ ?
६३ – कमल खिले, दिन के ग्रहण में, करबद्ध हों।
६४ – पैर उठते, सीधे मोती के भी पे, उल्टे पढ़ते ।
६५ – भूत सपना, वर्तमान अपना, भावी कल्पना।
६६ – काले मेघ भी, नीचे तपी धरा को, देख रो पड़े।
६७ – घी दूध पुन:, बने तो मुक्त पुन:, हम से रागी।
६८ – उससे डरो, जो तुम्हारे क्रोध को, पीते ही जाते।
६९ – शून्य को देखो, वैराग्य बढ़े-बढ़े, नेत्र की ज्योति।
७० – पौधे न रोपे, छाया और चाहते, निकम्मे से हो।

७१‍ – उनसे मत, डरो जिन्हें देख के, पारा न चढ़े।
७२ – क्या सोच रहे, क्या सोंचू जो कुछ है, कर्म के धर्म।
७३ – तुम्बी तैरती, औरों को भी तारती, छेद वाली क्या ?
७४ – आलोचन से, लोचन खुलते हैं, सो स्वागत है।
७५ – दुग्ध पान में, गिरा नीला सा जीव, तनु प्रमाण ।
७६ – स्वानुभव की, समीक्षा पर करें, तो आँखें सुने।
७७ – स्वानुभव की, प्रतिक्षा स्व करे तो, कान देखता।
७८ – मूल बोध में, बड़ की जटाएँ सी, व्याख्याएँ न हो।
७९ – मन अपना, अपने विषय में, क्यों न सोचता ?
८० – स्थान समय, दिशा आसन इन्हें , भूलते ध्यानी।

८१‍ – चिन्तन न हो, तो कुछ चिन्ता नहीं, चित्त स्वरुपी।
८२ – एक आँख भी, काम में आती पर, एक पंख क्या ?
८३ – नय-नय है, विनय पुरोधा (प्रमुख) है, मोक्षमार्ग में।
८४ – सम्मुख जा के, दर्पण देखता तो (दर्पण में देखा पे) मैं नहीं दिखा।
८५ – पाषाण भीगे, वर्षा में हमारी भी, यही दशा है।
८६ – आपे में न हो (नहीं), तभी तो अस्वस्थ हो, अब तो आओ।
८७ – दीप अनेक, प्रकाश में प्रकाश, एक मेक सा।
८८ – होगा चाँद में, दाग चान्दनी में ना, ताप मिटा तो।
८९ – प्रतिशोध में, ज्ञानी भी अन्धा होता, शोध तो दूर।
९० – निद्रा वासना, दो बहनें हैं जिन्हें, लज्जा न छूती।

९१‍ – जिस बोध में, लोकालोक तैरते,उसे नमन।
९२ – उजाले में हैं, उजाला करते हैं, गुरु को वंदू ।
९३ – उन्हें जिनके, तन-मन नग्न हैं, मेरा नमन।
९४ – शिव पथ के, कथन वचन भी, शिरोधार्य हो।
९५ – व्यंग का संग, सकलांग से नहीं, विकलांग से।
९६ – कुछ न चाहूँ, आप से आप करें, बस ! सद्ध्यान।
९७ – बड़ तूंफा में, शीर्षासन लगाता, बेंत झुकता।
९८ – आशा जीतना, श्रेष्ठ निराशा से तो, सादगी भरी।
९९ – समानान्तर।, दो रेखाओं में मैत्री। पल सकती।
१‍०० – प्राय: अपढ़, दीन हो,पढ़े मानी, ज्ञानी विरले।

१‍०१‍ – कच्चा घड़ा है, काम में न लो, बिना, अग्नि परीक्षा।
१‍०२ – पक्षी कभी भी, दूसरों के नीड़ों में, घुसते नहीं।
१‍०३ – तरंग देखूँ, भंगुरता दिखती, ज्यों का त्यों ‘तोय’।
१‍०४ – बिना प्रमाद, श्वसन क्रिया सम, पथ पे चलूँ।
१‍०५ – दृढ़-ध्यान में, ज्ञेय का स्पन्दन भी, बाधक नहीं।
१‍०६ – शब्द पंगु हैं, जवाब न देना भी, लाजवाब है।
१‍०७ – पराश्रय से, मान बोना हो, कभी, देन्द्य-लाभ भी।
१‍०८ – वक़्ता व श्रोता, बने बिना, गूँगा सा, निजी-स्वाद ले।
१‍०९ – नियन्त्रण हो, निज पे, दीप बुझे, निजी श्वांस से।
१‍१‍० – अपना ज्ञान, शुध्द-ज्ञान न, जैसे, वाष्प, पानी न।

