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आचार्य श्री प्रवचन [14-06-2013 – 25-08-2013]

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आचार्य श्री प्रवचन [14-06-2013 – 25-08-2013]

यह जीव जहां जाता है वहीं रम जाता है – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (25/08/2013) (23/09/2013)

परमपूज्य जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज ने रामटेक स्थित भगवान श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में उद्बोधन दिया है कि, तुमने जो विभिन्न माध्यमों से दुःख पायें है, उनका विचार करों। शारीरिक रोग ना हो और मन में कुछ विकल्प हो तो आप कैसा महसूस करते हो?

संबंध जोड़कर तोड़ना बहुत मुश्किल है, विवाहित होकर के फिर संबंध तोड़ना कठिन कार्य है। मन की वैयावृति मानसिक वैयावृति कैसे होती है, यह जानना बहुत आवश्यक है। मोक्षमार्ग में असंख्यात गुनी निर्जरा होती है, ऐसा चिंतन करना चाहिए। तुमसे मेरे कर्म कटे, मुझसे तुम्हें क्या मिला? तुमने अनेकों गतियों में भ्रमण करके संख्यात या असंख्यात काल पर्यंत बिना विश्राम किए दुख सहे है, तब अति अल्प काल के लिए इस भव में यह थोडा सा दुःख क्यों नही सहते हो?

काल ज्वर जब आता है तब मृत्यु को लेकर ही जाता है। यदि तुमने परवश होकर पूर्व में वह वेदनाएं सही हैं तो इस समय इस वेदना को धर्म मानकर स्वयं अपनी इच्छा से क्यों नही सहते? यह जीव जहां जाता है, जिस भी योनी में जाता है वहीं रम जाता है।
रामटेक


रामटेक – आचार्य श्री विद्यासागरजी द्वारा 24 मुनिदीक्षा (10/08/2013)

रामटेक (नागपुर / महाराष्ट्र) में राष्ट्रीय दिगंबर जैनाचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के द्वारा 24 बाल ब्रह्मचारियों को दिगंबरत्व मुनि दीक्ष दी । इस अवसर पर 30-40 हजार की जनता अनुमानित होगी। उसी समय इंद्रदेव ने भी वर्षा के द्वारा दीक्षार्थियों का स्वागत किया। लोग छतों पर, टीनों के ऊपर बैठे थे। आचार्य श्री को भी नई पिच्छिका नये दीक्षार्थियों ने दी।

आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा कि यह दीक्षा खाने पीने की चीज नही है, अभी भी मेरा कहना है कि आप लोग की भावना देख कर मैं इससे स्थायी मान लूं। उनकी यह भावना फलीभूत होने जा रही है। हमने पहले कहा था कि आप उपवास का अभ्यास करिये। उसके लिये काफी तैयारी की आवश्यकता होती है। तो 64 ऋषि के उपवास दिये। सहर्ष रुप से स्वीकार किये इन्होने अल्प समय में पूर्ण किया। इन्होने कहा कि आगे कि साधना भी हमे दीजिये। इन्होने शीत, वर्षा, ग्रीष्म में उपवास किये। आज यह अवसर आपके सामने है। आगम में कहा है कि बार-बार मांगने पर एक बार दिया जाता है। हमें पूरे देश से नमोस्तु आते है। लोग कहते है कि हमें बहुत सारा आशीर्वाद दीजिए तो हम कहते है कि एक बार ही आशीर्वाद देते हैं। आपने इनको सुना और चेहरो को भी देखा होगा। अनुमोदना से सहयोग कर रहे है । कुछ चंद मिनटों के बाद उस लक्ष्य तक पहुचेंगे। त्याग करके आजीवन निर्वाह करना महत्वपूर्ण है। किसी को 30-40 वर्षो तक लग सकते है। लेने के बाद इन व्रतों को धारणाओ को मजबूत करते चले जाये। यह शांतिनाथ का क्षेत्र माना जाता है। वर्षो से लाखों की जनता ने उपासना की है। यह मंगल कार्य इस क्षेत्र पर सम्पन्न होने जा रहा है। आचार्य गुरुदेव ने कहा था कि दीक्षा तिथि नहीं दीक्षा क्यों ली यह याद रखना। जिन-जिन मुनियों से वैराग्य बढ़ता है उनको याद रखना। निश्चय से अनुभव ही हमारा व्यवहार चलाता है। आप लोग अपने सिरों से पगढ़िया उतार लें।

