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हायकू (221-440)

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२२१ – कपूर सम, बिना राख बिखरा, सिध्दों का तन।
२२२ – खुली शीप में, स्वाति की बूँद मुक्ता, बने, और न…!
२२३ – दिन में शशि, विदुर सा लगता, सुधा-विहीन।
२२४ – कब, पता न, मृत्यु एक सत्य है, फिर डर क्यों ?
२२५ – काल घूमता, काल पै आरोप सो, क्रिया शून्य है।
२२६ – बिना नयन, उप नयन किस, काम में आता ?
२२७ – अन जान था, तभी मजबूरी में, मज़दूर था।
२२८ – बिन देवियाँ, देव रहे, देवियाँ, बिन-देव ना…!
२२९ – काला या धोला, दाग, दाग है फिर, काला तिल भी…
२३० – हीरा, हीरा है, काँच, कांच है किन्तु, ज्ञानी के लिए…

२३१ – पापों से बचे, आपस में भिड़े क्या, धर्म यही है ?
२३२ – डाल पे पका, गिरा आम मीठा हो, गिराया खट्टा…
२३३ – भार हीन हो, चारु-भाल की माँग, क्या मान करो ?
२३४ – पक्षाघात तो, आधे में हो, पूरे में, सो पक्षपात…
२३५ – प्रति-निधि हूँ, सन्निधि पा के तेरी, निधि माँगू क्या ?
२३६ – आस्था व बोध, संयम की कृपा से, मंज़िल पाते।
२३७ – स्मृति मिटाती, अब को, अब की हो, स्वाद शून्य है।
२३८ – शब्द की यात्रा, प्रत्यक्ष से अन्यत्र, हमें ले जाती।
२३९ – चिन्तन में तो, परालम्बन होता, योग में नहीं।
२४० – सत्य, सत्य है, असत्य, असत्य तो, किसे क्यों ढाँकू…?

२४१ – किसको तजूँ, किसे भजूँ सबका, साक्षी हो जाऊँ।
२४२ – न पुंसक हो, मन ने पुरुष को, पछाड़ दिया…
२४३ – साधना क्या है ?, पीड़ा तो पी के देखो, हल्ला न करो।
२४४ – खाल मिली थी, यहीं मिट्टी में मिली, ख़ाली जाता हूँ।
२४५ – जिस भाषा में, पूछा उसी में तुम, उत्तर दे दो।
२४६ – कभी न हँसो, किसी पे, स्वार्थवश, कभी न रोओ।
२४७ – दर्पण कभी, न रोया न हँसा, हो, ऐसा सन्यास।
२४८ – ब्रह्म रन्ध्र से-, बाद, पहले श्वास, नाक से तोलो।
२४९ – सामायिक में, तन कब हिलता, और क्यों देखों…?
२५० – कम से कम, स्वाध्याय (श्रवण) का वर्ग हो प्रयोग-काल।

२५१ – एक हूँ ठीक, गोता-खोर तुम्बी क्या, कभी चाहेगा ?
२५२ – बिना विवाह, प्रवाहित हुआ क्या, धर्म-प्रवाह।
२५३ – दूध पे घी है, घी से दूध न दबा, घी लघु बना।
२५४ – ऊपर जाता, किसी को न दबाता, घी गुरु बना।
२५५ – नाड़ हिलती, लार गिरती किन्तु, तृष्णा युवती।
२५६ – तीर न छोड़ो, मत चुको अर्जुन !, तीर पाओगे।
२५७ – बाँध भले ही, बाँधो, नदी बहेगी, अधो या ऊर्ध्व।
२५८ – अनागत का, अर्थ, भविष्य न, पै, आगत नहीं।
२५९ – तुलनीय भी, सन्तुलित तुला में, तुलता मिला।
२६० – अर्पित यानी, मुख्य, समर्पित सो, अहंका त्याग।