१‍१‍१‍ – औरों को नहीं, प्रभु को देखूँ तभी, मुस्कान बाटूँ।
१‍१‍२ – अपमान को, सहता आ रहा है, मान के लिए।
१‍१‍३ – मान चाहूँ ना, ये अपमान अभी, सहा न जाता।
१‍१‍४ – यशोगन्ध की, प्यासी नासा स्वयं तू, निर्गन्धा है री !
१‍१‍५ – दमन, चर्म-, चक्षु का हो, नमन, ज्ञान चक्षु को।
१‍१‍६ – गाय बताती, तप्त-लोह पिण्ड को, मुख में ले ‘सत्’।
१‍१‍७ – कुछ स्मृतियाँ, आग उगलती, तो, कुछ सुधा सी।
१‍१‍८ – मरघट में, घूँघट का क्या काम?, घट कहाँ है ?
१‍१‍९ – पुण्य-फूला है, पापों का पतझड़, फल अभाप।
१‍२० – गन्ध सुहाती, निम्बू-पुष्पों की, स्वाद।, उल्टी कराता।

१‍२१‍ – युवा कपोल, कपोल-कल्पित है, वृध्द-बोध में।
१‍२२ – लोहा सोना हो, पारस से परन्तु, जंग लगा क्या ?
१‍२३ – गुणी का पक्ष,लेना ही विपक्ष पे, वज्रपात है।
१‍२४ – बिना डाँट के, शिष्य और शीशी का, भविष्य ही क्या ?
१‍२५ – प्रकाश में ना…, प्रकाश को पढ़ो तो, भूल ज्ञात हो।
१‍२६ – देख सामने, प्रभु के दर्शन हैं, भूत को भूल…
१‍२७ – दीन बना है, व्यर्थ में बाहर जा, अर्थ है स्वयं।
१‍२८ – काल की दूरी, क्षेत्र दूरी से और, अनिवार्य है।
१‍२९ – दर्प को छोड़, दर्पण देखता तो, अच्छा लगता।
१‍३० – घनी निशा में, माथा भयभीत हो, आस्था, आस्था है।

१‍३१‍ – बिन्दु जा मिला, सभी मित्रों से, जहाँ, सिन्धु वही है।
१‍३२ – आगे बनूँगा, अभी प्रभु-पदों में, बैठ तो जाऊँ।
१‍३३ – रस-रक्षक-, छिलका, सन्तरे का, अस्तित्व ही क्या ?
१‍३४ – छोटा भले हो, दर्पण मिले साफ़, खुद को देखूँ।
१‍३५ – पराग-पीता-, भ्रमर, फूला फूल, आतिथ्य- प्रेमी।
१‍३६ – बोधा-काश में, आकाश तारा सम, प्रकाशित हो।
१‍३७ – पराकर्षण, स्वभाव सा लगता, अज्ञानवश।
१‍३८ – भ्रमर से हो,फूल सुखी, हो दाता, पात्र-योग से।
१‍३९ – तारा दिखती, उस आभा में कभी, कुछ दिखी क्या ?
१‍४० – सुधाकर की, लवणाकर से क्यों ?, मैत्री, क्या राज ?

१‍४१‍ – बाहर नहीं, वसन्त बहार तो, सन्त ! अन्दर…
१‍४२ – तारन टूटी, लगातार चिर से, चैतन्य-धारा।
१‍४३ – सुई निश्चय, कैंची व्यवहार है, दर्ज़ी-प्रमाण।
१‍४४ – चलो बढ़ो, कूदो, उछलो यहीं, धुआँधार है।
१‍४५ – बिना चर्वण, रस का रसना का, मूल्य ही क्या है ?
१‍४६ – ख़ाली बन जा, घट डूबता भरा…, ख़ाली तैरता।
१‍४७ – साष्टांग सम्यक्, शान चढ़ा हीरा सा।, कहाँ दिखता ?
१‍४८ – निजी पराये, वत्सों को, दुग्ध-पान, कराती गौ-माँ।
१‍४९ – छोटा सा हूँ मैं, छोर छूती सी तृष्णा, छेड़ती मुझे।
१‍५० – रसों का भान, जहाँ न, रहे वहाँ, शान्त-रस है।

१‍५१‍ – जिससे तुम्हें, घृणा न हो उससे, अनुराग क्यों ?
१‍५२ – मोक्षमार्ग में, समिति समतल।, गुप्ति सीढ़ियाँ।
१‍५३ – धूप-छाँव सी, वस्तुत: वस्तुओं की, क्या पकड़ है ?
१‍५४ – धूम्र से बोध, अग्नि का हो गुरु से, सो आत्म बोध।
१‍५५ – कब लौं सोचो।, कब करो, ना सोचे, करो क्या पाओ ?
१‍५६ – कस न, ढील, अनति हो, सो वीणा, स्वर लहरी।
१‍५७ – पुण्य-पथ लो, पाप मिटे पुण्य से, पुण्य पथ है।
१‍५८ – पथ को कभी, मिटाना नहीं होता, पथ पे चलो।
१‍५९ – नाविक तीर, ले जाता हमें, तभी, नाव की पूजा।
१‍६० – हद कर दी, बेहद छूने उठें, क़द तो देखो।