आचार्य श्री ने मंत्रोच्चारण किया फिर गंधोतक के जल से सिर का प्रच्छालन किया। आप चिंतन करिये, उनको जीवन के अंतिम समय तक याद रखियें । नागपुर जैन समाज ने सर्व सम्मति से मंदिर का स्वप्न सजाया है । प्रतिमाओं को दुसरी जगह शिफ्ट करना है। जब तक चार-पाच वर्षों तक मंदिर नहीं बन जायेगा विश्व से अपनी स्मृति में रखेंगे। आचार्य श्री ने कहा कि वस्त्र से अपने सिर साफ कर ले, आचार्य श्री ने 28 मुल गुणों के बारे में बताया और कहा कि आप लोग गाडी में नही चल सकते । फोन का इस्तेमाल नही कर सकते। आप लोग 28 मुल गुणों का पालन करेंगे। अब आभुषण उतारेंगे। इस अभुतपुर्व दृश्य देखियें। 24 ब्रम्हचारी जो वस्त्राभूषण सहित थे उनको आप दिगंबर देख रहे है। जैसे भगवान दिगंबर होते है, वैसे ही ये हो गये हैं। अब घर नही जा पायेंगे। अभुतपुर्वक दृश्य चेतन चैबीसी को आपने देख लिया। यह महावीर भगवान की आचार्य ज्ञान सागरजी की परंपरा में यह दीक्षित हो रहे है वीतराग मार्ग की ओर अग्रसर रहने का भाव बनायें रखेंगे। आज पंचम काल है डायरेक्ट इस मुद्रा के माध्यम से प्राप्त नहीं होता।

उपसर्गो के माध्यम से निर्वाह करना है। आपने घर को छोड दिया है, हमारे घर में प्रवेश कर गये है। अब इनका कोई नंबर नही रहेगा। आचार्य महाराज का महान उपकार है। जीव का जीव के ऊपर तो उपकार होता है। तु ज्ञानी और हम अचेतन यह बात तो आप करते है। अपने जीवन के बारे में जब सोचेंगे तो लगेगा कि यह क्या है? हमेशा हमेशा आपको अच्छे कार्य करना है। गुरुजी कों यह पसंद था कि गुरु का शिष्य के ऊपर तो उपकार होता है। जैसे सेवक के ऊपर मालिक करता है। ऐसे ही गुरु और शिष्य का आपस में उपकार होता है। जिस को आज्ञा दी है उसको पालन करेंगे तो गुरु के ऊपर भी उपकार होगा। शासन का प्रवाह चलेगा। जिनशासन का प्रवाह चलेगा, आप पालेंगे तो लोग देखेंगे। आप लोग शास्त्र और गुरु के कहे के अनुसार जैन धर्म और अहिंसा के क्षेत्र में कार्य करेंगे।

