| अधर्म मैल धोने को, धर्मसागर है गुरु। |
| मीन समान ज्ञानी को, ज्ञानसागर है गुरु ||1|| |
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| आचारण महाशुद्ध, स्वयं सदा करे गुरु। |
| करवाते सुशिष्यों से, अतः आचार्य है गुरु ||2|| |
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| आज संसार में ये ही, परमात्मा स्वरूप है। |
| शीत बाधा मिटाने को, ये ही प्रखर धूप है ||3|| |
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| करते यति स्वात्मा में, याते गुरु रहे यति। |
| महाव्रत सदा पाले, अतः रहे महाव्रती ||4|| |
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| करने भेद विज्ञान, गुरु हंस समान हैं। |
| गुरु चिंतामणी पाय, मिले चिंतित वस्तुयें ||5|| |
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| करे शमन अक्षों का, अतः शंकर है गुरु। |
| ब्रह्म ज्ञान सदा देते, याते ब्रह्मा रहे गुरु ||6|| |
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| कर्म लोहा गलाने को, ध्यान अग्नि रहे गुरु। |
| ज्ञान अन्न पचाने को, जठराग्नि रहे गुरु ||7|| |
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| कामना करे पूर्ण, कामधेनु अतः गुरु। |
| कल्पित वस्तु देते हैं, कल्पतरु अतः गुरु ||8|| |
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| कुंद कुंद मयी पुष्प, गुरु आध्यात्म बाग में। |
| अतः हम नमूँ भौरे, पाने सुगन्द ज्ञान ये ||9|| |
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| खुद की खोज करे नित्य, खुदा भी ये रहे अतः। |
| इष्ठ वस्तु सदा देते, गुरु ईश्वर भी अतः ||10|| |
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| गुरु की ही कृपा से तो, खुले भाग्य सुभव्य के। |
| याते सु भाग्यदाता तो, रहे सुगुरु विश्व के ||11|| |
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| गुरु चन्द्र लखेगे तो, बढे समुद्र हर्ष है। |
| धर्मी निर्धन जीवों को, गुरु अक्षय वित्त है ||12|| |
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| गुरु देते बिना दाम, अमोल गुण रत्न ही। |
| रत्नाकर अतः ये ही, मानो, संसार मे सही ||13|| |
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| गुरुमुद्रा रहे धेयेय, ध्यानियों को स्वध्यान को। |
| पूज्यपाद गुरु के ही, पूजनार्थ मनुष्य को ||14|| |
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| गुरु समान कोइ नहीं,नहीं महान आत्मा। |
| याते त्रिलोक में ये ही, रहे सही महात्मा ||15|| |
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| गृह त्याग किये याते, अनगारी रहे गुरु। |
| पाप कर्म कलंकों से, अकलंक रहे गुरु ||16|| |
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| घने बादल जैसे हैं, भव्य-मानव मोर को। |
| दीप स्तम्भ भवाब्धी में,गुरु निखिल विश्व को ||17|| |
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| चींटी स्वरूप भक्तों को गुरु गुड समान है। |
| आत्म ध्यान लगाने में, महामेरु समान है ||18|| |
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| ज्ञान-पद्म खिलाने को, पद्मबन्धु समानहै। |
| फोडने कर्म पहाड को, गुरु महान वज्र है ||19|| |
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| तारे जैसे सुशिष्यों में, गुरु ही शुभचन्द्र है। |
| सभी मुनि सदा वंदे, याते ही मुनिन्द्र हैं ||20|| |
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| तीर्थ यात्रार्थ भव्यों को, गुरु ही सब तीर्थ है। |
| धर्महीन अनाथों को, गुरु ही तो सुनाथ है ||21|| |
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| दुःखी संसार में मात्र, समंतभद्र हैं गुरु। |
| शिष्यों के तो सदा पास, व्रत रूप रहें गुरु ||22|| |
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| धरा जैसे क्षमा धारे, अतः गुरु धरा रहें। |
| मिथ्या तम विनाशार्थ, ज्ञान-भानु गुरु रहें ||23|| |
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| धर्म रहित अन्धों को, धर्म आँखे रहे गुरु। |
| पाप कीचड धोने को, सम्यक नीर रहे गुरु ||24|| |
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| पंचाचार मयी नित्य, पंचाग्नि करे तप। |
| याते तापस ये ही हैं, इन्ही का ही करुं जप् ||25|| |
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| पढने भव्य जीवों को, गुरु खुली किताब है। |
| भक्त रूपी सुभौंरों को, गुरु खुला गुलाब है ||26|| |
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| पढने नित्य शिष्यों को, अतः पाठक भी रहे। |
| पाप पिण्ड करे नाश, याते पण्डित भी रहे ||27|| |