१‍६१‍ – भारी वर्षा हो, दल-दल धुलता, अन्यथा मचे।
१‍६२ – माँगते हो तो, कुछ दो, उसी में से, कुछ देऊँगा।
१‍६३ – अनेक यानि, बहुत नहीं किन्तु, एक नहीं है।
१‍६४ – मन की कृति, लिखूँ पढ़ूँ सुनूँ पै, कैसे सुनाऊँ ?
१‍६५ – कैसे, देखते, संत्रस्त संसार को ?, दया मूर्ति हो।
१‍६६ – मोह टपरी, ज्ञान की आँधी में यूँ, उड़ी जा रही
१‍६७ – पाँच भूतों के, पार, अपार पूत, अध्यात्म बसा।
१‍६८ – क़ैदी हूँ देह-, जेल में, जेलर ना…, तो भी भागा ना
१‍६९ – तेरा सो एक, सो सुख, अनेक में, दु:ख ही दु:ख।
१‍७० – सहजता में, प्रतिकार का भाव, दिखता नहीं।

१‍७१‍ – साधना छोड़, काय-रत होना ही, कायरता है।
१‍७२ – भेद-वही है, कला, स्वानुभूति तो, अद्वैत की माँ…
१‍७३ – विज्ञान नहीं, सत्य की कसौटी है, ‘दर्शन’ यहाँ।
१‍७४ – आम बना लो, ना कहो, काट खाओ, क्रूरता तजो।
१‍७५ – नौका पार में, सेतु-हेतु मार्ग में, गुरु-साथ दें।
१‍७६ – मुनि स्व में तो, सीधे प्रवेश करें, सर्प बिल में।
१‍७७ – चिन्तन न हो, तो चिन्ता मत करो, चित्स्वरुपी हो।
१‍७८ – दीप अनेक, प्रकाश में प्रकाश, एकमेक सा…
१‍७९ – चिन्तन कभी, समयानुबन्ध को, क्या स्वीकारता ?
१‍८० – बिना रस भी, पेट भरता, छोड़ो, मन के लड्डू।

१‍८१‍ – भोक्ता के पीछे, वासना, भोक्ता ढूँढे, उपासना को।
१‍८२ – दो जीभ न हो, जीवन में सत्य ही, सब कुछ है।
१‍८३ – सिर में चाँद, अच्छा निकल आया, सूर्य न उगा।
१‍८४ – जैसे दूध में, बूरा पूरा पूरता, वैसा घी क्यों ना…?
१‍८५ – स्वोन्नति से भी, पर का पराभव, उसे सुहाता… !
१‍८६ – शिरोधार्य हो, गुरु-पद-रज, सो, नीरज बनूँ।
१‍८७ – परवश ना, भीड़ में होकर भी, मौनी बने हो।
१‍८८ – दुर्भाव न टले, प्रश्न-भाव से सो, स्वभाव मिले।
१‍८९ – खाओ पीयो भी, थाली में छेद करो, कहाँ जाओगे ?
१‍९० – समझ न थी, अनर्थ किया आज, समझ, रोता।

१‍९१‍ – गुब्बारा फूटा, क्यों, मत पूछो, पूछो, फुलाया क्यों था?
१‍९२ – बदलाव है, पै स्वरुप में न, सो, ‘था’ है ‘रहेगा’।
१‍९३ – अर्ध शोधित-, पारा औषध नहीं, पूरा विष है।
१‍९४ – तटस्थ व्यक्ति, नहीं डूबता हो, तो, पार भी न हो।
१‍९५ – दृष्टि पल्टा दो, तामस समता हो, और कुछ ना…
१‍९६ – देवों की छाया, ना सही पै हवा तो, लग सकती।
१‍९७ – तेरा सत्य है, भविष्य के गर्भ में, असत्य धो ले।
१‍९८ – परिचित की, पीठ दिखा दे फिर !, सब ठीक है।
१‍९९ – मधुर बनो, दाँत तोड़ गन्ना भी, लोकप्रिय है।
२०० – किस ओर तू…!, दिशा मोड़ दे, युग-, लौट रहा है।