२६१ – गन्ध जिव्हा का, खाद्य न, फिर क्यों तू, सौगंध खाता ?
२६२ – स्व-स्व कार्यों में, सब लग गये पै, मन न लगा ।
२६३ – तपस्वी बना, पर्वत सूखे पेड़, हड्डी से लगे।
२६४ – अन्धकार में, अन्धा न, आँख वाला, डर सकता।
२६५ – जल कण भी, अर्क तूल को, देखा !, धूल खिलाता।
२६६ – जल में तैरे, स्थूल-काष्ठ भी, लघु-, कंकर डूबे।
२६७ – छाया सी लक्ष्मी, अनुचरा हो, यदि, उसे न देखो।
२६८ – गुरु औ शिष्य, आगे-पीछे, दोनों में, अन्तर कहाँ ?
२६९ – सत्य न पिटे, कोई न मिटे ऐसा, न्याय कहाँ है ?
२७० – ऊहापोह के, चक्रव्यूह में-धर्म, दुरुह हुआ।

२७१ – नेता की दृष्टि, निजी दोषों पे हो, या, पर गुणों पे।
२७२ – गिनती नहीं, आम में मोर आयी, फल कितने ?
२७३ – दु:खी जग को, तज, कैसे तो जाऊँ, मोक्ष ? सोचता।
२७४ – दीप का जल, जल काई उगले, प्रसंग वश।
२७५ – बोलो ! माटी के, दीप-तले अंधेरा, या रतनों के ?
२७६ – बिना राग भी, जी सकते हो जैसे, निर्धूम अग्नि।
२७७ – दायित्व भार, कन्धों पे आते, शक्ति, सो न सकती।
२७८ – सुलझे भी हो, और औरों को क्यों ?, उलझा देते ?
२७९ – कब बोलते ?, क्यों बोलते ? क्या बिना, बोले न रहो ?
२८० – तपो वर्धिनी, मही में ही मही है, स्वर्ग में नहीं।

२८१ – और तो और, गीले दुपट्टे को भी, न फटकारो।
२८२ – ख़ूब बिगड़ा, तेरा उपयोग है, योगा कर ले !
२८३ – ज्ञान ज्ञेय से, बड़ा, आकाश आया, छोटी आँखों में।
२८४ – पचपन में, बचपन क्यों ? पढ़ो, अपनापन से।
२८५ – भोगों की याद, सड़ी-गली धूप सी, जान खा जाती
२८६ – सहगामी हो, सहभागी बने सो, नियम नहीं।
२८७ – पद चिह्नों पै, प्रश्न चिन्ह लगा सो, उत्तर क्या दूँ ( किधर जाना ?)
२८८ – निश्चिन्तता में, भोगी सो जाता, वहीं, योगी खो जाता।
२८९ – शत्रु मित्र में, समता रखें, न कि, भक्ष्या-भक्ष्य में।
२९० – आस्था झेलती, जब आपत्ति आती, ज्ञान चिल्लाता?

२९१ – आत्मा ग़लती, रागाग्नि से, लोदी सी, कटती नहीं।
२९२ – नदी कभी भी, लौटती नहीं फिर !, तू क्यों लौटता ?
२९३ – समर्पण पै, कर्त्तव्य की कमी से, सन्देह न हो।
२९४ – कुण्डली मार, कंकर पत्थर पै, क्या मान बैठे ?
२९५ – खुद बँधता, जो औरों को बाँधता, निस्संग हो जा।
२९६ – सदुपयोग-, ज्ञान का दुर्लभ है, मद-सुलभ।
२९७ – ज्ञानी हो क्यों कि, अज्ञान की पीड़ा में, प्रसन्न-जीते।
२९८ – ज्ञान की प्यास, सो कही अज्ञान से, घृणा तो नहीं।
२९९ – प्रभु-पद में, वाणी, काया के साथ मन ही भक्ति।
३०० – मूर्छा को कहा, परिग्रह, दाता भी, मूर्च्छित न हो।

३०१ – जीवनोद्देश, जिना देश-पालन, अनुपदेश।
३०२ – द्वेष से राग, विषैला होता जैसा, शूल से फूल।
३०३ – विषय छूटे, ग्लानि मिटे, सेवा से, वात्सल्य बढ़े।
३०४ – अग्नि पिटती, लोह की संगति से, अब तो चेतो।
३०५ – सर्प ने छोड़ी, काँचली, वस्त्र छोड़े !, विष तो छोड़ो…!
३०६ – असमर्थन, विरोध सा लगता, विरोध नहीं।
३०७ – हम वस्तुत:, दो हैं, तो एक कैसे, हो सकते हैं ?
३०८ – मैं के स्थान में, हम का प्रयोग क्यों, किया जाता है ?
३०९ – मैं हट जाऊँ, किन्तु हवा मत दो, और न जले…!
३१० – बड़ी बूँदों की, वर्षा सी बड़ी राशि, कम पचती।