बहुत परिश्रम कर के शिक्षा और दीक्षा का प्रवाह बढ़ाया है। बढने से नही बढ़ता करना पडता है। आपने इस दृश्य को देखा है। गदगद होकर इस दृश्य को कैद कर लेना है। करोडो अरबों और खरबों रुपये खर्च कर के भी यह दृश्य नही मिलेगा। जो नही आये वह पश्चाताप करेंगे। जिस समय चर्या करेंगे तो लागों को यह दृष्य प्रेरक बनेगा। आज से असंख्यात गुणी कर्मो की निर्जरा प्रारंभ हो चुकी है। साहुकार तो ये हैं। हम हमेशा प्रसन्न रहें। हमेशा प्रसन्न रहेंगे तो सभी लोगों पर असर पडेगा। प्रतिकुलता में भी आनंद की अनुभूति होगी। जो हम चाहते थे वह मुद्रा मिल गयी। जीवन आनंदमय बन गया। इन लोगों के मुह में भी पानी आयेगा। इसको आप खर्चा करके नही खरीद सकते। यह हमारा स्वरुप आ गया। वीतरागता हमारा धर्म है। प्रभु और गुरुदेव से हम प्रार्थना करते है कि वह वीतरागता प्राप्त हो, अपना व्यापार बढाओं, हमें जल्दी ही मिल ही जायेगा। जितने आप प्रसन्न रहेंगे तो चुन-चुन कर ग्राहक आयेंगे। मोह को त्याग करना कठिन है। यह अनन्तकाल से लगा है।


तप की महिमा अपरंपार है – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (08/08/2013)

परमपूज्य जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज ने रामटेक स्थित भगवान श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में उद्बोधन दिया है कि, रोग होता है, जन्म-मरण, रूप, उसकी श्रेष्ठ औषधि तप है। अच्छी चीज के लिए विज्ञापन की आवश्यकता नही होती है वह स्वयं में विज्ञापन होती है। कलकत्ता मे एक वृक्ष है, किसी को पता नही है कि उस वृक्ष का मूल भाग कैनसा है?
संसार रूपी महादाह से जलते हुए प्राणी के लिए तप जल घर है, जैसे सूर्य की किरणो से जलते हुए मनुष्य के लिए धाराधर होता है। तप सांसरिक दुखों को दूर करता है। सम्यक तप करने से पुरूष बंधु की तरह लोगो को प्रिय होता है। तप से व्यक्ति सर्व जगत का विश्वासपात्र होता है। पंचकल्याणक आदि सुख तप से प्राप्त होते है। तप मनुष्य के लिए कामधेनु और चिंतामणि रत्न के समान है। आप लोगो को रोने की आदत पड गयी है। संसार मे मै किसी से बैर नही करूंगा ऐसे भाव रखना चाहिए।

जब शरीर को भोजनरूपी वेतन दिया जाता है। उस पर दया न करके उसको तप की साधना मे लगाना चाहिये। तपेा भावना मे जिसको आनंद नही आता है उसको अभी संयम बहुत दूर है। जीव पर दया की जाती है, शरीर तो जड है पुद्गल है उस पर दया नही करना चाहिये। यदि शरीर का पोषण करते है तो आत्मा का षोषन होता है। संज्ञाये तो बढती चली जाती है और कार्य करने की क्षमता बढती जाती है। भावना जितनी भायेगी उतनी विशुध्दी बढती जायेगी। संयम का फल इच्छा निरोधो तपः होना चाहिये।


एक क्षण का क्रोध हमारे जीवन को संपूर्णतः नष्ट कर देता है – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (07/08/2013)

परमपूज्य जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज ने रामटेक स्थित भगवान श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में उद्बोधन दिया है कि क्रोध रूपी आग मनुष्यों के धर्मवृत को जलाती है। यह क्रोध रूपी आग अज्ञानरूपी काष्ठ से उत्पन्न होती है। अपमान रूपी वायु उसे भडकाती है। कठोर वचन रूपी उसके बडे स्फुलिंग है। हिंसा उसकी शिखा है और अत्यंत उठा बैर उसका धूम है। यदि व्यक्ति कषाय करता तो उसका पाप का प्रमाण वढता है। कषाय करने वालो के उपर हम कषाय नही करेगे, यदि हम यह सोच लेंगे तो मोक्ष की प्राप्ति होगी। अपमान होता है तो क्रोध रूपी अग्नी उसे प्रज्जवलित कर देती है। ज्ञान के द्वारा कषायो का हनन होता है। जब तब व्यक्ति के ऊपर ऋण रहता है तब तक उसे चैन नही आता है। क्रोध इस लोक एवं परलोक मे बहुत दोषकारक है ऐसा जानकर क्रोध का त्याग करना चाहिये। जीव तत्व को देखकर यदि अक्ल आये, उस जीव तत्व पर श्रद्धान हम कैसे माने। श्रध्दान अलग वस्तु है और चर्चा अलग वस्तु है। एक क्षण का क्रोध हमारे जीवन को संपूर्णतः नष्ट कर देता है । अतः हमें क्रोध को त्यागना चाहिये।