२०१‍ – दृश्य से हटा, ज्ञेय से ज्ञाता महा, सो अध्यात्म है।
२०२ – बिना ज्ञान के, आस्था को भीति कभी, छू न सकती।
२०३ – उर सिर से, जैसा महा ज्ञान से, दर्शन होता।
२०४ – व्याकुल व्यक्ति, सम्मुख हो कैसे दूँ, उसे मुस्कान…!
२०५ – अधम-पत्ते, तोड़े, कोंपलें बढ़े, पौधा प्रसन्न !
२०६ – पूर्णा-पूर्ण तो, सत्य हो सकता पै।, बहुत नहीं।
२०७ – गर्व गला लो, गले लगा लो जो हैं, अहिंसा प्रेमी
२०८ – काश न देता, आकाश, अवकाश, तू कहाँ होता ?
२०९ – सहयोगिनी, परस्पर में आँखें, मंगल झरी।
२१‍० – हमारे दोष, जिनसे गले धुले, वे शत्रु कैसे ?

२१‍१‍ – हमारे दोष, जिनसे फले फूले, वे बन्धु कैसे ?
२१‍२ – भरोसा ही क्या ?, काले बाल वालों का, बिना संयम।
२१‍३ – वैराग्य, न हो, बाढ़ तूफ़ान सम, हो ऊर्ध्व-गामी।
२१‍४ – छाया का भार, नहीं सही परन्तु, भावना तो है।
२१‍५ – फूलों की रक्षा, काँटों से हो शील की, सादगी से हो।
२१‍६ – बहुत मीठे, बोल रहे हो अब !, मात्रा सुधारो।
२१‍७ – तुमसे मेरे, कर्म कटे, मुझसे, तुम्हें क्या मिला ?
२१‍८ – राजा प्रजा का, वैसा पोषण करे, मूल वृक्ष का।
२१‍९ – कोई देखे तो, लज्जा आती, मर्यादा।, टूटने से ना…!
२२० – आती छाती पे, जाती कमर पे सो, दौलत होती।

२२१‍ – सिध्द घृत से, महके, बिना गन्ध, दुग्ध से हम।
२२२ – कपूर सम, बिना राख बिखरा, सिध्दों का तन।
२२३ – खुली शीप में, स्वाति की बूँद मुक्ता, बने, और न…!
२२४ – दिन में शशि, विदुर सा लगता, सुधा-विहीन।
२२५ – कब, पता न, मृत्यु एक सत्य है, फिर डर क्यों ?
२२६ – काल घूमता, काल पे आरोप सो, क्रिया शून्य है।
२२७ – बिना नयन, उप नयन किस, काम में आता ?
२२८ – अन जान था, तभी मजबूरी में, मज़दूर था।
२२९ – बिन देवियाँ, देव रहे, देवियाँ, बिन-देव ना…!
२३० – काला या धोला, दाग, दाग है फिर, काला तिल भी…

२३१‍ – हीरा, हीरा है, काँच, कांच है किन्तु, ज्ञानी के लिए…
२३२ – पापों से बचे, आपस में भिड़े क्या, धर्म यही है ?
२३३ – डाल पे पका, गिरा आम मीठा हो, गिराया खट्टा…
२३४ – भार हीन हो, चारु-भाल की माँग, क्या मान करो ?
२३५ – पक्षाघात तो, आधे में हो, पूरे में, सो पक्षपात…
२३६ – प्रति-निधि हूँ, सन्निधि पा के तेरी, निधि माँगू क्या ?
२३७ – आस्था व बोध, संयम की कृपा से, मंज़िल पाते।
२३८ – स्मृति मिटाती, अब को, अब की हो, स्वाद शून्य है।
२३९ – शब्द की यात्रा, प्रत्यक्ष से अन्यत्र, हमें ले जाती।
२४० – चिन्तन में तो, परावलम्बन होता, योग में नहीं।

२४१‍ – सत्य, सत्य है, असत्य, असत्य तो, किसे क्यों ढाँकू…?
२४२ – किसको तजूँ, किसे भजूँ सबका, साक्षी हो जाऊँ।
२४३ – न पुंसक हो, मन ने पुरुष को, पछाड़ दिया…
२४४ – साधना क्या है ?, पीड़ा तो पी के देखो, हल्ला न करो।
२४५ – खाल मिली थी, यहीं मिट्टी में मिली, ख़ाली जाता हूँ।
२४६ – जिस भाषा में, पूछा उसी में तुम, उत्तर दे दो।
२४७ – कभी न हँसो, किसी पे, स्वार्थवश, कभी न रोओ।
२४८ – दर्पण कभी, न रोया न हँसा, हो, ऐसा सन्यास।
२४९ – ब्रह्म रन्ध्र से-, बाद, पहले श्वास, नाक से तोलो।
२५० – सामायिक में, तन कब हिलता, और क्यों देखों…?