३११ – जिज्ञासा यानी, प्राप्त में असन्तुष्टि, धैर्य की हार…!
३१२ – बिना अति के, प्रशस्त नीति करो, सो विनती है।
३१३ – सुनो तो सही, पहले सोचो नहीं, पछताओगे।
३१४ – केन्द्र को छूती, नपी, सीधी रेखाएँ, वृत्त बनाती।
३१५ – शक्ति की व्यक्ति, और व्यक्ति की मुक्ति होती रहती।
३१६ – जो है ‘सो’ थामें, बदलता, होगा ‘सो’ है में ढलता।
३१७ – चिन्तन-मुद्रा, प्रभु की नहीं क्यों कि वह दोष है।
३१८ – पथ में क्यों तो, रुको, नदी को देखो चलते चलो।
३१९ – ज्ञानी ज्ञान को, कब जानता जब, आपे में होता।
३२० – बँटा समाज, पंथ-जाति-वाद में, धर्म बाद में

३२१ – घर की बात, घर तक ही रहे।, बे-घर न हो।
३२२ – अकेला न हूँ, गुरुदेव साथ हैं, हैं आत्मसात् वे।
३२३ – निर्भय बनो, पर निर्भिक होने, गर्व न पालो।
३२४ – अति मात्रा में, पथ्य भी कुपथ्य हो, मात्रा माँ सी हो।
३२५ – संकट से भी, धर्म-संकट और, विकट होता।
३२६ – अँधेरे में हो, किंकर्त्तव्य मूढ़ सो, कर्त्तव्य जीवी।
३२७ – धन आता दो, कूप साफ़ कर दो, नया पानी लो।
३२८ – हम से कोई, दु:खी नहीं हो, बस !, यही सेवा है।
३२९ – चालक नहीं, गाड़ी दिखती, मैं न, साड़ी दिखती।
३३० – एक दिशा में, सूर्य उगे कि दशों-, दिशाएँ ख़ुश।

३३१ – जीत सको तो, किसी का दिल जीतो, सो, बैर न हो।
३३२ – पूरक बनो, सिंह से वन, सिंह, वन से बचा।
३३३ – तैरना हो तो, तैरो हवा में, छोड़ो !, पहले मोह।
३३४ – गुरु कृपा से, बाँसुरी बना, मैं तो, ठेठ बाँस था।
३३५ – पर्याय क्या है ?, तरंग जल की सो !, नयी-नयी है।
३३६ – पुण्य का त्याग, अभी न, बुझे आग, पानी का त्याग।
३३७ – प्रेरणा तो दूँ, निर्दोष होने, रुचि, आप की होगी।
३३८ – वे चल बसे, यानी यहाँ से वहाँ, जा कर बसे।
३३९ – कहो न, सहो, सही परीक्षा यही, आपे में रहो।
३४० – पाँचों की रक्षा, मुठ्ठी में, मुठ्ठी बँधी, लाखों की मानी।

३४१ – केन्द्र की ओर, तरंगें लौटती सी, ज्ञान की यात्रा।
३४२ – बँधो न बाँधो, काल से व काल को, कालजयी हो।
३४३ – गुरु नम्र हो, झंझा में बड़ गिरे, बेंत ज्यों की त्यों।
३४४ – तैरो नहीं तो, डूबो कैसे, ऐसे में, निधि पाओगे ?
३४५ – मध्य रात्रि में, विभीषण आ मिला, राम, राम थे।
३४६ – व्यापक कौन ?, गुरु या गुरु वाणी, किस से पूछें ?
३४७ – योग का क्षेत्र, अंतर्राष्ट्रीय, नहीं, अंतर्जगत् है।
३४८ -मत दिलाओ, विश्वास लौट आता, व्यवहार से।
३४९ -सार्थक बोलो, व्यर्थ नहीं साधना, सो छोटी नहीं।
३५० -मैं खड़ा नहीं, देह को खड़ा कर, देख रहा हूँ।