संस्कृति बचाने गौरक्षा की ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (02/08/2013)

परमपूज्य जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज ने रामटेक स्थित भगवान श्री शां‍तिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में उद्बोधन दिया है कि, गाय जीवित धन माना जाता है जो विभिन्न प्रकार की समस्याओ का हल करता है। काली गाय मनुष्य से भी ज्यादा जागृत रहती है। उसकी ज्यादा मांग रहती है। वातावरण शांत रहता है। मथुरा में गोवर्धन नगर है उधर की गायों में विशेषता है।

यदि कोई व्यक्ति गौ वध करता था तो पहले के शासक उसके हाथ अलग करवा देते थे। उस समय 4 लाख गायें थी, आज कितनी गायें है हमारे देश में ? अब कोई आवाज ही नही उठाता है । नगाडे की आवाज मे बाँसुरी की आवाज दब रही है। पहले के राजा गायों की रक्षा अपने प्राणों से भी ज्यादा करते थे। हमें अपनी संस्कृति बचाने गौरक्षा की ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

साथ ही आचार्यश्री ने कहा कि, इंद्रियाँ बूढी होने पर भी मन जवान है वह काम कराता रहता है। अपनी इन्द्रियों पर जो लगाम लगा कर ज्ञान, ध्यान और तप में व्यस्त रहता है वह तपस्वी होता है । इन्द्रिय और कषाय, ध्यान और गुप्ति से डरती है। शरीर सो जाये लेकिन अप्रमत रहे इसका नाम गुप्ति है।

साथ ही आचार्यश्री ने यह भी कहा कि, आज बच्चे सोचते है 365 दिन है तो पढाई कम करते है, खाने पीने मे, फिल्म एवं मोबाइल आदि मे समय खराब करते है। फिर दिन-रात रटकर पढते है एवं बीमार पड जाते है । विद्यार्थी वही माना जाता है जो प्रतिदिन अध्ययन करता है । कहते है 50 वर्ष की उम्र हो गयी, तो हिसाब लगाओ की खाने-पीने-सोने में आने कितना समय व्यर्थ गंवाया है। आचार्य कुंद कुंद स्वामी कहते है कि यदि तुम दुःख से मुक्ति चाहते हो तो क्षमा धर्म को धारण करो ।


प्रतिभा स्थली के बच्चों को उद्‍बोधन – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (23/07/2013)

एक विशाल भवन में बहुत सारे बच्चों की व्यवस्था की गयी थी। बच्चों को जैसे संकेत मिलता था हजारों की आवाज आ रही थी। ताली बजाने का संकेत मिलते ही एक साथ ताली बजाने लगे। 700 बालिकायें हैं प्रतिभा स्थली में और संकेत मिलते ही 1400 हांथों से तालियाँ बजने लगी। छोटे बच्चे समझने के बाद भूलते नहीं। यह सुरभि दिगंतर तक फैल सकती है और प्रभाव डाल सकती है। कल्याण की जो भावना रखता है वह व्यवस्थित कार्य करे। आप लोग प्रतिभा स्थली से आये हैं, पहले प्रतिभा है बाद में स्थल है। प्रतिभा एक स्थान पर रूकती नहीं प्रवाहित होती रहती है। जबलपुर एवं चंद्रगिरी (डोंगरगढ़) से आये हैं बच्चे लेकिन ड्रेस और प्रतिभा एक सी है। जहाँ हम जाते हैं लोग प्रतिभा स्थली की मांग करते हैं। एकता से ही शांति और सब कार्य होते हैं। अपने वायर, कनेक्षन और बल्ब को अच्छा रखें तो अंधकार दूर होगा, हजारों बल्ब जलेंगे। प्रकाश आता है तो अंधकार दूर हो जाता है।