२५१‍ – कम से कम, स्वाध्याय (श्रवण) का वर्ग हो प्रयोग-काल।
२५२ – एक हूँ ठीक, गोता-खोर तुम्बी क्या, कभी चाहेगा ?
२५३ – बिना विवाह, प्रवाहित हुआ क्या, धर्म-प्रवाह।
२५४ – दूध पे घी है, घी से दूध न दबा, घी लघु बना।
२५५ – ऊपर जाता, किसी को न दबाता, घी गुरु बना।
२५६ – नाड़ हिलती, लार गिरती किन्तु, तृष्णा युवती।
२५७ – तीर न छोड़ो, मत चुको अर्जुन !, तीर पाओगे।
२५८ – बाँध भले ही, बाँधो, नदी बहेगी, अधो या ऊर्ध्व।
२५९ – अनागत का, अर्थ, भविष्य न, पै, आगत नहीं।
२६० – तुलनीय भी, सन्तुलित तुला में, तुलता मिला।

२६१‍ – अर्पित यानी, मुख्य, समर्पित सो, अहंका त्याग।
२६२ – गन्ध जिव्हा का, खाद्य न, फिर क्यों तू, सौगंध खाता ?
२६३ – स्व-स्व कार्यों में, सब लग गये पै, मन न लगा ।
२६४ – तपस्वी बना, पर्वत सूखे पेड़, हड्डी से लगे।
२६५ – अन्धकार में, अन्धा न, आँख वाला, डर सकता।
२६६ – जल कण भी, अर्क तूल को, देखा !, धूल खिलाता।
२६७ – जल में तैरे, स्थूल-काष्ठ भी, लघु-, कंकर डूबे।
२६८ – छाया सी लक्ष्मी, अनुचरा हो, यदि, उसे न देखो।
२६९ – गुरु औ शिष्य, आगे-पीछे, दोनों में, अन्तर कहाँ ?

२७० – सत्य न पिटे, कोई न मिटे ऐसा, न्याय कहाँ है ?
२७१‍ – ऊहापोह के, चक्रव्यूह में-धर्म, दुरुह हुआ।
२७२ – नेता की दृष्टि, निजी दोषों पे हो, या, पर गुणों पे।
२७३ – गिनती नहीं, आम में मोर आयी, फल कितने ?
२७४ – दु:खी जग को, तज, कैसे तो जाऊँ, मोक्ष ? सोचता।
२७५ – दीप का जल, जल काई उगले, प्रसंग वश।
२७६ – बोलो ! माटी के, दीप-तले अंधेरा, या रतनों के ?
२७७ – बिना राग भी, जी सकते हो जैसे, निर्धूम अग्नि।
२७८ – दायित्व भार, कन्धों पे आते, शक्ति, सो न सकती।
२७९ – सुलझे भी हो, और औरों को क्यों ?, उलझा देते ?
२८० – कब बोलते ?, क्यों बोलते ? क्या बिना, बोले न रहो ?

२८१‍ – तपो वर्धिनी, मही में ही मही है, स्वर्ग में नहीं।
२८२ – और तो और, गीले दुपट्टे को भी, न फटकारो।
२८३ – ख़ूब बिगड़ा, तेरा उपयोग है, योगा कर ले !
२८४ – ज्ञान ज्ञेय से, बड़ा, आकाश आया, छोटी आँखों में।
२८५ – पचपन में, बचपन क्यों ? पढ़ो, अपनापन से।
२८६ – भोगों की याद, सड़ी-गली धूप सी, जान खा जाती
२८७ – सहगामी हो, सहभागी बने सो, नियम नहीं।
२८८ – पद चिह्नों पे, प्रश्न चिह्न लगा सो, उत्तर क्या दूँ ( किधर जाना ?)
२८९ – निश्चिन्तता में, भोगी सो जाता, वहीं, योगी खो जाता।
२९० – शत्रु मित्र में, समता रखें, न कि, भक्ष्या-भक्ष्य में।

२९१‍ – आस्था झेलती, जब आपत्ति आती, ज्ञान चिल्लाता?
२९२ – आत्मा ग़लती, रागाग्नि से, लोदी सी, कटती नहीं।
२९३ – नदी कभी भी, लौटती नहीं फिर !, तू क्यों लौटता ?
२९४ – समर्पण पे, कर्त्तव्य की कमी से, सन्देह न हो।
२९५ – कुण्डली मार, कंकर पत्थर पे, क्या मान बैठे ?
२९६ – खुद बँधता, जो औरों को बाँधता, निस्संग हो जा।
२९७ – सदुपयोग-, ज्ञान का दुर्लभ है, मद-सुलभ।
२९८ – ज्ञानी हो क्यों कि, अज्ञान की पीड़ा में, प्रसन्न-जीते।
२९९ – ज्ञान की प्यास, सो कही अज्ञान से, घृणा तो नहीं।
३०० – प्रभु-पद में, वाणी, काया के साथ मन ही भक्ति।

