मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज
2,040 viewsहाइकू जापानी छंद सतरह अक्षरों में ! – मुनि श्री योग सागर महाराज जी
हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने 200 से ज्यादा हाइको लिखे हैं।
मृत्यु अमर
यहाँ कौन दिखेगा
अमर यहाँ ||१||
तू ना समझा
नश्वर के शरण
में अशरण ||२||
विकृत वस्तु
के परिणमन का
नाम संसार ||३||
तू है चिद्रूप
पर क्यों रूप बना
तेरा विद्रूप ||४||
रूप कुरूप
से परे अरूप है
तेरा स्वरुप ||५||
भग्न घट सी
काया निशदिन ही
मॉल झराये ||६||
योगों की क्रिया
जिसकी प्रतिक्रिया
कर्मास्रव है ||७||
बाहर नहीं
भीतर निहारना
निरास्रव है ||८||
अनगार की
ध्यान की चिनगारी
कर्म जलाये ||९||
कहीं निहाल
तो कहीं है बेहाल
जग का हाल ||१०||
कारागार को
जिनालय बनाना
अतिदुर्लभ ||११||
वही है धर्म
विष को सुधामय
परिणमाये ||१२||
पुष्प महके
अलिदल दौड़ते
ना ही बुलाते ||1||
काँटों के बीच
गुलाब का जीवन
कैसी ग़ुलामी ||२||
अमल करो
समल विमल हो
ज्यों कमल सा ||३||
क्षणभंगुर
अंगुर पे झूमते
ज्यों लंगुर से ||४||
भीतर नहीं
बाहर निहारना
पापास्रव है ||५||
प्रदर्शन तो
मृगमरीचिका है
केवल धोका ||६||
वैराग्य पुष्प
जीवन उद्यानों को
महकता है ||७||
जिन्हें जाप से
ताप सा प्रतीत हो
उन्हें क्या कहें ||८||
मंगलमय
देव गुरु शास्त्र को
मम प्रणाम ||९||
जिसके तुम
हवाला दे उनके
क्या हवाला हो ||१०||
शांत चित्त ही
सा शास्त्रों का ज्ञाता
चेतन कृति ||११||
कांच सा प्याला
तेरी सुन्दर काया
कब क्या होगा ||१२||
जिसे जिनसे
शल्य हो उनसे क्या
प्रयोजन है ||१३||
ये सुख दुःख
तेरे परिणामों का
परिपाक है ||१४||
पुरुषार्थ की
चमक झलकती है
भाग्योदय में ||१५||
चिंता न करो
सफलता मिलती
चिंतन से ही ||१६||
असुंदर में
सुन्दर का निवास
मोह की नशा ||१७||
तेरा स्वरुप
सुख दुःख से परे
ज्ञाता दृष्टा है ||१८||
पूजनीय वे
कर्ता भोक्ता औ स्वामी
पन से परे ||१९||
वक्त पर जो
भक्त बनता वह
विभक्त होता ||२०||
भेद विज्ञान
अंतर जगत का
दिवाकर है ||२१||
पुण्योदय में
गाफिल, पापोदय
होश हवास ||२२||
मल पिटारा
में बहुमूल्य हीरा
कब से गिरा ||२३||
जात पात से
परे यथा जात जो
पारिजात सा ||२४||
त्रैलोक्य में है
जीवों का प्रिय यार
शुद्ध बयार ||२५||
कविता गायें
ह्रदय की गंथियाँ
हम गलाये ||२६||
सुनो हायको
कर्मों की चमत्कार
तुम परखो ||२७||
प्रभावित हो
उपादान निमित्त
प्रभाव डाले ||२८||
एक दिन तो
मरना है कल्याण
मेरा कैसे हो ||२९||
प्रत्येक श्वास
यमपुर की ओर
बढे कदम ||३०||
कर्तव्यता में
दक्षता ही शिष्य की
गुरु दक्षिणा ||३१||
एक क्षण भी
संत संग अनंते
पाप नशाये ||३२||
शीतलमयी
क्षमोत्तम नीर से
क्रोधाग्नि बुझे ||३३||
मार्दव फल
विनय द्रुम पर
‘ ही फलता है ||३४||
औपचारिक
निर्गंध पुष्प
निज को छलता है ||३५||
तन तिनका
समझेगा तभी तो
हीरा दिखेगा ||३६||
असुंदर क्या
असुंदर से कभी
सुन्दर होगा ||३७||
अहंकार के
अलंकार से प्राणी
अलंकृत है ||३८||
समयसार
की आराधना निजकी
आराधना है ||३९||
मर्म सहित
कर्म में धर्म है ये
शर्म दिलाये ||४०||
मान को त्यागो
मानवर्धमान हो
सन्मान मिले ||४१||
माया का जाल
आर्जव कृपान से
काटा जाता है ||४२||
मुनि वैद्य है
जन्म जरा मृत्यु के
रोग निवारे ||४३||
वायदा में ना
फायदा यही यहाँ
का है कायदा ||४४||
लोभ अशुचि
पावन संतोष से
धुल जाता है ||४५||
रत्नत्रय का
सुन्दर संदूक तो
दिगम्बरत्व ||४६||
अज्ञान धरा
पे भय के अंकुर
उग आते हैं ||४७||
परिग्रह का
प्रायश्चित दान तो
अभिमान क्यों ||४८||
संतो का कोई
पन्थ नहीं आगम
ही पन्थ रहा ||४९||
समता में जो
रमता भवदधि
वह तिरता ||५०||
यम नियम
संयम तप ये आत्मा पर