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| परिग्रह महापाप, ऐसे गुरु विचार के। |
| पूर्ण त्याग किये याते, ये अपरिग्रही रहे ||28|| |
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| पात्र सर्व तजे याते, पाणी-पात्र गुरु रहे। |
| तजे यान पदत्राण, पदयात्री अतः रहे ||29|| |
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| पिता तुल्य सुशिष्यों को, पाले याते पिता रहे। |
| सभी कवि इन्हें पूजते, याते कवीन्द्र ये रहे ||30|| |
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| पुण्योदय निनित्तार्थ, गुरु दर्शन ही रहे। |
| याते सुपुण्यदाता तो, मात्र सुगुरु ही रहे ||31|| |
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| पूजते चक्रवर्ती भी, चक्रवर्ती अतः यही। |
| वैर भाव नहीं राखे, वैरागी भी सही यही ||32|| |
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| बिना माँगे सदा देते. परमार्थ धरोहर। |
| अकारण जगत बन्धु, रहे याते गुरुवर् ||33|| |
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| भव्य चातक जीवों को, मेघ धारा रहे गुरु। |
| त्याग धर्म रहे पास , याते त्यागी रहे गुरु ||34|| |
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| भव्य स्वर्णसमा होता, गुरु पारस पाद से। |
| पापी भी बनता ईश, सुगुरु नाम मंत्र से ||35|| |
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| भव्यों को गुरु नौका हैं, भव समुद्र तैरने। |
| मोक्ष मार्ग बटोही को, गुरु पाथेय से बने ||36|| |
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| भव्यों को निज आत्मा का, दिव्य स्वरूप देखने। |
| गुरु निर्मल आदर्श, आत्म रूप दिखावने ||37|| |
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| भाग्य उदय आने में, गुरु कृपा जरूर है। |
| भाग्योदय अतः मानों, निःसन्देह गुरु रहे ||38|| |
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| भेद विज्ञान विद्या को, पाने वाले सुविज्ञ को। |
| मात्र सच्चे गुरुदेव, विद्यासागर ही अहो ||39|| |
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| मन को गुरु जीते हैं मनस्वी भी रहे अतः। |
| पूर्ण यश किये प्राप्त, यशस्वी भी रहे अतः ||40|| |
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| माता समान शिष्यों पें, ममता नित्य ही करें। |
| अतः माता रहे ये ही, ममता अमृत से भरें ||41|| |
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| मिटे दुर्गुण दुर्गन्ध, गुरु सुगन्ध-इत्र से। |
| कर्म सर्प भगाने को, गुरु गारुड मंत्र से ||42|| |
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| मोक्ष भिक्षा सदा मांगे याते भिक्षु रहे गुरु। |
| शांति प्यास मिटाने को, शांतिसागर है गुरु ||43|| |
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| मोक्ष मंजिल पाने को, गुरु सोपान मोक्ष का। |
| मंत्रों के मूल ऊँ रूप, गुरु ही है अहो सदा ||44|| |
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| मोक्ष श्रम करे नित्य, अतः श्रमण करे गुरु। |
| मौन प्रिय रहे भारी, याते मुनि रहे गुरु ||45|| |
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| मोह नींद मिटाने को, शंकनाद रहे गुरु। |
| घोर तप करे नित्य, तपस्वी भी अतः गुरु ||46|| |
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| यम ले कर रोगों का, करे दमन ही सदा। |
| संयमी है अतः ये ही, पूजूं इन्हे बनू खुदा ||47|| |
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| राग रंग दिये त्याग, वीतरागी रहे गुरु। |
| प्रतिमा धारकों को तो, जिन मन्दिर रहे गुरु ||48|| |
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| राग रोग रहे शीघ्र, राज वैद्य अतः गुरु। |
| दया छाया सदा देते, पथिकों को अतः तरु ||49|| |
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| लिये सन्यास भोगों से, सन्यासी है अथ गुरु। |
| स्वात्म-ज्ञान रखे पूर्ण,महाज्ञानी रहे अतः ||50|| |
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| वर्णातीत स्व आत्मा को, ध्याते वर्णी रहे अतः। |
| साधना मे सदा लीन, महासाधक है अतः ||51|| |
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| शस्त्र, वस्त्र नहीं पास, दिगम्बर रहे गुरु। |
| छोडे सकल ग्रंथों को, याते निर्ग्रंथ है गुरु ||52|| |
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| शांत मुद्रा गुरुजी की, सम्यक दर्शन हेतु हैं। |
| भवाब्धि पार पाने को, गुरुदेव सु सेतु हैं ||53|| |
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| शिष्य रूपी गढे मूर्ति, श्रेष्ठ शिल्पी रहे गुरु। |
| क्लांत चित्त करें शांत, अतः संत रहे गुरु ||54|| |