३०१‍ – मूर्छा को कहा, परिग्रह, दाता भी, मूर्च्छित न हो।
३०२ – जीवनोद्देश, जिना देश-पालन, अनुपदेश।
३०३ – द्वेष से राग, विषैला होता जैसा, शूल से फूल।
३०४ – विषय छूटे, ग्लानि मिटे, सेवा से, वात्सल्य बढ़े।
३०५ – अग्नि पिटती, लोह की संगति से, अब तो चेतो।
३०६ – सर्प ने छोड़ी, काँचली, वस्त्र छोड़े !, विष तो छोड़ो…!
३०७ – असमर्थन, विरोध सा लगता, विरोध नहीं।
३०८ – हम वस्तुत:, दो हैं, तो एक कैसे, हो सकते हैं ?
३०९ – मैं के स्थान में, हम का प्रयोग क्यों, किया जाता है ?
३१‍० – मैं हट जाऊँ, किन्तु हवा मत दो, और न जले…!

१‍१‍ – बड़ी बूँदों की, वर्षा सी बड़ी राशि, कम पचती।
३१‍२ – जिज्ञासा यानी, प्राप्त में असन्तुष्टि, धैर्य की हार…!
३१‍३ – बिना अति के, प्रशस्त नीति करो, सो विनती है।
३१‍४ – सुनो तो सही, पहले सोचो नहीं, पछताओगे।
३१‍५ – केन्द्र को छूती, नपी, सीधी रेखाएँ, वृत्त बनाती।
३१‍६ – शक्ति की व्यक्ति, और व्यक्ति की मुक्ति होती रहती।
३१‍७ – जो है ‘सो’ थामें, बदलता, होगा ‘सो’ है में ढलता।
३१‍८ – चिन्तन-मुद्रा, प्रभु की नहीं क्यों कि वह दोष है।
३१‍९ – पथ में क्यों तो, रुको, नदी को देखो चलते चलो।
३२० – ज्ञानी ज्ञान को, कब जानता जब, आपे में होता।

३२१‍ – बँटा समाज, पंथ-जाति-वाद में, धर्म बाद में
३२२ – घर की बात, घर तक ही रहे।, बे-घर न हो।
३२३ – अकेला न हूँ, गुरुदेव साथ हैं, हैं आत्मसात् वे।
३२४ – निर्भय बनो, पर निर्भिक होने, गर्व न पालो।
३२५ – अति मात्रा में, पथ्य भी कुपथ्य हो, मात्रा माँ सी हो।
३२६ – संकट से भी, धर्म-संकट और, विकट होता।
३२७ – अँधेरे में हो, किंकर्त्तव्य मूढ़ सो, कर्त्तव्य जीवी।
३२८ – धन आता दो, कूप साफ़ कर दो, नया पानी लो।
३२९ – हम से कोई, दु:खी नहीं हो, बस !, यही सेवा है।
३३० – चालक नहीं, गाड़ी दिखती, मैं न, साड़ी दिखती।

३३१‍ – एक दिशा में, सूर्य उगे कि दशों-, दिशाएँ ख़ुश।
३३२ – जीत सको तो, किसी का दिल जीतो, सो, बैर न हो।
३३३ – पूरक बनो, सिंह से वन, सिंह, वन से बचा।
३३४ – तैरना हो तो, तैरो हवा में, छोड़ो !, पहले मोह।
३३५ – गुरु कृपा से, बाँसुरी बना, मैं तो, ठेठ बाँस था।
३३६ – पर्याय क्या है ?, तरंग जल की सो !, नयी-नयी है।
३३७ – पुण्य का त्याग, अभी न, बुझे आग, पानी का त्याग।
३३८ – प्रेरणा तो दूँ, निर्दोष होने, रुचि, आप की होगी।
३३९ – वे चल बसे, यानी यहाँ से वहाँ, जा कर बसे।
३४० – कहो न, सहो, सही परीक्षा यही, आपे में रहो।

३४१‍ – पाँचों की रक्षा, मुठ्ठी में, मुठ्ठी बँधी, लाखों की मानी।
३४२ – केन्द्र की ओर, तरंगें लौटती सी, ज्ञान की यात्रा।
३४३ – बँधो न बाँधो, काल से व काल को, कालजयी हो।
३४४ – गुरु नम्र हो, झंझा में बड़ गिरे, बेंत ज्यों की त्यों।
३४५ – तैरो नहीं तो, डूबो कैसे, ऐसे में, निधि पाओगे ?
३४६ – मध्य रात्रि में, विभीषण आ मिला, राम, राम थे।
३४७ – व्यापक कौन ?, गुरु या गुरु वाणी, किस से पूछें ?
३४८ – योग का क्षेत्र, अंतर्राष्ट्रीय, नहीं, अंतर्जगत् है।
३४९ -मत दिलाओ, विश्वास लौट आता, व्यवहार से।
३५० -सार्थक बोलो, व्यर्थ नहीं साधना, सो छोटी नहीं।