३५१ -आँखें ना मूँदों, नाही आँख दिखाओ, सही क्या देखो?
३५२ -हाथ ना मलो, ना ही हाथ दिखाओ, हाथ मिलाओ।
३५३ -जाने केवली, इतना जानता हूँ, जान न हारा।
३५४ -ठण्डे बस्ते में, मन को रखना ही, मोक्षमार्ग है।
३५५ -आँखें देखती, हैं मन सोचता है, इसमें मैं हूँ।
३५६ -उड़ना भूली, चिड़िया सोने की तू, उठ उड़ जा।
३५७ -झूठ भी यदि, सफ़ेद हो तो सत्य, कटु क्यों न हो ?
३५८ -परिधि में ना, परिधि में हूँ हाँ हूँ, परिधि सृष्टा।
३५९ -बचो-बचाओ, पाप से पापी से ना, पुण्य कमाओ।
३६० -हँसो-हँसाओ, हँसी किसी की नहीं, इतिहास हो।

३६१ -अति संधान, अनुसंधान नहीं, संधान साधो।
३६२ -है का होना ही, द्र्व्य का स्वभाव है, सो सनातन।
३६३ -सुना था सुनो, ”अर्थ की ओर न जा” डूबो आपे में।
३६४ -अपनी नहीं, आहुति अहं की दो, झाँको आपे में।
३६५ -पीछे भी देखो, पिछलग्गू न बनो, पीछे रहोगे।
३६६ -द्वेष पचाओ, इतिहास रचाओ, नेता बने हो।
३६७ -काम चलाऊ, नहीं काम का बनूँ, काम हंता भी।
३६८ -आँखों से आँखें, न मिले तो भीतरी, आँखें खुलेगी।
३६९ -ऊधमी तो है, उद्यमी आदमी सो, मिलते कहाँ ?
३७० -तुम तो करो, हड़ताल मैं सुनूँ हर ताल को।

३७१ -संग्रह कहाँ, वस्तु विनिमय में, मूर्छा मिटती।
३७२ -सगा हो दगा, अर्थ विनिमय में, मूर्छा बढ़ती।
३७३ -धुन के पक्के, सिद्धांत के पक्के हो, न हो उचक्के ।
३७४ -नये सिरे से, सिर से उर से हो, वर्षादया की।
३७५ -ज़रा ना चाहूँ, अजरामर बनूँ, नज़र चाहूँ।
३७६ ‍-बिना खिलौना, कैसे किससे खेलूँ, बनूँ खिलौना।
३७७ -चिराग़ नहीं, आग जलाऊँ, ताकि, कर्म दग्ध हों।
३७८ -खेती-बाड़ी है, भारत की मर्यादा, शिक्षा साड़ी है।
३७९ -शरण लेना, शरण देना दोनों, पथ में होते।
३८० -दादा हो रहो, दादागिरी न करो, दायित्व पालो।

३८१ -हाथ तो डालो, वामी में विष को भी, सुधा दो हो तो।
३८२ -श्वेत पत्र पे, श्वेत स्याही से कुछ, लिखा सो पढ़ो।
३८३ -राज़ी ना होना, नाराज़ सा लगता, नाराज़ नहीं।
३८४ -भार तो उठा, चल न सकता तो, पैर उठेंगे।
३८५ -मन का काम, मत करो मन से, काम लो मोक्ष।
३८६ ‍-छात्र तो न हो, शोधार्थी शिक्षक व, प्रयोगधर्मी।
३८७ -दिन में शशि, शर्मिंदा हैं तारायें, घूँघट में है।
३८८ -दीक्षा ली जाती, पद दिया जाता है, सो यथायोग्य ।
३८९ -उन्हें न भूलो, जिनसे बचना है, वक़्त-वक्त पे।
३९० -सूत्र कभी भी, वासा नहीं होता सो, भाव बदलो।

३९१ -ध्यान काल में, ज्ञान का श्रम कहाँ, पूरा विश्राम।
३९२ -खान-पान हो, संस्कारित शिक्षा से, खान-दान हो।
३९३ -ऐसा संकेत, शब्दों से भी अधिक, हो तलस्पर्शी।
३९४ -हम अधिक, पढ़-लिखे हैं कम, समझदार
३९५ -मेरी दो आँखें मेरी ओर हजार सतर्क होऊँ।
३९६ -मुक़द्दर है, उतनी ही चद्दर, पैर फैलाओ।
३९७ -घुटने टेक, और घुटने दो न, घोंटते जाओ।
३९८ -अशुद्धि मिटे, बुध्दि की वृध्दि न हो। विशुध्दि बढ़े।
३९९ -गोबर डालो, मिट्टी में सोना पालो, यूरिया राख।
४०० – हमसे उन्हें, पाप बंध नहीं हो, यही सेवा है।