वीर शासन जयंती। – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (23/07/2013)

रामटेक में विराजमान संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने प्रतिभा स्थली के बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात कहा कि – एक बालिका ने कहा कि भूगोल ही क्या हम इतिहास बदल देंगे तो हमें भूगोल में जो विक्रतियाँ आ गयी है उनको हटाना है। हमें सीखना है किसी कि शिकायत नहीं करना है। शिक्षा सिखने के लिये होती है और जो दिक्षित होते हैं उन्हे अंतरंग में उतारने में कारण होती है।

‘‘जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि और जहाँ न पहुँचे कवि वहाँ पहुँचे आत्मानुभवि’’।
देश में परिवर्तन हो जाये, वेष में परिवर्तन हो जाये लेकिन उद्देश्य में परिवर्तन हो जाये तो कार्य नहीं होगा। बीच में कुछ ऐसी बच्चियाँ आयी जैसे कोई काव्य गोष्ठी हो रही हो, मंच का संचालन भी अच्छा हो रहा था। अभी – अभी डोंगरगढ़ में प्रतिभा स्थली खुली है उसकी खुशबू फैल रही है।

आज वीर शासन जयंती है यह दिन बताता है कि केवल ज्ञान होने के उपरान्त भी दिव्य ध्वनि नहीं खिर पा रही थी। 66 दिन तक दिव्य ध्वनि नहीं खिरी, फिर खिरी। समवशरण तो खचाखच भरा था।

बच्चे अपने साथ प्याऊ (बाटल) लेकर आये हैं। गाँधी जी चाहते थे कि इनकी शिक्षा ऐसी मटकी के जैसी हो जिसमें से सभी पी सके। यह बोतल की परंपरा बदलना होगी। भूगोल को बदलने की अपेक्षा बोतल को गायब कर दें। एक बार पीने के बाद प्यास बुझ जायेगी। आप बोतलों को समाप्त कर देंगे और सबकी प्यास बुझायेंगे। असर सर तक नहीं किन्तू हृदय तक पढ़ना चाहिये। कानों से जो सुनते हैं उसे हृदय की ओर ले जायें उसी का नाम वीर शासन जयंती है। वाचन की अपेक्षा पाचन महत्वपूर्ण होता है। स्वप्न यानि स्व ़ पन को साकार करें। हम भी भगवान की तरह बनें स्वप्न तभी साकार होंगे। दुनिया में सब कुछ मिल सकता है लेकिन स्वप्न नहीं। एक दृष्टांत देते हुये कहा कि एक बच्चे की माँ गुम गई पिता कि अपेक्षा माँ अधिक आत्मीयता एवं संस्कार देती है। किसी रहस्य को समझने में शब्द ही काम में नहीं आते अन्य भी चीजें काम आती है। ‘‘जवाब नहीं देना भी लाजवाब है’’ शब्दों के साथ भाव प्रणाली भी होना चाहिये। आज की शिक्षा शब्दों की ओर ही जाती है। आज के दिन दिव्य ध्वनि खिरी और वीर शासन जयंती प्रसिद्ध हुई।


साधक के दर्शन बडे़ पुण्य से होते हैं। – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (22/07/2013)