३५१‍ -मैं खड़ा नहीं, देह को खड़ा कर, देख रहा हूँ।
३५२ -आँखें ना मूँदों, नाही आँख दिखाओ, सही क्या देखो?
३५३ -हाथ ना मलो, ना ही हाथ दिखाओ, हाथ मिलाओ।
३५४ -जाने केवली, इतना जानता हूँ, जान न हारा।
३५५ -ठण्डे बस्ते में, मन को रखना ही, मोक्षमार्ग है।
३५६ -आँखें देखती, हैं मन सोचता है, इसमें मैं हूँ।
३५७ -उड़ना भूली, चिड़िया सोने की तू, उठ उड़ जा।
३५८ -झूठ भी यदि, सफ़ेद हो तो सत्य, कटु क्यों न हो ?
३५९ -परिधि में ना, परिधि में हूँ हाँ हूँ, परिधि सृष्टा।
३६० -बचो-बचाओ, पाप से पापी से ना, पुण्य कमाओ।

३६१‍ -हँसो-हँसाओ, हँसी किसी की नहीं, इतिहास हो।
३६२ -अति संधान, अनुसंधान नहीं, संधान साधो।
३६३ -है का होना ही, द्र्व्य का स्वभाव है, सो सनातन।
३६४ -सुना था सुनो, ”अर्थ की ओर न जा” डूबो आपे में।
३६५ -अपनी नहीं, आहुति अहं की दो, झाँको आपे में।
३६६ -पीछे भी देखो, पिछलग्गू न बनो, पीछे रहोगे।
३६७ -द्वेष पचाओ, इतिहास रचाओ, नेता बने हो।
३६८ -काम चलाऊ, नहीं काम का बनूँ, काम हंता भी।
३६९ -आँखों से आँखें, न मिले तो भीतरी, आँखें खुलेगी।
३७० -ऊधमी तो है, उद्यमी आदमी सो, मिलते कहाँ ?

३७१‍ -तुम तो करो, हड़ताल मैं सुनूँ हर ताल को।
३७२ -संग्रह कहाँ, वस्तु विनिमय में, मूर्छा मिटती।
३७३ -सगा हो दगा, अर्थ विनिमय में, मूर्छा बढ़ती।
३७४ -धुन के पक्के, सिद्धांत के पक्के हो, न हो उचक्के ।
३७५ -नये सिरे से, सिर से उर से हो, वर्षादया की।
३७६ -ज़रा ना चाहूँ, अजरामर बनूँ, नज़र चाहूँ।
३७७ ‍-बिना खिलौना, कैसे किससे खेलूँ, बनूँ खिलौना।
३७८ -चिराग़ नहीं, आग जलाऊँ, ताकि, कर्म दग्ध हों।
३७९ -खेती-बाड़ी है, भारत की मर्यादा, शिक्षा साड़ी है।
३८० -शरण लेना, शरण देना दोनों, पथ में होते।

३८१‍ -दादा हो रहो, दादागिरी न करो, दायित्व पालो।
३८२ -हाथ तो डालो, वामी में विष को भी, सुधा दो हो तो।
३८३ -श्वेत पत्र पे, श्वेत स्याही से कुछ, लिखा सो पढ़ो।
३८४ -राज़ी ना होना, नाराज़ सा लगता, नाराज़ नहीं।
३८५ -भार तो उठा, चल न सकता तो, पैर उठेंगे।
३८६ -मन का काम, मत करो मन से, काम लो मोक्ष।
३८७ ‍-छात्र तो न हो, शोधार्थी शिक्षक व, प्रयोगधर्मी।
३८८ -दिन में शशि, शर्मिंदा हैं तारायें, घूँघट में है।
३८९ -दीक्षा ली जाती, पद दिया जाता है, सो यथायोग्य ।
३९० -उन्हें न भूलो, जिनसे बचना है, वक़्त-वक्त पे।