४०१ – प्राणायाम से, श्वास का मात्र न हो, प्राण दस है।
४०२ – देख रहा हूँ, देख न पा रही है, वे आँखें मुझे।
४०३ – दुस्संगति से बचो, सत् संगति में, रहो न रहो।
४०४ – दुर्ध्यान से तो, दूर रहो सध्यान, करो न करो।
४०५ – कर्रा न भले, टर्रा न हो तो पक्का, पक सकोगे।
४०६ – अंधाधुँध यूँ, महाबंध न करो, अंधों में अंधों।
४०७ – कमी निकालो, हम भी हम होंगे, कहाँ न कमी।
४०८ – लज्जा आती है, पलकों को बना लें, घूँघट में जा।
४०९ – कड़वी दवा, उसे रुचति जिसे, आरोग्य पाना।
४१० – स्व आश्रित हूँ , शासन प्रशासन, स्वशासित हैं।

४११ – सागर शांत, मछली अशांत क्यों ? स्वाश्रित हो जा।
४१२ – कोठिया नहीं, छप्पर फाड़ देती, पक्की आस्था हो।
४१३ – धनी से नहीं, निर्धनी निर्धनी से, मिले सुखी हो।
४१४ – दण्डशास्त्र क्यों ? जैसा प्रभू ने देखा, जो होना हुआ।
४१५ – ईर्ष्या क्यों करो. ईर्ष्या तो बड़ों से हो, छोटे क्यों बनो ?
४१६ – टूट चुका है, बिखरा भर नहीं, कभी जुड़ा था।
४१७ – तपस्या नहीं, पैरों की पूजा देख, आँखें रो रही।
४१८ – भिन्न क्या जुड़ा ? अभिन्न कभी टूटा, कभी सोचा भी ?
४१९ – कौन किससे ? कम है मत कहो, मैं क्या कम हूँ ?
४२० – त्याग का त्याग, अभी न बुझे आग, पानी का त्याग।

४२१ – प्रेरणा तो दूँ , निर्दोष होने बचो, दोष से आप।
४२२ – यात्रा वृत्तांत, ‘‍’लिख रहा हूँ वो भी”, बिन लेखनी।
४२३ – मन की बात ”सुनना नहीं होता” मोझमार्ग में।
४२४ – ठंडे बस्ते में ”मन को रख फिर” आत्मा में डूब।
४२५ – खाली हाथ ले ”आया था जाना भी है” खाली हाथ ले।
४२६ – आँखें देखती ”मन याद करता” दोनों में मैं हूँ।
४२७ – दिख रहा जो ‘दृष्टा नहीं दृष्टा से” दिखता नहीं।
४२८ – आग से बचा ‘धूंवा से जला (व्रती) सा, तू” मद से घिरा।
४२९ – चूल को देखूँ ‘मूलको बंदू भूल” आमूल चूल।
४३० – अंधी दौड़ में ”आँख वाले हो क्यों तो” भाग लो सोचो।

४३१ – महाकाव्य भी ”स्वर्णाभरण सम” निर्दोष न हो।
४३२ – पैरों में काँटे ”गड़े आँखों में फूल” आँखें क्यों चली।
४३३ – चक्री भी लौटा ”समवशरण से ” कारण मोह।
४३४ – दर्शन से ना ”ज्ञान से आज आस्था” भय भीत है।
४३५ – एकता में ही ”अनेकांत फले सो” एकांत टले।
४३६ – पीठ से मैत्री ”पेट ने की तब से” जीभ दुखी है।
४३७ – सूर्य उगा सो ”सब को दिखता क्यों” आँखे तो खोलो।
४३८ – अंधे बहरे ”मूक क्या बिना शब्द” शिक्षा न पाते।
४३९ – पद यात्री हो ”पद की इच्छा बिन” पथ पे चलूँ।
४४० – सही चिंतक ”अशोक जड़ सम” सखोल जाता।

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