लोभ के कारण अपने कुटुम्बियों की और अपनी भी चिन्ता नहीं करता उन्हें भी कष्ट देता है और अपने शरीर को भी कष्ट देता है। साधक के दर्षन बडे़ पुण्य से मिलते हैं, महत्व समझ में आ जाये तो महत्व हीन पदार्थ छूट जायेगा। परिणामों की विचित्रता होती है। निरीहता दुर्लभता से होती है। परिग्रह कम करते जाओ निरीहता बढ़ाते जाओ। जिसको हीरे की किमत मालूम है वह तुरंत नहीं बेचता है। जो लोभ कषाय से रहित है उसके शरीर पर मुकुट आदि परिग्रह होने पर भी पाप नहीं होता अर्थात् सारवान् द्रव्य का सम्बन्ध भी लोभ के अभाव में बन्ध का कारण नहीं है। जिसका वस्तु मे ममत्व भाव नहीं है वह दरिद्र होते हुए भी सुख प्राप्त करता है। अतः चिŸा की शान्ति सन्तोष के अधीन है, द्रव्य के अधीन नहीं है। महान द्रव्य होते हुए भी जो असन्तुष्ट है उसके हृदय मे महान दुःख रहता है।


श्वेत पत्र पर, श्वेत स्याही से लिखा सो पढ़ो – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (17/06/2013)

थोड़ा सा असंयम संयम की शोभा को कम कर देता है। जैसे बकरी का बच्चा सुगन्धित तेल भी पिये फिर भी अपनी पूर्व दुर्गन्ध को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार दीक्षा लेकर भी अर्थात् असंयम को त्यागने पर भी कोई – कोई इन्द्रिय और कषाय रूप दुर्गन्ध को नहीं छोड़ पाते। मन से कभी समझौता नहीं करना क्योंकि वह गिरा देगा। मन को छोड़ भी नहीं सकते हैं उससे काम भी लेना है। पँचेन्द्रियों से वषीभूत हुआ प्राणी क्या – क्या नहीं करता है। कषाय का उद्वेग संज्ञी पंचेन्द्रिय में ही है। हम आदी हो गये है, काला अक्षर भैंस बराबर। श्वेत पत्र पर श्वेत स्याही से लिखा सो पढ़ो। अकेले काल रंग से लिख नहीं सकते, अकेले सफेद से भी कुछ नहीं कर सकते हैं। शुक्ल लेष्या का प्रतीक है। रात्रि में अंधकार में इधर – उधर क्यों नहीं देखते। आँखे बंद करके ही बैठते हैं सामायिक में । आँखों की ज्योति का सरंक्षण करना सीखो। इधर – उधर नहीं देखो।


अखबार में फ्रंट पर देखते हैं । – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी (14/06/2013)

तीव्र कषाय वाले के पास जाने से लोग डरते हैं। यह इन्द्रियों की दासता की कहानी की आदत पड़ी है। दूसरों के बारे में तो अचरज करता है लेकिन अपने बारे में अचरज नहीं करता। आपका इतिहास लाल स्याही से लिखा गया है वह पाँच पाप सहित है। करोड़पति होकर भी रोड़पति बन गये है। दरिद्रता रखो लेकिन कषाय की दरिद्रता रखो। ख्याति, पूजा, लाभ मिलने से कई लोगों के खून में वृद्धि हो जाती है। यह रस आत्मा को नहीं मन को मिलता है। डॉ. मान, सम्मान की खुराक नहीं दे पाते हैं। लागों को मान की खुराक होती है तो कहते हैं कि अखबार में मेरा नाम फ्रंट पर आना चाहिये और किसी का नाम नहीं आना चाहिये। ठंडे़ बस्ते में मन को रखना मोक्षमार्ग है। डॉ. को मन की दवाई भी ढूंढ़ लेना चाहिये। मन के विजेता इंद्रिय विजेता बनोगे तभी मोक्ष मार्ग के नेता बनोगे। मान – अपमान को जिसने समझ लिया उसने मोक्ष मार्ग को समझ लिया।

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