३९१‍ -सूत्र कभी भी, वासा नहीं होता सो, भाव बदलो।
३९२ -ध्यान काल में, ज्ञान का श्रम कहाँ, पूरा विश्राम।
३९३ -खान-पान हो, संस्कारित शिक्षा से, खान-दान हो।
३९४ -ऐसा संकेत, शब्दों से भी अधिक, हो तलस्पर्शी।
३९५ -हम अधिक, पढ़-लिखे हैं कम, समझदार
३९६ -मेरी दो आँखें मेरी ओर हजार सतर्क होऊँ।
३९७ -मुक़द्दर है, उतनी ही चद्दर, पैर फैलाओ।
३९८ -घुटने टेक, और घुटने दो न, घोंटते जाओ।
३९९ -अशुद्धि मिटे, बुध्दि की वृध्दि न हो। विशुध्दि बढ़े।
४०० -गोबर डालो, मिट्टी में सोना पालो, यूरिया राख।

४०१‍ – हमसे उन्हें, पाप बंध नहीं हो, यही सेवा है।
४०२ – प्राणायाम से, श्वास का मात्र न हो, प्राण दस है।
४०३ – देख रहा हूँ, देख न पा रही है, वे आँखें मुझे।
४०४ – दुस्संगति से बचो, सत् संगति में, रहो न रहो।
४०५ – दुर्ध्यान से तो, दूर रहो सध्यान, करो न करो।
४०६ – कर्रा न भले, टर्रा न हो तो पक्का, पक सकोगे।
४०७ – अंधाधुँध यूँ, महाबंध न करो, अंधों में अंधों।
४०८ – कमी निकालो, हम भी हम होंगे, कहाँ न कमी।
४०९ – लज्जा आती है, पलकों को बना लें, घूँघट में जा।
४१‍० – कड़वी दवा, उसे रुचति जिसे, आरोग्य पाना।

४१‍१‍ – स्व आश्रित हूँ , शासन प्रशासन, स्वशासित हैं।
४१‍२ – सागर शांत, मछली अशांत क्यों ? स्वाश्रित हो जा।
४१‍३ – कोठिया नहीं, छप्पर फाड़ देती, पक्की आस्था हो।
४१‍४ – धनी से नहीं, निर्धनी निर्धनी से, मिले सुखी हो।
४१‍५ – दण्डशास्त्र क्यों ? जैसा प्रभू ने देखा, जो होना हुआ।
४१‍६ – ईर्ष्या क्यों करो. ईर्ष्या तो बड़ों से हो, छोटे क्यों बनो ?
४१‍७ – टूट चुका है, बिखरा भर नहीं, कभी जुड़ा था।
४१‍८ – तपस्या नहीं, पैरों की पूजा देख, आँखें रो रही।
४१‍९ – भिन्न क्या जुड़ा ? अभिन्न कभी टूटा, कभी सोचा भी ?
४२० – कौन किससे ? कम है मत कहो, मैं क्या कम हूँ ?

४२१‍ – त्याग का त्याग, अभी न बुझे आग, पानी का त्याग।
४२२ – प्रेरणा तो दूँ , निद्रोष होने बचो, दोष से आप।
४२३ – यात्रा वृत्तांत, ‘‍’लिख रहा हूँ वो भी”, बिन लेखनी।
४२४ – मन की बात ”सुनना नहीं होता” मोझमार्ग में।
४२५ – ठंडे बस्ते में ”मन को रख फिर” आत्मा में डूब।
४२६ – खाली हाथ ले ”आया था जाना भी है” खाली हाथ ले।
४२७ – आँखें देखती ”मन याद करता” दोनों में मैं हूँ।
४२८ – दिख रहा जो ‘दृष्टा नहीं दृष्टा से” दिखता नहीं।
४२९ – आग से बचा ‘धूंवा से जला (वर्ती) सा, तू” मद से घिरा।
४३० – चूल को देखूँ ‘मूलको बंदू भूल” आमूल चूल।

४३१‍ – अंधी दौड़ में ”आँख वाले हो क्यों तो” भाग लो सोचो।
४३२ – महाकाव्य भी ”स्वर्णाभरण सम” निर्दोष न हो।
४३३ – पैरों में काँटे ”गड़े आँखों में फूल” आँखें क्यों चली।
४३४ – चकी भी लौटा ”समवशरण से ” कारण मोह।
४३५ – दर्शन से ना ”ज्ञान से आज आस्था” भय भीत है।
४३६ – एकता में ही ”अनेकांत फले सो” एकांत टले।
४३७ – पीठ से मैत्री ”पेट ने की तब से” जीभ दुखी है।
४३८ – सूर्य उगा सो ”सब को दिखता क्यों” आँखे तो खोलो।
४३९ – अंधे बहरे ”मूक क्या बिना शब्द” शिक्षा न पाते।
४३० – पद यात्री हो ”पद की इच्छा बिन” पथ पे चलूँ।
४४१‍ – सही चिंतक ”अशोक जड़ सम” सखोल जाता।

One Response to “हायकू”

Comments (1)
  1. anantanatbar namostu namostu…………gurudev.

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